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आपराधिक कानून

तारकेश्वर साहू बनाम बिहार राज्य (अब झारखंड)

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 02-Apr-2025

परिचय

  • यह एक ऐतिहासिक निर्णय है, जिसमें न्यायालय ने कहा कि बलात्संग के प्रयास का अपराध गठित करने के लिये प्रवेशन आंशिक या पूर्ण होना ही चाहिये। 
  • यह निर्णय न्यायमूर्ति एस.बी. सिन्हा एवं न्यायमूर्ति दलवीर भंडारी की दो न्यायाधीशों वाली पीठ ने दिया।

तथ्य

  • 18 फरवरी 1998 को लगभग 1:30 बजे 12 वर्षीय तारा मुनि कुमारी शौच के लिये अपने घर से बाहर गई थी।
  • अपीलकर्त्ता तारकेश्वर साहू ने कथित तौर पर उसे यौन उत्पीड़न करने के आशय से बलपूर्वक अपने घर से कुछ फीट की दूरी पर स्थित अपनी गुमटी (एक छोटी सी संरचना) में ले गया।
  • अभियोक्ता ने शोर मचाया, जिससे कई पड़ोसी एवं उसके पिता (राम चरण बैठा, PW संख्या. 1) सतर्क हो गए।
  • उसकी चीखें सुनकर उसके पिता एवं अन्य ग्रामीणों के शीघ्र पहुँचने के कारण, अपीलकर्त्ता उस पर हमला करने के अपने प्रयास में सफल नहीं हो सका।
  • अभियोक्ता के पिता अन्य ग्रामीणों के साथ पुलिस स्टेशन गए तथा घटना के एक घंटे के अंदर 2:30 बजे प्राथमिकी दर्ज कराई।
  • अपीलकर्त्ता पर भारतीय दण्ड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 376/511 (बलात्संग का प्रयास) के अंतर्गत आरोप लगाया गया था। 
  • अभियोजन पक्ष ने दस साक्षियों का शिनाख्त परेड किया, जिसमें PW संख्या. 1 से PW संख्या. 5 ने अभियोजन पक्ष के मामले का समर्थन करते हुए लगातार गवाही दी। 
  • कुछ साक्षियों (PW संख्या. 7, PW संख्या. 8 एवं PW संख्या. 9) को बाद में पक्षद्रोही घोषित कर दिया गया, हालाँकि अभियोक्ता (PW संख्या. 7) ने प्रतिपरीक्षा में स्वीकार किया कि "तारकेश्वर साहू ने मेरे साथ बलात्संग करने की कोशिश की, लेकिन मेरे द्वारा किये गए विरोध के कारण सफल नहीं हुआ।" 
  • अधीनस्थ न्यायालय ने अपीलकर्त्ता को दोषी पाया तथा उसे सात वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई। 
  • झारखंड उच्च न्यायालय ने अपीलकर्त्ता की अपील को खारिज कर दिया, यह पाते हुए कि अभियोजन पक्ष ने कुछ साक्षियों के पक्षद्रोही होने के बावजूद मामले को उचित संदेह से परे सिद्ध कर दिया था।

शामिल मुद्दे

  • क्या अपीलकर्त्ता को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 एवं धारा 511 के अंतर्गत बलात्संग के प्रयास के लिये उत्तरदायी माना जा सकता है?

टिप्पणी 

  • न्यायालय ने माना कि IPC की धारा 376 के अधीन बलात्संग की सजा के लिये प्रवेशन एक आवश्यक घटक है, जो इस मामले में गायब था। 
  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बलात्संग की सजा के लिये आंशिक या पूर्ण प्रवेशन भी पर्याप्त होगा, लेकिन इस मामले में प्रवेशन या प्रवेशन के प्रयास का कोई साक्ष्य नहीं था। 
  • अपीलकर्त्ता ने न तो स्वयं कपड़े उतारे थे तथा न ही अभियोक्ता से कपड़े उतारने को कहा था, जिससे प्रवेशन के किसी भी प्रयास की संभावना को खारिज कर दिया गया। 
  • न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि साक्ष्यों के आधार पर IPC की धारा 376/511 (बलात्संग का प्रयास) के अधीन दोषसिद्धि कायम नहीं रह सकती। 
  • न्यायालय ने पाया कि किया गया अपराध तैयारी के प्रारंभिक चरण में था तथा इसे IPC की धारा 366 (अपहरण) एवं 354 (महिला की शील भंग करना) के अधीन वर्गीकृत किया जाना बेहतर है। 
  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि शील एक ऐसा गुण है जो एक वर्ग के रूप में महिलाओं से संबंधित है तथा किसी महिला की शालीनता को झकझोरने वाला कृत्य उसकी शील भंग करने के तुल्य हैं।
  • न्यायालय ने उच्च न्यायालय एवं अधीनस्थ न्यायालय के निर्णय को खारिज करते हुए अपीलकर्त्ता को IPC की धारा 366 एवं 354 के अधीन दोषी माना गया। 
  • अपीलकर्त्ता को IPC की धारा 366 के अधीन पाँच वर्ष की कैद एवं IPC की धारा 354 के अंतर्गत दो वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई, दोनों सजाएँ एक साथ चलेंगी।

 निष्कर्ष 

  • वर्तमान मामले में उच्चतम न्यायालय ने बलात्संग के प्रयास (IPC की धारा 376/511) के लिये दोषसिद्धि को खारिज कर दिया, क्योंकि इसमें प्रवेशन या प्रवेशन के प्रयास के अपर्याप्त साक्ष्य पाए गए। 
  • इसके अतिरिक्त, न्यायालय ने अपीलकर्त्ता को धारा 366 (अपहरण) एवं 354 (शील भंग) के अधीन दोषी माना तथा उसे क्रमशः पाँच वर्ष एवं दो वर्ष के कारावास की सजा दी, जो एक साथ चलेंगी।