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सांविधानिक विधि

इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल मामला

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 02-Apr-2025

स्रोत: द इंडियन एक्सप्रेस 

परिचय 

हाल ही में इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल पर आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को मुफ्त चिकित्सा उपचार प्रदान करने के लिये अपने पट्टे के दायित्वों का पालन न करने का आरोप लगा है। 15 एकड़ सरकारी भूमि पर निर्मित इस अस्पताल को 1 रुपये प्रति माह की मामूली दर पर पट्टे पर दिया गया है। उच्चतम न्यायालय ने अस्पताल को मूल पट्टा करार में निर्धारित गरीब रोगियों को मुफ्त उपचार प्रदान करने के दायित्वों को पूरा करने का निर्देश दिया है। उच्चतम न्यायालय के हालिया आदेश में इन दायित्वों के अनुपालन, सार्वजनिक संसाधनों के संभावित दुरुपयोग और कमज़ोर आबादी को स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित करने के विषय में महत्त्वपूर्ण चिंताओं को निर्धारित करने के लिये अस्पताल के रिकॉर्ड का व्यापक निरीक्षण करने की अनुशंसा की गई है।

एम. डी. के द्वारा इंद्रप्रस्थ मेडिकल कॉरपोरेशन लिमिटेड बनाम ऑल इंडिया लॉयर्स यूनियन (दिल्ली यूनिट) मामले की पृष्ठभूमि क्या है?

  • वर्ष 1994 में, दिल्ली के सरिता विहार में 15 एकड़ जमीन इंद्रप्रस्थ मेडिकल कॉरपोरेशन लिमिटेड (IMCL) तथा इसकी संबद्ध संस्थाओं को 1 रुपये प्रति माह की मामूली दर पर पट्टे पर दी गई थी। इस उद्यम में दिल्ली सरकार की 26% भागीदारी है।
  • पट्टा विलेख के अनुसार, अस्पताल को अपने बिस्तरों की क्षमता के एक तिहाई और अपने आउटडोर रोगियों के 40% तक गरीब रोगियों को मुफ्त इलाज उपलब्ध कराने की बाध्यता थी।
  • वर्ष 1986: दिल्ली प्रशासन ने "नो प्रॉफिट नो लॉस" के आधार पर एक बहु-विषयक सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल स्थापित करने की योजना बनाई।
  • 11 मार्च 1988: भारत के राष्ट्रपति (दिल्ली के उपराज्यपाल के माध्यम से) ने अपोलो हॉस्पिटल एंटरप्राइजेज लिमिटेड के साथ एक संयुक्त उद्यम करार किया, जिसमें यह निर्धारित किया गया कि प्रस्तावित कंपनी कुल 600 बिस्तरों में से कम से कम 33% और OPD रोगियों के 40% को मुफ्त चिकित्सा सुविधाएँ प्रदान करेगी।

  • 21 अप्रैल 1988: दिल्ली सरकार और IMCL ने दिल्ली-मथुरा रोड पर एक रुपये प्रति माह की मामूली दर पर जमीन के लिये एक पट्टा करार किया। 
  • जुलाई 1996: इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल आंशिक रूप से चालू हुआ। 
  • 24 जनवरी 1997: IMCL के निदेशक मंडल के अध्यक्ष ने उल्लेख किया कि अस्पताल को मुफ्त रोगी सुविधा शुरू करने पर विचार करना चाहिये, लेकिन प्रबंधन ने यह रुख अपनाया कि पट्टा विलेख उन्हें मुफ्त दवा या उपभोग्य वस्तुएँ प्रदान करने के लिये बाध्य नहीं करता है। 
  • 10 दिसंबर 1997: अखिल भारतीय अधिवक्ता संघ (दिल्ली) ने मुफ्त उपचार प्रावधानों को लागू करने की मांग करते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष एक जनहित याचिका दायर की। 
  • जनवरी 1998: IMCL ने स्वयं को एक "वाणिज्यिक उद्यम" बताया तथा मुफ्त चिकित्सा सहायता प्रदान करने के उत्तरदायित्व से मना कर दिया। 
  • जुलाई 1998: दिल्ली सरकार की एक समिति ने पाया कि निःशुल्क उपचार की व्यवस्था "अत्यधिक असंतोषजनक" है, तथा आवश्यक 200 बिस्तरों के स्थान पर केवल 75 बिस्तर ही उपलब्ध थे।
  • 12 जून 2000: न्यायमूर्ति ए.एस. कुरैशी की अध्यक्षता वाली समिति ने पाया कि 650 में से केवल 20 बिस्तर ही निःशुल्क रोगियों के लिये उपयोग किये जा रहे थे, तथा निष्कर्ष निकाला कि अस्पताल ने निर्धारित शर्तों का उल्लंघन किया है। 
  • 5 मार्च 2003: न्यायालय द्वारा नियुक्त समिति ने गरीब रोगियों के लिये "गंभीर कमियों" तथा "भेदभावपूर्ण उपचार" की रिपोर्ट दी, जिसमें केवल 18.45% बिस्तर गरीबों के लिये उपलब्ध थे। 
  • 22 सितंबर 2009: दिल्ली उच्च न्यायालय ने अस्पताल को निर्देश दिया कि वह उपभोग्य सामग्रियों तथा दवाओं सहित किसी भी व्यय के लिये शुल्क लिये बिना निःशुल्क रोगियों को भर्ती करे तथा उनका उपचार करे। 
  • नवंबर 2009: IMCL ने इस आदेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी।

वर्तमान मुकदमेबाजी की स्थिति क्या है?

  • उच्चतम न्यायालय वर्तमान में IMCL द्वारा 2009 के दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली अपील पर सुनवाई कर रहा है। 
  • न्यायालय ने पाया है कि 1994 से मूल 30-वर्षीय पट्टा अब समाप्त हो चुका है तथा उसने निःशुल्क उपचार दायित्वों के अनुपालन का पता लगाने के लिये दिल्ली सरकार एवं भारत संघ द्वारा संयुक्त निरीक्षण का आह्वान किया है।

उच्चतम न्यायालय का अवलोकन एवं निर्देश क्या है?

  • न्यायालय ने पाया कि अस्पताल प्रबंधन ने पट्टा विलेख में स्पष्ट शर्तों के बावजूद गरीब मरीजों को मुफ्त इलाज मुहैया कराने के अपने दायित्व का पालन करने से मना कर दिया। 
  • न्यायालय ने प्रश्न किया कि क्या विशेष अनुमति याचिका के पैराग्राफ 'P' (200 मुफ्त बिस्तरों के संबंध में) के अनुसार लाभ भी गरीब मरीजों को दिये गए हैं। 
  • न्यायालय ने पाया कि मूल 30 वर्ष की पट्टा अवधि अब समाप्त हो चुकी है। 
  • न्यायालय ने दिल्ली सरकार एवं भारत संघ (स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय) को एक संयुक्त व्यापक स्थिति रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है, जिसमें निम्नलिखित शामिल हैं:
    • क्या पट्टे का नवीनीकरण किया गया है, और यदि हाँ, तो किन शर्तों पर। 
    • यदि पट्टे का नवीनीकरण नहीं किया गया है, तो सरकारी भूमि को बहाल करने के लिये क्या उपाय किये गए हैं। 
    • कम से कम पिछले 5 वर्षों के दौरान कुल बिस्तरों की संख्या तथा बाह्य रोगी के आने का रिकॉर्ड। 
  • कम से कम पिछले 5 वर्षों के दौरान कितने गरीब रोगियों ने इनडोर या आउटडोर उपचार प्राप्त किया है।
  • न्यायालय ने अस्पताल प्रबंधन को विशेषज्ञ समिति के साथ पूर्ण सहयोग करने तथा सभी प्रासंगिक अभिलेख प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। 
  • न्यायालय ने मौखिक रूप से चेतावनी दी है कि यदि अस्पताल निःशुल्क उपचार प्रदान करने के अपने दायित्वों का पालन नहीं करता है, तो इसका प्रबंधन अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) को सौंप दिया जाएगा। 
  • न्यायालय ने इस तथ्य पर खेद व्यक्त किया कि अस्पताल, जिसे "नो प्रॉफिट नो लॉस" के फार्मूले पर संचालन करना था, एक व्यावसायिक उद्यम में बदल गया है, जहाँ गरीब मरीज उपचार का खर्च नहीं उठा सकते। 
  • जब उन्हें बताया गया कि 26% शेयरधारिता के साथ दिल्ली सरकार ने भी अस्पताल की कमाई से लाभ कमाया है, तो न्यायमूर्ति कांत ने टिप्पणी की कि यह "सबसे दुर्भाग्यपूर्ण" है।

वित्तीय निहितार्थ क्या है?

  • दिल्ली उच्च न्यायालय में प्रस्तुत अस्पताल के आंकड़ों के अनुसार, अस्पताल के कुल राजस्व 391.19 करोड़ रुपये में से उपभोग्य सामग्रियों एवं दवाओं पर 186 करोड़ रुपये खर्च हुए।
  • इसके विपरीत, 600 बिस्तरों वाले सरकारी सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल जी.बी. पंत अस्पताल ने 2008 में उपभोग्य सामग्रियों एवं दवाओं पर केवल 23 करोड़ रुपये खर्च किये।
  • IMCL ने दावा किया है कि केवल मुफ्त दवाओं एवं चिकित्सा उपभोग्य सामग्रियों की लागत सालाना लगभग 67 करोड़ रुपये होगी, जबकि 31 मार्च, 2009 को समाप्त वर्ष के लिये उनका लाभ 24 करोड़ रुपये था।
  • अस्पताल ने तर्क दिया है कि मुफ्त दवाएँ एवं उपभोग्य वस्तुएँ प्रदान करने से उसके लगभग 35,000 साधारण शेयरधारकों के लाभांश पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

निष्कर्ष  

यह मामला निजी स्वास्थ्य सेवा संस्थाओं के दायित्वों की एक महत्त्वपूर्ण जाँच का प्रतिनिधित्व करता है जो सब्सिडी वाले भूमि पट्टों के माध्यम से सार्वजनिक संसाधन प्राप्त करते हैं। उच्चतम न्यायालय का हस्तक्षेप वाणिज्यिक स्वास्थ्य सेवा उपक्रमों एवं उनकी सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच तनाव को प्रकटित करता है, विशेषकर जब सार्वजनिक संसाधन शामिल होते हैं। अस्पताल द्वारा अपने निःशुल्क उपचार दायित्वों के अनुपालन के व्यापक ऑडिट के लिये न्यायालय का निर्देश संभवतः पूरे देश में इसी तरह की व्यवस्थाओं के लिये एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करेगा।