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सिविल कानून

विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम की धारा 28

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 07-May-2026

हब्बन शाह बनाम शेरुद्दीन 

"दिनांक 31.10.2012 की विनिर्दिष्ट पालन की डिक्रीउसमें निर्धारित तीन महीने की समय सीमा के भीतर शेष विक्रय राशि जमा करने की शर्त का पालन न करने के कारण निष्पादनीय हो जाता है और अधिनियम की धारा 28 के अनुसार संपूर्ण संविदा निरस्त माना जाता है। 

न्यायमूर्ति पंकज मिथल और न्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

भारत के उच्चतम न्यायालय की एक खंडपीठजिसमें न्यायमूर्ति पंकज मिथल और न्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी शामिल थेनेहब्बन शाह बनाम शेरुद्दीन (2026) के मामलेमें पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के उस आदेश के विरुद्ध दायर अपील को मंजूर कर लियाजिसमें प्रत्यर्थी-वादी द्वारा शेष विक्रय प्रतिफल जमा करने में हुई देरी को क्षमा कर दिया गया थाजबकि विचारण न्यायालय के निर्णय में अनुपालन के लिये विशेष रूप से तीन महीने की अवधि निर्धारित की गई थी। 

  • न्यायालय ने निर्णय दिया कि वादी-प्रत्यर्थी द्वारा डिक्री के अधीन विहित समय के भीतर शेष विक्रय राशि जमा करने में विफलता के परिणामस्वरूप विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 28 के अधीन संविदा स्वतः विखंडित हो गई और इस उद्देश्य के लिये निर्णीतऋणी द्वारा रद्द करने की मांग करते हुए एक पृथक् आवेदन अनिवार्य नहीं है। 

हब्बन शाह बनाम शेरुद्दीन (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह विवाद 19 अक्टूबर, 2005 को कृषि भूमि के विक्रय से संबंधित एक करार से उत्पन्न हुआजिसके अधीन क्रेता ने 80,000 रुपए का अग्रिम संदाय किया था। 
  • विक्रयनामा 15 मार्च, 2006 तक निष्पादित किया जाना था। विक्रेता द्वारा संव्यवहार पूरा करने में असफल रहने परक्रेता ने विचारण न्यायालय के समक्ष विनिर्दिष्ट पालन के लिये वाद दायर किया। 
  • 31 अक्टूबर, 2012 कोविचारण न्यायालय ने वाद की डिक्री देते हुए विक्रेता को तीन महीने की अवधि के भीतर शेष विक्रय राशि प्राप्त करने के बाद विक्रय विलेख निष्पादित करने का निदेश दिया।             
  • यद्यपिक्रेता निर्धारित अवधि के भीतर शेष राशि जमा करने में असफल रहा। विक्रेता की अपील लंबित रहने के दौरानभुगतान जमा करने पर कोई रोक नहीं लगाई गई थीऔर संपत्ति के अंतरण तक सीमित अंतरिम सुरक्षा तीन महीने की अवधि समाप्त होने से पहले ही समाप्त हो गई थी। 
  • इसके होते हुए भीक्रेता ने न तो राशि जमा की और न ही विहित अवधि के भीतर समय बढ़ाने का अनुरोध किया। 
  • इसके बाद क्रेता ने निष्पादन कार्यवाही शुरू कीऔर 2015 में दायर दूसरी निष्पादन याचिका मेंनिष्पादन न्यायालय ने शेष प्रतिफल जमा करने की अनुमति दीजो बाद में जमा कर दी गई। 
  • उच्च न्यायालय ने इस दृष्टिकोण का समर्थन करते हुए विलंब को क्षमा कर दिया। पीड़ित विक्रेता ने उच्चतम न्यायालय में अपील की। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • डिक्री का पालन न करने पर संविदा का विखंडन करना:न्यायालय ने माना कि उच्च न्यायालय ने शेष विक्रय प्रतिफल जमा करने में हुए विलंब को क्षमा करने में त्रुटी की। वादी-प्रत्यर्थी द्वारा डिक्री में निर्धारित शर्त का पालन न करने के कारण विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 28 के अधीन संविदा विखंडित हो गईजिससे विनिर्दिष्ट पालन की डिक्री अप्रवर्तनीय हो गई। 
  • धारा 28 के अधीन आवेदन की अनिवार्यता पर:न्यायालय ने पाया कि संविदा का अनुपालन न होने के कारण उसे विखंडित करने हेतु अधिनियम की धारा 28 के अधीन आवेदन करना अनिवार्य नहीं अपितु केवल वैकल्पिक है। न्यायालयनिर्णीतऋणी द्वारा औपचारिक आवेदन न किये जाने पर भीसंविदा को शर्त का अनुपालन न होने के कारण विखंडित माना जा सकता है। 
  • तत्परता और इच्छाशक्ति के संबंध में:न्यायालय ने पाया कि यद्यपि वादी-प्रत्यर्थी ने करार के अपने भाग को पूरा करने की तत्परता और इच्छाशक्ति साबित करके डिक्री प्राप्त कर ली थीलेकिन वह विक्रय विलेख के निष्पादन तक निरंतर तत्परता और इच्छाशक्ति प्रदर्शित करने में असफल रहा। डिक्री की शर्त का पालन करने में उसकी विफलता से संकेत मिलता है कि वह वास्तव में अपने दायित्त्व को पूरा करने के लिये तत्पर और इच्छुक नहीं थाजिससे वह विनिर्दिष्ट पालन की डिक्री के लाभ से वंचित हो गया। 

न्यायालय द्वारा निकाले गए निष्कर्ष:न्यायालय ने निम्नलिखित सिद्धांतों का सारांश प्रस्तुत किया: 

  • विनिर्दिष्ट पालन के वाद में पारित डिक्री प्रारंभिक डिक्री की प्रकृति की होती है। 
  • चूँकि यह डिक्री प्रारंभिक डिक्री की प्रकृति की हैइसलिये इसके पारित होने पर न्यायालय का अधिकार समाप्त नहीं हो जाता हैअपितु विक्रय विलेख निष्पादित होने तक या डिक्री के अप्रवर्तनीय होने तक न्यायालय का इस पर नियंत्रण बना रहता है। 
  • धारा 28(1) निर्धारित समय के भीतर शेष विक्रय प्रतिफल जमा करने या व्यतिक्रम की स्थिति में संविदा को विखंडित करने का प्रावधान करती हैभले ही विनिर्दिष्ट पालन के लिये डिक्री प्रदान की गई हो। 
  • धारा 28(4) किसी भी अनुतोष के लिये पृथक् वाद दायर करने पर रोक लगाती है जिसे धारा 28 के अधीन आवेदन करके उसी वाद में दावा किया जा सकता है। 
  • धारा 28 के अधीन न्यायालय की शक्ति विवेकाधीन है और इसका प्रयोग न्यायसंगत विचारों के आधार पर किया जाना चाहियेजिसमें विक्रेता और क्रेता दोनों को उचित ध्यान में रखा जाए। 
  • विनिर्दिष्ट पालन के लिये डिक्री के बाद व्यतिक्रमजिसके परिणामस्वरूप विखंडन होता हैविवाद को शांत करने के लिये इक्विटी अधिकारिता के प्रयोग में धारा 28 (1) और 28 (4) के व्यापक प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लिया जाना चाहिये 
  • धारा 28 के अधीन आवेदन करना अनिवार्य नहीं हैऔर न्यायालय शर्त का पालन न करने पर संविदा को विखंडित मानने के लिये शक्तिहीन नहीं है। 

तदनुसार अपील मंजूर कर ली गई और प्रत्यर्थी-वादी से प्राप्त आंशिक विक्रय राशि वापस करने का निदेश दिया गया।

विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 28 क्या है? 

विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 28 – स्थावर संपत्ति के विक्रय या पट्टे पर दिये जाने के लिये ऐसी संविदाओं का, जिनके विनिर्दिष्ट पालन की डिक्री की जा चुकी हो, कतिपय परिस्थितियों में विखंडन 

उपधारा (1) — क्रेता/पट्टेदार के व्यतिक्रम पर संविदा विखंडित करना: 

  • यह उस स्थिति में लागू होता है जब स्थावर संपत्ति के विक्रय या पट्टे की संविदा के विनिर्दिष्ट पालन के लिये पहले ही कोई डिक्री पारित की जा चुका हो। 
  • यदि क्रेता या पट्टेदारडिक्री द्वारा निर्धारित समय या किसी विस्तारित अवधि के भीतर क्रेता राशि या न्यायालय द्वारा निर्धारित राशि का भुगतान करने में विफल रहता हैतो विक्रेता या पट्टाकर्त्ता उसी वाद में संविदा को विखंडित करने के लिये आवेदन कर सकता है। 
  • न्यायालय न्याय की आवश्यकता के अनुसार संविदा को आंशिक रूप से (केवल व्यतिकारी पक्षकार के विरुद्ध) या पूर्ण रूप से विखंडित कर सकता है। 

उपधारा (2) — विखंडन के परिणाम: 

  • संविदा विखंडित होने परयदि संविदा के अधीन संपत्ति का कब्जा प्राप्त कर लिया गया थातो न्यायालय क्रेता/पट्टेदार को विक्रेता/पट्टाकर्त्ता को संपत्ति का कब्जा वापस सौंपने का निदेश देगा। 
  • न्यायालय कब्जे प्राप्त करने की तिथि से लेकर संपत्ति की बहाली तक अर्जित सभी किराए और लाभ के भुगतान का निदेश भी दे सकता है। 
  • यदि न्याय की आवश्यकता हो तो न्यायालय क्रेता/पट्टेदार द्वारा भुगतान की गई बयाना राशि या जमा राशि की वापसी का आदेश भी दे सकता है। 

उपधारा (3) — अनुपालन पर क्रेता/पट्टेदार को अनुतोष: 

  • यदि क्रेता/पट्टेदार निर्धारित अवधि के भीतर आदेशित राशि का भुगतान कर देता हैतो न्यायालय उसी वाद में आवेदन पर आगे अनुतोष प्रदान कर सकता हैजिसमें निम्नलिखित शामिल हैं: 
    • विक्रेता/पट्टाकर्त्ता द्वारा विधिवत अंतरण या पट्टा निष्पादित करना। 
    • ऐसे हस्तांतरण या पट्टे के निष्पादन पर संपत्ति का कब्जा सौंपनाया विभाजन और पृथक् कब्जा प्राप्त करना। 

उपधारा (4) — पृथक् वाद पर रोक: 

  • इस धारा के अंतर्गत दावा किये जा सकने वाले किसी भी अनुतोष के लिये किसी भी पक्षकार (विक्रेताक्रेतापट्टाकर्त्ता या पट्टेदार पर लेने वाला) द्वारा कोई पृथक् वाद दायर नहीं किया जा सकता है।  
  • सभी प्रकार के अनुतोष उसी वाद में आवेदन के माध्यम से मांगा जाना चाहिये जिसमें विनिर्दिष्ट पालन की डिक्री पारित की गई थी 

उपधारा (5) — खर्च: 

  • इस धारा के अंतर्गत किसी भी कार्यवाही का खर्च पूरी तरह से न्यायालय के विवेक पर निर्भर करता है।