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महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व

न्यायमूर्ति नवीन चावला

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 04-Apr-2025

न्यायमूर्ति नवीन चावला कौन हैं 

  • न्यायमूर्ति नवीन चावला का जन्म 7 अगस्त 1968 को हुआ था और उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा दिल्ली पब्लिक स्कूल (DPS), मथुरा रोड से अपनी स्कूली शिक्षा प्राप्त की। 

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न्यायमूर्ति नवीन चावला का करियर कैसा रहा? 

  • न्यायमूर्ति नवीन चावला ने कैंपस लॉ सेंटर, दिल्ली विश्वविद्यालय के कैम्पस लॉ सेंटर से विधि में स्नातक (LL.B) की डिग्री प्राप्त की।  
  • वर्ष 1993 में उन्होंने दिल्ली राज्य बार काउंसिल में अधिवक्ता के रूप में नामांकन कराया, जिससे उनका विधिक व्यवसायिक जीवन औपचारिक रूप से प्रारंभ हुआ।   
  • उन्होंने 1999 में सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड के रूप में योग्यता प्राप्त की। 
  • उन्होंने दिल्ली उच्च न्यायालय, उच्चतम न्यायालय और अन्य न्यायिक/अर्ध-न्यायिक मंचों में अभ्यास पर अधिवक्ता के रूप में अभ्यास किया 
  • उन्हें दिनांक 15 मई 2017 को दिल्ली उच्च न्यायालय के स्थायी न्यायाधीश के रूप में पुष्टि प्रदान की गई, जिससे न्यायपालिका में उनकी स्थिति और अधिक सुदृढ़ हुई। 

न्यायमूर्ति नवीन चावला के उल्लेखनीय निर्णय क्या हैं? 

  • जीवराज सिंह शेखावत बनाम भारत संघ और अन्य (2022) 
    • दिल्ली उच्च न्यायालय की खंडपीठ, जिसमें न्यायमूर्ति नवीन चावला एवं न्यायमूर्ति शालिंदर कौर सम्मिलित थे, ने केन्द्रीय रिज़र्व पुलिस बल (CRPF) के एक अधिकारी से संबंधित मामले को संबोधित किया। 
    • अधिकारी को CRPF ग्रुप '' (सामान्य ड्यूटी) अधिकारी भर्ती नियम, 2010 के तहत अयोग्यता के कारण पदोन्नति से वंचित कर दिया गया था, जिसमें ग्रुप '' की 10 वर्ष की सेवा की आवश्यकता थी, जो विदेश में उनकी पोस्टिंग से प्रभावित थी। 
    • न्यायालय ने कहा कि अधिकारी की स्थिति पूर्णतः उनके नियंत्रण से परे थी, क्योंकि विदेश में पोस्टिंग के कारण पात्रता की शर्त पूरी नहीं हुई। 
  • मेसर्स होटल मरीना और अन्य बनाम विभा मेहता (2024) 
    • न्यायमूर्ति नवीन चावला की एकलपीठ ने मेसर्स होटल मरीना नामक भागेदारी फर्म के विघटन से संबंधित 2006 की डिक्री के निष्पादन से उपजे विवाद पर निर्णय पारित किया। यह डिक्री एक समझौता करार पर आधारित थी, जिसमें व्यतिकारी वचनों का निर्वहन अपेक्षित था—जिसमें डिक्रीदार (DH) द्वारा ₹2 करोड़ का भुगतान तथा प्रतिवादी निर्णीतऋणी (JD) द्वारा आवश्यक विधिक दस्तावेज़ों का निष्पादन सम्मिलित था।   
    • डिक्रीदार (DH) ने यह तर्क प्रस्तुत किया कि DH द्वारा दिनांक 30.03.2006 तक ₹2 करोड़ का भुगतान न किया जाना समझौते को अमान्य कर देता है, जबकि डिक्रीदार (DH) ने यह प्रतिवाद किया कि निर्णीतऋणी (JD) द्वारा विधिक दस्तावेज़ों के निष्पादन से इंकार करने के कारण भुगतान किया जाना व्यावहारिक रूप से असंभव हो गया।  
    • न्यायालय ने माना कि संविदा अधिनियम की धारा 51 और 52 के अधीन, व्यतिकारी वचनों को एक साथ पूरा किया जाना चाहियेडिक्रीदार (DH) ने भुगतान करने की तत्परता दिखाई, किंतु दस्तावेजों को निष्पादित करने की निर्णीतऋणी (JD) की अनिच्छा ने डिक्रीदार (DH) द्वारा भुगतान रोके रखने को उचित ठहराया।  
    • अतः, न्यायालय ने निर्णीतऋणी (JD) की आपत्तियों को अस्वीकार करते हुए निष्पादन याचिका को स्वीकार कर लिया, एवं निर्णीतऋणी (JD) को आदेशित किया कि वह चार सप्ताह की अवधि में डिक्रीदार (DH) को ₹1,00,000 (एक लाख रुपए) की लागत राशि का भुगतान करे।  
  • इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया और ओआरएस बनाम नेटफ्लिक्स एंटरटेनमेंट सर्विसेज इंडिया एलएलपी और अन्य (2024) 
    • इस मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने नेटफ्लिक्स पर शो त्रिभुवन मिश्रा CA टॉपर की रिलीज पर रोक लगाने की याचिका खारिज कर दी। 
    • न्यायमूर्ति नवीन चावला ने कहा कि ट्रेलर में किसी भी तरह से चार्टर्ड अकाउंटेंसी (CA) पेशे का संदर्भ नहीं दिया गया है। 
    • न्यायालय ने टिप्पणी की कि यह श्रृंखला एक कॉमेडी प्रतीत होती है और इसमें नायक को केवल चार्टर्ड अकाउंटेंसी (CA) परीक्षा टॉपर के रूप में वर्णित किया गया है। 
    • न्यायालय ने शो की रिलीज पर कोई प्रतिबंध लगाने से इंकार कर दिया। 
  • अमरजीत सिंह ढिल्लों बनाम दिल्ली राज्य एनसीटी (2024) 
    • दिल्ली उच्च न्यायालय ने यह अभिप्रेत किया कि सांविधिक जमानत का प्रदान किया जाना एक अंतिम आदेश होता है, न कि एक अंतरिम आदेश (interlocutory order), क्योंकि अभियोजन पक्ष द्वारा निर्धारित 60/90 दिनों की अवधि में आरोपपत्र दाखिल न किये जाने की स्थिति में अभियुक्त को जमानत पर रिहा किया जाता है। 
    • न्यायमूर्ति नवीन चावला ने महानगर मजिस्ट्रेट (Metropolitan Magistrate) द्वारा पूर्व में दी गई सांविधिक जमानत को सेशन न्यायालय द्वारा पलटने के विरुद्ध  अभियुक्त की याचिका को खारिज कर दिया। 
    • न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि महानगर मजिस्ट्रेट के आदेशों में स्पष्ट असंगति परिलक्षित होती है, क्योंकि उक्त प्राथमिकी (FIR) में पूर्ववर्ती आदेश में भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 467 के अधीन प्रथम दृष्टया मामला स्थापित माना गया था, जबकि बाद के आदेश में इसका विरोधाभास देखा गया।  
    • न्यायालय ने अभियुक्त को दो सप्ताह की अवधि में आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया, साथ ही यह स्वतंत्रता प्रदान की कि वह नियमित जमानत के लिये आवेदन प्रस्तुत कर सकता है, जिसे विचारण न्यायालय को त्वरित रूप से, उसके गुण-दोष के आधार पर निर्णय करना होगा