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सिविल कानून
पी राधा बाई बनाम पी अशोक कुमार (2018)
«28-Feb-2025
परिचय
- यह एक ऐतिहासिक निर्णय है जो मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 34(3) के अधीन परिसीमा अवधारित करते समय परिसीमा अधिनियम, 1963 की धारा 17 की प्रयोज्यता के बारे में बात करता है।
- यह निर्णय न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर और न्यायमूर्ति एनवी रमना की 2 न्यायाधीशों की पीठ द्वारा परिदत्त किया गया।
तथ्य
- वर्तमान तथ्यों में श्री पी. किशन लाल एक व्यवसाय चलाते थे और उनके पास कई संपत्तियाँ थीं।
- उनकी मृत्यु के पश्चात्, उनकी संपत्ति आठ विधिक उत्तराधिकारियों (अपीलार्थी 1-6 और प्रतिवादी 1-2) को विरासत में मिली।
विवाद और मध्यस्थता:
- संपत्ति विभाजन को लेकर विधिक उत्तराधिकारियों के बीच विवाद उत्पन्न हो गया।
- विवाद को सुलझाने के लिये पाँच मध्यस्थ नियुक्त किये गए।
- 18 फरवरी 2010 को मध्यस्थों ने सर्वसम्मति से पंचाट जारी किया, जिसे 21 फरवरी 2010 को सभी पक्षों ने स्वीकार कर लिया।
समझौता ज्ञापन (MoU):
- निर्णय के पश्चात्, अपीलार्थियों और प्रतिवादियों ने प्रतिवादी संख्या 1 को अतिरिक्त संपत्तियां देते हुए एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये
- अपीलार्थियों ने अपेक्षित उपहार और विलेखों को निष्पादित करने में विलंब किया।
पंचाट का निष्पादन और विलंब:
- अपीलार्थियों ने पंचाट को चुनौती देने की समय-सीमा समाप्त होने के पश्चात् निष्पादन याचिका दायर की।
- विचारण न्यायालय ने धारित किया कि निष्पादन याचिका बनाए रखने योग्य नहीं थी, परंतु उच्च न्यायालय ने इस निर्णय को उलट दिया।
पंचाट को चुनौती:
- 8 फरवरी 2011 को, प्रतिवादियों ने मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 34 (3) के अधीन एक आवेदन दायर किया, जिसमें पंचाट प्राप्त करने के 236 दिन पश्चात् इसे अपास्त करने की मांग की गई।
- उन्होंने विलंब के लिये क्षमा के लिये परिसीमा अधिनियम, 1963 की धारा 5 के अधीन एक आवेदन भी दायर किया, जिसमें निम्नलिखित का हवाला दिया गया:
क) विधिक ज्ञान की कमी,
ख) समझौता ज्ञापन के माध्यम से सुलह के प्रयास,
ग) एक प्रतिवादी की बीमारी।
विचारण न्यायालय का निर्णय (21 फरवरी 2012):
- विलंब क्षमा आवेदन को खारिज कर दिया।
- माना कि परिसीमा अधिनियम की धारा 5 और माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम की धारा 34 पर लागू नहीं होती।
- कहा कि न्यायालय परिसीमा अवधि को तीन महीने और 30 दिन से आगे नहीं बढ़ा सकता।
- प्रतिवादियों द्वारा विधि की अज्ञानता और बीमारी सहित विलंब के कारणों को अस्वीकार कर दिया।
उच्च न्यायालय का आदेश (18 जून 2012):
- धारा 34 के आवेदन में परिसीमा अधिनियम की धारा 17 की प्रयोज्यता की परीक्षा करने के लिये मामले को विचारण न्यायालय में वापस भेज दिया।
उच्चतम न्यायालय में अपील:
- अपीलार्थियों ने उच्च न्यायालय के प्रतिप्रेषण आदेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी।
शामिल मुद्दा
- क्या माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम की धारा 34(3) के अधीन परिसीमा अवधि अवधारित करते समय परिसीमा अधिनियम की धारा 17 (जो कपट या भूल से संबंधित है) लागू होती है?
अभिनिर्धारण
- न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि यद्यपि वह सामान्यतः धारा 17 की प्रयोज्यता पर विचार करने के लिये मामले को पुनः उच्च न्यायालय को प्रतिप्रेषित करने के लिये सहमत होता, परंतु विवाद के समाधान में अत्यधिक विलंब के कारण निश्चायक अवधारण की आवश्यकता थी।
- न्यायालय ने टिप्पणी की कि परिसीमा अधिनियम की धारा 29(2) में प्रावधान है कि धारा 4 से धारा 24 तक के (जिनके अंतर्गत ये दोनों धाराएं भी आती हैं) उपबंध केवल वहीं तक और उसी विस्तार तक लागू होंगे जहाँ तक और जिस विस्तार तक वे उस विशेष या स्थानीय विधि द्वारा अभिव्यक्त तौर पर अपवर्जित न हों।
- न्यायालय ने अवधारित किया कि "अभिव्यक्त अपवर्जन" को स्पष्ट रूप से कहने की आवश्यकता नहीं है, अपितु विशेष विधि की भाषा, योजना और उद्देश्य से इसका अनुमान लगाया जा सकता है।
- न्यायालय ने पाया कि माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम की धारा 34(3) अभिव्यक्त रूप से परिसीमा अधिनियम की धारा 17 को अपवर्जित करती है क्योंकि परंतुक में "परंतु तत्पश्चात नहीं " वाक्यांश किसी पंचाट को चुनौती देने के लिये 120 दिनों की अनिवार्य बाहरी सीमारेखा बनाता है।
- न्यायालय ने इस बात पर प्रकाश डाला कि माध्यस्थम् अधिनियम का उद्देश्य त्वरित विवाद समाधान प्रदान करना है, और धारा 17 को लागू करने की अनुमति देने से 120 दिन की अवधि से परे चुनौतियों को सक्षम करके इस उद्देश्य को कमजोर किया जाएगा।
- न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि धारा 34(3) मध्यस्थता कार्यवाही में "अखंडित" के सिद्धांत को दर्शाती है, जिसका अर्थ है कि पंचाटों को चुनौती देने की समय सीमा निश्चित होनी चाहिए।
- न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि एक बार जब कोई पक्षकार मध्यस्थता पंचाट प्राप्त कर लेता है, तो उसे इसकी जानकारी होती है और परिसीमा अवधि शुरू हो जाती है, जिसके पश्चात् धारा 17 लागू नहीं होती।
- इस विशिष्ट मामले में, न्यायालय ने अवधारित किया कि चूँकि प्रतिवादियों को 21 फरवरी, 2010 को पंचाट प्राप्त हुआ था, इसलिये परिसीमा अवधि पहले ही शुरू हो चुकी थी, भले ही 9 अप्रैल, 2010 को निष्पादित समझौता ज्ञापन में पश्चात् में कोई कपट का आरोप लगाया गया हो।
- न्यायालय ने अंततः अपीलों को अनुमति दे दी, 18 जून, 2012 के उच्च न्यायालय के निर्णय को खारिज कर दिया, और आपत्तियां दायर करने में 236 दिनों के विलंब को क्षमा करने के आदेश को भी अपास्त कर दिया।
निष्कर्ष
उच्चतम न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि परिसीमा धिनियम की धारा 17 को माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम की धारा 34(3) पर लागू होने से स्पष्ट रूप से बाहर रखा गया है, क्योंकि इसके आवेदन की अनुमति देने से माध्यस्थम् पंचाटों के त्वरित समाधान और अंतिमता को सुनिश्चित करने के विधायी प्रयोजन को निष्फल करेगा, जैसा कि "परंतु तत्पश्चात नहीं " वाक्यांश से साबित होता है, जो पंचाटों को चुनौती देने के लिये 120-दिन की अनिवार्य बाहरी सीमारेखा बनाता है।