9 मार्च से शुरू हो रहे हमारे ऑल-इन-वन ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स के साथ अपनी ज्यूडिशियरी की तैयारी को मजबूत बनाएं | यह कोर्स अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों माध्यमों में उपलब्ध है।   |   आज ही हमारे ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स में एडमिशन लें और अपनी तैयारी को और बेहतर बनाएँ | हिंदी माध्यम बैच: 9 मार्च, सुबह 8 बजे   |   आज ही एडमिशन लें बिहार APO (प्रिलिम्स + मेन्स) कोर्स में और अपने सपनों को दे नई दिशा | ऑफलाइन एवं ऑनलाइन मोड में उपलब्ध | 12 जनवरी 2026  से कक्षाएँ आरंभ   |   एडमिशन ओपन: UP APO प्रिलिम्स + मेंस कोर्स 2025, बैच 6th October से   |   ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स (प्रयागराज)   |   अपनी सीट आज ही कन्फर्म करें - UP APO प्रिलिम्स कोर्स 2025, बैच 6th October से










होम / करेंट अफेयर्स

सिविल कानून

मंदिर का पुजारी कोई 'कर्मकार' नहीं है

    «
 13-Mar-2026

उमेश्वर अक्षयवर दुबे बनाम श्री साईनाथ सार्वजनिक सेवा मंडल ट्रस्ट एवं अन्य 

"मंदिर में पुजारी किसी भी प्रकार का शारीरिकअकुशलकुशलतकनीकीपरिचालनलिपिकीय या पर्यवेक्षणीय कार्य नहीं करता हैअपितु वह केवल धार्मिक भजनोंस्तोत्रों और आरती के अपने ज्ञान का उपयोग करता है और मंदिर में उनका पाठ करता है।" 

न्यायमूर्ति भार्गव डी. कारिया और न्यायमूर्ति एल.एस. पीरजादा 

स्रोत: गुजरात उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

गुजरात उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति भार्गव डी. कारिया और न्यायमूर्ति एल.एस. पीरजादा की खंडपीठ नेउमेशवर अक्षयवर दुबे बनाम श्री साईनाथ सार्वजनिक सेवा मंडल ट्रस्ट एवं अन्य (2026) के मामले में एक मंदिर पुजारी द्वारा दायर अपील को खारिज कर दियाजिनकी सेवा 2012 में समाप्त कर दी गई थी। न्यायालय ने यह निर्णय लिया कि वे औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2(ध) के अंतर्गत 'कर्मकारकी श्रेणी में नहीं आते हैं और श्री साईबाबा मंदिर का प्रबंधन करने वाले प्रत्यर्थी न्यासी को अधिनियम की धारा 2(ञ) के अंतर्गत 'उद्योगनहीं माना जा सकता है। न्यायालय ने अधिकारिता के अभाव में श्रम न्यायालय द्वारा मामले को खारिज करने के निर्णय को बरकरार रखा। 

उमेश्वर अक्षयवर दुबे बनाम श्री साईनाथ सार्वजनिक सेवा मंडल ट्रस्ट एवं अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अपीलकर्त्ता प्रत्यर्थी ट्रस्ट द्वारा संचालित श्री साईबाबा मंदिर में 10.03.1999 से पुजारी के रूप में काम कर रहा थापूजा और आरती करता था और उसे प्रारंभिक रूप से ₹1,200 प्रति माह का पारिश्रमिक मिलता था। 
  • अपीलकर्त्ता के अनुसारट्रस्ट में एक प्रबंधकदान संग्रहकर्तासामान्य प्रशासनिक कर्मचारीरसोइये और बूंदी लड्डू बनाने और परिसर की सफाई करने वाले कर्मचारी भी कार्यरत थे - जिनकी कुल संख्या लगभग 35 से 40 व्यक्ति थी। 
  • अपीलकर्त्ता की सेवाएँ 30.11.2012 को ट्रस्ट के एक प्रस्ताव द्वारा बिना नोटिसनोटिस वेतनछंटनी प्रतिकर या प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किये बिना समाप्त कर दी गईं। 
  • उन्होंने अक्टूबर 2014 को सुलह अधिकारी के समक्ष एक औद्योगिक विवाद उठायाजिसे श्रम न्यायालय को भेज दिया गया। उन्होंने सेवा की निरंतरता और पूरे बकाया वेतन के साथ बहाली की मांग कीयह तर्क देते हुए कि ट्रस्ट एक 'उद्योगथा क्योंकि यह बूंदी लड्डूनारियल और अन्य पूजा सामग्री बेचकर वाणिज्यिक गतिविधि में संलग्न था। 
  • श्रम न्यायालय ने सितंबर 2016 को अपील खारिज कर दीयह मानते हुए कि अपीलकर्त्ता अधिनियम की धारा के अंतर्गत 'कर्मकारनहीं थाऔर इसलिये न्यायालय के पास अधिकारिता नहीं थी। एकल न्यायाधीश ने इस निर्णय को बरकरार रखाजिसके परिणामस्वरूप वर्तमान अपील दायर की गई। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

क्या ट्रस्ट (न्यास) को 'उद्योगकी श्रेणी में रखा जा सकता है: 

  • न्यायालय ने इंद्रवदन एन. अध्वर्यु पिपाला फली मोधवाड़ा बनाम लक्ष्मी नारायण देव ट्रस्ट के मामले में उच्चतम न्यायालय के दिनांक 29.01.2026 के आदेश का हवाला दियाजिसमें यह पुष्टि की गई थी किमंदिर ट्रस्ट "उद्योग" की श्रेणी में नहीं आता है, और यह भी कहा कि उच्चतम न्यायालय ने उस मामले में इस स्थिति की पुष्टि करते हुए केवल प्रतिकर के पहलू पर ही विचार किया था। 
  • न्यायालय ने तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम बनाम श्रम आयुक्त (1979) में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के निर्णय पर भी विश्वास कियाजिसमें यह माना गया था कि तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम को अधिनियम की धारा 2(ञ) या व्यवसाय संघ अधिनियम के अधीन उद्योग नहीं माना जा सकता है। 
  • बैंगलोर वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड बनाम ए. राजप्पा (1978) के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गए परीक्षण को लागू करते हुए - कि संस्था के प्रमुख चरित्र की जांच करनी चाहिये और यह कि छिटपुट वेतनभोगी कर्मचारी किसी संस्था को उद्योग में परिवर्तित नहीं करते हैं - न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि ट्रस्ट की प्राथमिक और मूल गतिविधि धार्मिक पूजा थीऔर भक्तों को लड्डू तैयार करने और वितरित करने का आकस्मिक कार्य इस चरित्र को परिवर्तित नहीं सकता था। 

क्या पुजारी को 'कर्मकारकी श्रेणी में रखा जा सकता है? 

  • न्यायालय ने निर्णय दिया कि पुजारी का कार्य— धार्मिक भजनोंकीर्तनों और आरती के ज्ञान का प्रयोग करना— धारा 2(में उल्लिखित किसी भी श्रेणी से बाहर हैअर्थात् शारीरिकअकुशलकुशलतकनीकीपरिचालनलिपिकीय या पर्यवेक्षणीय कार्य। संयोगवश मंदिर की अन्य क्रियाकलापों में सहायता करना भीइस भूमिका को सांविधिक परिभाषा के अंतर्गत नहीं लाता है। 

औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 क्या है? 

औद्योगिक विवाद 

  • औद्योगिक विवादनियोक्ताओं और कर्मचारियोंके बीच उत्पन्न होने वालेसंघर्षहैंजो अक्सर हितोंविचारों या अधिकारों के कथित उल्लंघन में अंतर के कारण होते हैं। 
  • इन विवादोंके दोनों पक्षकारों और अर्थव्यवस्था के समग्र कामकाज परदूरगामी प्रभाव पड़ सकते हैं। 
  • औद्योगिक विवादों के परिणामस्वरूपवादों और न्यायालय के आदेशों जैसीविधिक कार्रवाई हो सकती है। 
    • इससे संबंधित सभी पक्षकारों के लिये अतिरिक्त लागत और जटिलताएँ उत्पन्न हो सकती हैं। 
  • इन विवादों का निपटारा औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के अंतर्गत होता है और इनका निर्णयश्रम न्यायालय/औद्योगिक अधिकरणद्वारा किया जाता है । 
  • अधिनियम कीधारा 2(औद्योगिक विवाद को परिभाषित करती है। 

कर्मकार 

  • 1947 के अधिनियम के अधीन, 'कर्मकारसे तात्पर्यकिसी उद्योग में कार्यरतकिसी भी व्यक्ति से हैचाहे वह कुशल हो या अकुशलशारीरिक श्रम करने वाला हो या लिपिकीयतकनीकी हो या गैर-तकनीकी। 
  • कामगारों में कारखाने के श्रमिकों और मजदूरों से लेकर प्रशासनिक कर्मचारियों तकविविध प्रकार के व्यक्ति सम्मिलित होते हैंजो सभीएक औद्योगिक प्रतिष्ठान के कामकाज में योगदान करते हैं ।