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सिविल कानून

सरोगेसी अधिनियम के अंतर्गत आयु-सीमा वैध

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 13-Jan-2026

सीमा चक्रवर्ती एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य। 

ये उपाय वैध राज्य हितों की पूर्ति के लिये किये गए हैंविधायिका के उद्देश्य के साथ इनका तर्कसंगत संबंध हैऔर इन्हें अत्यधिक या दमनकारी नहीं कहा जा सकता। व्यक्तिगत कठिनाईचाहे वह कितनी ही वास्तविक क्यों न होलोकहित में बनाई गई किसी वैधानिक नीति को अमान्य करने या शिथिल करने का आधार नहीं बन सकती।” 

मुख्य न्यायाधीश आशुतोष कुमार और न्यायमूर्ति अरुण देव चौधरी 

स्रोत: गुवाहाटी उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

सीमा चक्रवर्ती एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य (2025)के मामले में मुख्य न्यायाधीश आशुतोष कुमार और न्यायमूर्ति अरुण देव चौधरी की खंडपीठ नेयह कहा कि सरोगेसी को नियंत्रित करने वाले वैधानिक प्रतिबंध सांविधानिक रूप से वैध हैं और व्यक्तिगत परिस्थितियों के आधार पर इनमें ढील नहीं दी जा सकती है। 

सीमा चक्रवर्ती एवं अन्यबनाम भारत संघ एवं अन्य  (2025) के मामलेकी पृष्ठभूमि क्या थी  ?  

  • यह रिट याचिका एक विवाहित दंपति द्वारा दायर की गई थी जिसमें उन्होंनेनिर्धारित आयु सीमा पार करने के बादऔर दाता-युग्मक संबंधी संशोधित प्रतिबंधों के कारण सरोगेसी कराने के लिये अपनी अपात्रता को चुनौती दी थी। 
  • याचिकाकर्ता चिकित्सकीय रूप से प्रमाणित ऐसी स्थितियों से पीड़ित थे जिनके कारण प्राकृतिक गर्भाधान असंभव था। 
  • उन्होंने इससे पहले न्यायालय की अनुमति से सरोगेसी का प्रयास किया थालेकिन चिकित्सकीय कारणों से यह प्रयास विफल रहा। 
  • जब 14.03.2023 का संशोधन लागू हुआतब याचिकाकर्ताओं की कोई सरोगेसी प्रक्रिया जारी नहीं थीक्योंकि पिछला प्रयास पहले ही विफल हो चुका था। 
  • इस बीचयाचिकाकर्ताओं ने सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम 2021 की धारा 4(iii)()(I) के अधीन निर्धारित ऊपरी आयु सीमा को पार कर लिया। 
  • इसके बाद जब याचिकाकर्ताओं ने सरोगेसी शुरू करने के लिये नई अनुमति मांगीतो अधिकारियों ने वैधानिक अपात्रता और संशोधित फॉर्म-का अनुपालन न करने के आधार पर अनुरोध को अस्वीकार कर दिया। 
  • याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि अस्वीकृति भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के अधीन उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है। 
  • उन्होंने तर्क दिया कि प्रजनन संबंधी स्वायत्तता व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा का एक अभिन्न अंग है। 
  • उन्होंने तर्क दिया कि जब उन्होंने पहली बार सरोगेसी का प्रयास किया था तब वे इसके लिये पात्र थे और प्रक्रिया की विफलता अनैच्छिक थी। 
  • याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि बाद में किये गए वैधानिक परिवर्तनों को उनके पितृत्व के अधिकार को स्थायी रूप से समाप्त करने के लिये लागू नहीं किया जा सकता है। 
  • फॉर्म-में किये गए संशोधन को विवेकाधीन बताकर इसकी आलोचना की गईक्योंकि दाता युग्मकों की अनुमति एकल महिलाओं की विशिष्ट श्रेणियों के लिये तो हैलेकिन विवाहित जोड़ों के लिये नहीं। 

न्यायालय की क्याटिप्पणियां थीं? 

पात्रता और वैधानिक अनुपालन पर : 

  • न्यायालय ने यह कहा कि पात्रता की शर्तें लाभ का दावा किये जाने की तिथि पर पूरी होनी चाहियेजब तक कि विधि में स्पष्ट रूप से अन्यथा प्रावधान न हो। 
  • हालांकि पहले किये गए सरोगेसी के प्रयास की विफलता दुर्भाग्यपूर्ण थीलेकिन इससे बाद में अधिनियमित या संशोधित वैधानिक आवश्यकताओं की अवहेलना करते हुए सरोगेसी को फिर से शुरू करने का कोई निहित अधिकार प्राप्त नहीं होता है। 
  • न्यायालय ने पाया कि सरोगेसी के संदर्भ मेंआयु सीमा स्पष्ट रूप से बच्चे के स्वास्थ्यदीर्घायु और दीर्घकालिक कल्याण से संबंधित चिंताओं से जुड़ी हुई है। 

वैध अपेक्षा पर : 

  • न्यायालय ने वैध अपेक्षा की दलील को खारिज कर दिया। 
  • न्यायालय ने यह माना कि वैध अपेक्षा को न तो किसी विधि के विरुद्ध संचालित किया जा सकता है और न ही इसे किसी स्पष्ट विधायी आदेश को विफल करने के लिये इस्तेमाल किया जा सकता है। 

दाता युग्मकों पर प्रतिबंध के संबंध में : 

  • न्यायालय ने विवाहित जोड़ों द्वारा दाता युग्मकों के उपयोग को प्रतिबंधित करने वाले संशोधित प्रपत्र-को बरकरार रखा। 
  • यह प्रतिबंध एक नीतिगत विकल्प को दर्शाता है जिसका उद्देश्य बच्चे और भावी माता-पिता के बीच आनुवंशिक संबंध सुनिश्चित करना हैएक ऐसा विचार जिसे संसद प्राथमिकता देने का हकदार था। 

पूर्वव्यापी प्रभाव पर : 

  • न्यायालय ने भूतलक्षी प्रभाव के तर्क को खारिज कर दिया। 
  • न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता संशोधन के लागू होने के बाद एक नई सरोगेसी प्रक्रिया शुरू करने की कोशिश कर रहे थे। 
  • विवादित प्रावधान भूतलक्षी रूप से लागू नहीं किये जा रहे हैंबल्कि अधिनियम 2021 और नियम 2022 के प्रारंभ या संशोधन के बाद शुरू किये गए सरोगेसी के नए प्रयास पर लागू किये जा रहे हैं। 

सांविधानिक वैधता पर : 

  • न्यायालय ने माना कि ये उपाय वैध राज्य हितों की पूर्ति करते हैं और विधि के उद्देश्य के साथ एक तर्कसंगत संबंध रखते हैं। 
  • इन प्रतिबंधों को अत्यधिक या दमनकारी नहीं कहा जा सकता। 
  • चाहे व्यक्तिगत कठिनाई कितनी भी वास्तविक क्यों न होसार्वजनिक हित में बनाई गई वैधानिक नीति को रद्द करने या उसमें ढील देने का आधार नहीं हो सकती। 
  • न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि यद्यपि वह याचिकाकर्ताओं की दुर्दशा से अनभिज्ञ नहीं हैलेकिन सांविधानिक न्यायनिर्णय केवल सहानुभूति के आधार पर नहीं किया जा सकता है। 
  • विवादित प्रावधान एक सुविचारित विधायी नीति का प्रतिनिधित्व करते हैं और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 या 21 का उल्लंघन नहीं करते हैं। 
  • तदनुसाररिट याचिका खारिज कर दी गई। 

सरोगेसी क्या है?  

  • सरोगेसी एकऐसी व्यवस्था है जिसमें एक महिला (सरोगेट)  किसी अन्य व्यक्ति या दंपत्ति (इच्छित माता-पिता) की ओर से बच्चे को गर्भ में धारण करने और जन्म देने के लिये सहमत होती है। 
  • सरोगेट माता, जिसे कभी-कभी जेस्टेशनल कैरियर भी कहा जाता हैवह महिला होती है जो किसी अन्य व्यक्ति या दंपत्ति (इच्छित माता-पिता) के लिये बच्चे को गर्भ धारण करती हैउसे जन्म देती है और उसे गर्भ धारण करने की प्रक्रिया से गुजरती है। 
  • सरोगेसीजिसमें गर्भावस्था के दौरान चिकित्सा खर्च और बीमा कवरेज के अलावा सरोगेट माता को कोई मौद्रिक मुआवजा नहीं दिया जाता हैउसे अक्सर परोपकारी सरोगेसी कहा जाता है।   
  • वह सरोगेसी जो बुनियादी चिकित्सा खर्चों और बीमा कवरेज से अधिक मौद्रिक लाभ या पुरस्कार (नकद या वस्तु के रूप में) के लिये की जाती हैउसे व्यावसायिक सरोगेसी कहा जाता है।   

भारत में सरोगेसी से संबंधित विधिक प्रावधान क्या हैं?  

सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021: 

  • सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021 के अंतर्गत, 35 से 45 वर्ष की आयु के बीच की विधवा या तलाकशुदा महिला याविधिक रूप से विवाहित महिला और पुरुष के रूप में परिभाषित दंपत्तियदि उनकी कोई चिकित्सीय स्थिति इस विकल्प को आवश्यक बनाती हैतो सरोगेसी का लाभ उठा सकते हैं। 
  • भावी दंपत्ति विधिक रूप से विवाहित भारतीय पुरुष और महिला होने चाहियेपुरुष की आयु 26-55 वर्ष के बीच और महिला की आयु 25-50 वर्ष के बीच होनी चाहियेऔर उनका कोई भी जैविकगोद लिया हुआ या सरोगेट बच्चा नहीं होना चाहिये।  
  • इसमें व्यावसायिक सरोगेसी पर भी प्रतिबंध लगाया गया हैजिसके लिये 10 वर्ष तक का कारावास और 10 लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। 
  • यह विधि केवल परोपकारी सरोगेसी की अनुमति देता हैजिसमें पैसों का लेन-देन न हो और जहां सरोगेट माता बच्चे की चाह रखने वाले व्यक्ति से आनुवंशिक रूप से संबंधित हो। 

सरोगेसी (विनियमन) नियम, 2022: 

  • सरोगेसी (विनियमन) नियम, 2022, जोसरोगेसी क्लिनिक के पंजीकरण और शुल्क के लिये प्रपत्र और तरीका तथा पंजीकृत सरोगेसी क्लिनिक में कार्यरत व्यक्तियों के लिये आवश्यकता और योग्यता प्रदान करता है। 
  • सरोगेसी क्लीनिक में कम से कम एक स्त्री रोग विशेषज्ञएक एनेस्थेटिस्टएक भ्रूण विशेषज्ञ और एक परामर्शदाता होना चाहिये।   
  • इच्छुक महिला या दंपत्ति को सरोगेट माता के पक्ष में छत्तीस महीने की अवधि के लिये किसी बीमा कंपनी या एजेंट से सामान्य स्वास्थ्य बीमा कवरेज खरीदना होगाजिसकी राशि गर्भावस्था से उत्पन्न होने वाली सभी जटिलताओं और प्रसवोत्तर जटिलताओं के सभी खर्चों को कवर करने के लिये पर्याप्त हो।   
  • सरोगेट माता पर किसी भी सरोगेसी प्रक्रिया के प्रयासों की संख्या तीन बार से अधिक नहीं होनी चाहिये।   
  • सरोगेट माता की सहमति प्रपत्र में निर्दिष्ट अनुसार होगी।   

सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी (विनियमन) अधिनियम, 2021: 

  • यह अधिनियमराष्ट्रीय सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी और सरोगेसी बोर्ड की स्थापना करके सरोगेसी संबंधी विधि के कार्यान्वयनके लिये एक प्रणाली प्रदान करता है।   
  • इसका उद्देश्य एआरटी क्लीनिकों और सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी बैंकों का विनियमन और पर्यवेक्षण करनादुरुपयोग की रोकथाम करना और एआरटी सेवाओं का सुरक्षित और नैतिक तरीके से संचालन सुनिश्चित करना है।