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सिविल कानून
मंदिर का पुजारी कोई 'कर्मकार' नहीं है
«13-Mar-2026
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उमेश्वर अक्षयवर दुबे बनाम श्री साईनाथ सार्वजनिक सेवा मंडल ट्रस्ट एवं अन्य "मंदिर में पुजारी किसी भी प्रकार का शारीरिक, अकुशल, कुशल, तकनीकी, परिचालन, लिपिकीय या पर्यवेक्षणीय कार्य नहीं करता है, अपितु वह केवल धार्मिक भजनों, स्तोत्रों और आरती के अपने ज्ञान का उपयोग करता है और मंदिर में उनका पाठ करता है।" न्यायमूर्ति भार्गव डी. कारिया और न्यायमूर्ति एल.एस. पीरजादा |
स्रोत: गुजरात उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
गुजरात उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति भार्गव डी. कारिया और न्यायमूर्ति एल.एस. पीरजादा की खंडपीठ ने उमेशवर अक्षयवर दुबे बनाम श्री साईनाथ सार्वजनिक सेवा मंडल ट्रस्ट एवं अन्य (2026) के मामले में एक मंदिर पुजारी द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया, जिनकी सेवा 2012 में समाप्त कर दी गई थी। न्यायालय ने यह निर्णय लिया कि वे औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2(ध) के अंतर्गत 'कर्मकार' की श्रेणी में नहीं आते हैं और श्री साईबाबा मंदिर का प्रबंधन करने वाले प्रत्यर्थी न्यासी को अधिनियम की धारा 2(ञ) के अंतर्गत 'उद्योग' नहीं माना जा सकता है। न्यायालय ने अधिकारिता के अभाव में श्रम न्यायालय द्वारा मामले को खारिज करने के निर्णय को बरकरार रखा।
उमेश्वर अक्षयवर दुबे बनाम श्री साईनाथ सार्वजनिक सेवा मंडल ट्रस्ट एवं अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- अपीलकर्त्ता प्रत्यर्थी ट्रस्ट द्वारा संचालित श्री साईबाबा मंदिर में 10.03.1999 से पुजारी के रूप में काम कर रहा था, पूजा और आरती करता था और उसे प्रारंभिक रूप से ₹1,200 प्रति माह का पारिश्रमिक मिलता था।
- अपीलकर्त्ता के अनुसार, ट्रस्ट में एक प्रबंधक, दान संग्रहकर्ता, सामान्य प्रशासनिक कर्मचारी, रसोइये और बूंदी लड्डू बनाने और परिसर की सफाई करने वाले कर्मचारी भी कार्यरत थे - जिनकी कुल संख्या लगभग 35 से 40 व्यक्ति थी।
- अपीलकर्त्ता की सेवाएँ 30.11.2012 को ट्रस्ट के एक प्रस्ताव द्वारा बिना नोटिस, नोटिस वेतन, छंटनी प्रतिकर या प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किये बिना समाप्त कर दी गईं।
- उन्होंने 9 अक्टूबर 2014 को सुलह अधिकारी के समक्ष एक औद्योगिक विवाद उठाया, जिसे श्रम न्यायालय को भेज दिया गया। उन्होंने सेवा की निरंतरता और पूरे बकाया वेतन के साथ बहाली की मांग की, यह तर्क देते हुए कि ट्रस्ट एक 'उद्योग' था क्योंकि यह बूंदी लड्डू, नारियल और अन्य पूजा सामग्री बेचकर वाणिज्यिक गतिविधि में संलग्न था।
- श्रम न्यायालय ने 3 सितंबर 2016 को अपील खारिज कर दी, यह मानते हुए कि अपीलकर्त्ता अधिनियम की धारा 2 के अंतर्गत 'कर्मकार' नहीं था, और इसलिये न्यायालय के पास अधिकारिता नहीं थी। एकल न्यायाधीश ने इस निर्णय को बरकरार रखा, जिसके परिणामस्वरूप वर्तमान अपील दायर की गई।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
क्या ट्रस्ट (न्यास) को 'उद्योग' की श्रेणी में रखा जा सकता है:
- न्यायालय ने इंद्रवदन एन. अध्वर्यु पिपाला फली मोधवाड़ा बनाम लक्ष्मी नारायण देव ट्रस्ट के मामले में उच्चतम न्यायालय के दिनांक 29.01.2026 के आदेश का हवाला दिया, जिसमें यह पुष्टि की गई थी कि मंदिर ट्रस्ट "उद्योग" की श्रेणी में नहीं आता है, और यह भी कहा कि उच्चतम न्यायालय ने उस मामले में इस स्थिति की पुष्टि करते हुए केवल प्रतिकर के पहलू पर ही विचार किया था।
- न्यायालय ने तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम बनाम श्रम आयुक्त (1979) में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के निर्णय पर भी विश्वास किया, जिसमें यह माना गया था कि तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम को अधिनियम की धारा 2(ञ) या व्यवसाय संघ अधिनियम के अधीन उद्योग नहीं माना जा सकता है।
- बैंगलोर वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड बनाम ए. राजप्पा (1978) के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गए परीक्षण को लागू करते हुए - कि संस्था के प्रमुख चरित्र की जांच करनी चाहिये और यह कि छिटपुट वेतनभोगी कर्मचारी किसी संस्था को उद्योग में परिवर्तित नहीं करते हैं - न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि ट्रस्ट की प्राथमिक और मूल गतिविधि धार्मिक पूजा थी, और भक्तों को लड्डू तैयार करने और वितरित करने का आकस्मिक कार्य इस चरित्र को परिवर्तित नहीं सकता था।
क्या पुजारी को 'कर्मकार' की श्रेणी में रखा जा सकता है?
- न्यायालय ने निर्णय दिया कि पुजारी का कार्य— धार्मिक भजनों, कीर्तनों और आरती के ज्ञान का प्रयोग करना— धारा 2(ध) में उल्लिखित किसी भी श्रेणी से बाहर है, अर्थात् शारीरिक, अकुशल, कुशल, तकनीकी, परिचालन, लिपिकीय या पर्यवेक्षणीय कार्य। संयोगवश मंदिर की अन्य क्रियाकलापों में सहायता करना भी इस भूमिका को सांविधिक परिभाषा के अंतर्गत नहीं लाता है।
औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 क्या है?
औद्योगिक विवाद
- औद्योगिक विवाद नियोक्ताओं और कर्मचारियों के बीच उत्पन्न होने वाले संघर्ष हैं, जो अक्सर हितों, विचारों या अधिकारों के कथित उल्लंघन में अंतर के कारण होते हैं।
- इन विवादों के दोनों पक्षकारों और अर्थव्यवस्था के समग्र कामकाज पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकते हैं।
- औद्योगिक विवादों के परिणामस्वरूप वादों और न्यायालय के आदेशों जैसी विधिक कार्रवाई हो सकती है।
- इससे संबंधित सभी पक्षकारों के लिये अतिरिक्त लागत और जटिलताएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
- इन विवादों का निपटारा औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के अंतर्गत होता है और इनका निर्णय श्रम न्यायालय/औद्योगिक अधिकरण द्वारा किया जाता है ।
- अधिनियम की धारा 2(ट) औद्योगिक विवाद को परिभाषित करती है।
कर्मकार
- 1947 के अधिनियम के अधीन, 'कर्मकार' से तात्पर्य किसी उद्योग में कार्यरत किसी भी व्यक्ति से है, चाहे वह कुशल हो या अकुशल, शारीरिक श्रम करने वाला हो या लिपिकीय, तकनीकी हो या गैर-तकनीकी।
- कामगारों में कारखाने के श्रमिकों और मजदूरों से लेकर प्रशासनिक कर्मचारियों तक, विविध प्रकार के व्यक्ति सम्मिलित होते हैं, जो सभी एक औद्योगिक प्रतिष्ठान के कामकाज में योगदान करते हैं ।