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आपराधिक कानून
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 348
«24-Jun-2026
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अनबू बनाम तमिलनाडु राज्य "भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 348 एक शक्तिशाली न्यायिक साधन है। इसका उद्देश्य न्याय की विफलता को रोकना है, न कि किसी उपेक्षित वादी को दूसरा अवसर देना। किसी साक्षी को पुन: बुलाने की शक्ति का प्रयोग केवल इसलिये नहीं किया जाना चाहिये कि साक्ष्य उपयोगी हो सकता है, अपितु इसलिये कि उसकी अनुपस्थिति निर्णय को अन्यायपूर्ण बना देगी।" न्यायमूर्ति विक्टोरिया गौरी |
स्रोत: मद्रास उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
मद्रास उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति विक्टोरिया गौरी की अध्यक्षता वाली एकल पीठ ने अनबू बनाम तमिलनाडु राज्य (2026) मामले में विचारण न्यायालय के उस आदेश को अपास्त कर दिया, जिसमें अभियोजन साक्ष्य बंद होने और अभियुक्त की परीक्षा के बाद अभियोजन पक्ष को अपने अन्वेषण अधिकारी को पुन: बुलाने की अनुमति दी गई थी। पीठ ने यह माना कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 348 - जो दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 311 के अनुरूप है - को विचारण के अंतिम प्रक्रम में कमजोर मामले को सुधारने के साधन के रूप में प्रयोग नहीं किया जा सकता है।
अनबू बनाम तमिलनाडु राज्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- याचिकाकर्ता अंबु पर भारतीय दण्ड संहिता (IPC) की धारा 302 के अधीन अपराध के लिये कुंभकोणम के अपर जिला एवं सेशन न्यायाधीश के समक्ष विचारण चल रहा था।
- अभियोजन पक्ष के अनुसार, अनबू मृतक के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ था, जिसने उसे 14,00,000 रुपए मूल्य के कृषि उत्पाद बेचने के लिये सौंपे थे। आरोप है कि अनबू ने उत्पाद बेच दिये लेकिन उससे प्राप्त राशि जमा नहीं की।
- जब मृतक ने सामान या पैसे वापस करने की मांग की, तो अनबू उसे अपनी कार में ले गया, उस पर लाठी से हमला किया और शव को पानी में फेंक दिया।
- प्रतिरक्षा पक्ष के साक्ष्य प्रस्तुत करने की शुरुआत होने ही वाली थी कि अभियोजन पक्ष ने कॉल डिटेल रिकॉर्ड, सिम कार्ड विवरण और बैंक खाता विवरण सहित दस्तावेज़ों पर निशान लगाने के उद्देश्य से अन्वेषण अधिकारी को पुन: बुलाने के लिये एक आवेदन दायर किया।
- विचारण न्यायालय ने आवेदन को मंजूर कर लिया, जिसके विरुद्ध वर्तमान याचिका उच्च न्यायालय में दायर की गई है।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- आपराधिक विचारण की प्रकृति पर: न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि आपराधिक विचारण अभियोजन पक्ष और प्रतिरक्षा पक्ष के बीच रणनीति का खेल नहीं है, अपितु सत्य की एक गंभीर न्यायिक खोज है। न्यायालय ने कहा कि यह खोज निष्पक्षता, वैधता और प्रक्रियात्मक अनुशासन की सीमाओं के भीतर ही होनी चाहिये।
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 348 के दायरे पर: न्यायालय ने माना कि धारा 348 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में "किसी भी प्रक्रम में" वाक्यांश का प्रयोग किया गया है, जिसका अर्थ "बिना कारण के किसी भी प्रक्रम में" नहीं लगाया जा सकता। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष के साक्ष्य प्रस्तुत करने और अभियुक्त से पूछताछ किये जाने के बाद पुनः साक्ष्य प्रस्तुत करने की मांग करते समय न्यायिक संतुष्टि का उच्च स्तर आवश्यक है। अभियोजन पक्ष के मामले को मजबूत करने वाले प्रत्येक दस्तावेज़ को इस प्रक्रम में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता - केवल वही साक्ष्य प्रस्तुत किये जा सकते हैं जिनकी अनुपस्थिति निर्णय को अन्यायपूर्ण बना देगी।
- विचारण न्यायालय की विफलता पर: न्यायालय ने पाया कि विचारण न्यायालय ने यह परीक्षा किये बिना एक यांत्रिक और अस्पष्ट आदेश पारित किया था कि क्या पुन: पेश किये जाने वाले साक्ष्य वास्तव में न्यायपूर्ण निर्णय के लिये अपरिहार्य थे। विचारण न्यायालय ने इस बात पर विचार नहीं किया कि अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों की समाप्ति और अभियुक्त की पूछताछ के बाद पेश किये जाने वाले साक्ष्य को बिना परीक्षा के क्यों प्रस्तुत नहीं किया जा सकता था।
- अभियुक्त के प्रति पूर्वाग्रह के संबंध में: न्यायालय ने माना कि पुनः सुनवाई की अनुमति देना अभियोजन पक्ष को अपने ही मामले में उन कमियों को भरने की अनुमति देने के समान होगा, जो प्रतिरक्षा पक्ष द्वारा प्रतिपरीक्षा के दौरान उजागर हुई थीं। इस प्रकार की कार्रवाई अभियुक्त के प्रति गंभीर पूर्वाग्रह का कारण बनेगी और संविधान के अनुच्छेद 21 के अधीन निष्पक्ष विचारण के अधिकार के विरुद्ध होगी।
- न्यायालय ने तदनुसार विवादित आदेश को अपास्त कर दिया।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 348 क्या है?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 348— आवश्यक साक्षी को समन करने या उपस्थित व्यक्ति की परीक्षा करने की शक्ति
प्रावधान का पाठ:
इस संहिता के अंतर्गत किसी भी जांच, विचारण या अन्य कार्यवाही के किसी भी प्रक्रम में कोई भी न्यायालय:
- किसी व्यक्ति को साक्षी के रूप में समन कर सकता है, या
- उपस्थित किसी भी व्यक्ति की परीक्षा कर सकता है, भले ही उसे साक्षी के रूप में समन न किया गया हो, या
- किसी व्यक्ति को जिसकी पहले परीक्षा की जा चुकी है पुनः बुला सकता है और उसकी पुनः परीक्षा कर सकता है;
और यदि न्यायालय को मामले के न्यायसंगत विनिश्चय के लिये किसी ऐसे व्यक्ति का साक्ष्य आवश्यक प्रतीत होता है तो वह ऐसे व्यक्ति को समन करेगा और उसकी परीक्षा करेगा या उसे पुलः बुलाएगा और उसकी पुनः परीक्षा करेगा।
प्रमुख विशेषताएँ:
- एक ही उपबंध में दो पहलू:
- विवेकाधीन प्रावधान — न्यायालय किसी भी प्रक्रम पर किसी भी साक्षी को समन कर सकता है, उसकी परीक्षा कर सकता है या उसे पुन: बुला सकता है।
- अनिवार्य पक्ष — यदि साक्ष्य मामले के न्यायसंगत निर्णय के लिये आवश्यक हो तो न्यायालय ऐसा करेगा।
- प्रयोज्यता: यह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अंतर्गत किसी भी जांच, विचारण या अन्य कार्यवाही पर लागू होता है - केवल विचारणों तक सीमित नहीं है।
- आह्वान का प्रक्रम: इसका प्रयोग किसी भी प्रक्रम में किया जा सकता है, लेकिन न्यायालयों ने इसका अर्थ पर्याप्त न्यायिक कारण के साथ किसी भी प्रक्रम में लगाया है, न कि एक व्यापक अनुमति के रूप में।
- किसे समन किया जा सकता है: कोई भी व्यक्ति - चाहे उसकी पहले परीक्षा न हुई हो, उसकी परीक्षा हो चुकी हो, या वह केवल न्यायालय में उपस्थित हो लेकिन उसे औपचारिक रूप से समन न किया गया हो।
- उद्देश्य: प्रक्रियात्मक खामियों के कारण महत्त्वपूर्ण साक्ष्यों के नष्ट न होने को सुनिश्चित करके न्याय की विफलता को रोकना।