9 मार्च से शुरू हो रहे हमारे ऑल-इन-वन ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स के साथ अपनी ज्यूडिशियरी की तैयारी को मजबूत बनाएं | यह कोर्स अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों माध्यमों में उपलब्ध है।   |   आज ही हमारे ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स में एडमिशन लें और अपनी तैयारी को और बेहतर बनाएँ | हिंदी माध्यम बैच: 9 मार्च, सुबह 8 बजे   |   आज ही एडमिशन लें बिहार APO (प्रिलिम्स + मेन्स) कोर्स में और अपने सपनों को दे नई दिशा | ऑफलाइन एवं ऑनलाइन मोड में उपलब्ध | 12 जनवरी 2026  से कक्षाएँ आरंभ   |   एडमिशन ओपन: UP APO प्रिलिम्स + मेंस कोर्स 2025, बैच 6th October से   |   ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स (प्रयागराज)   |   अपनी सीट आज ही कन्फर्म करें - UP APO प्रिलिम्स कोर्स 2025, बैच 6th October से










होम / करेंट अफेयर्स

सांविधानिक विधि

पंचायत, विधि की दृष्टि में न्यायालय नहीं है

    «
 10-Mar-2026

सनत कुमार प्रधान बनाम ओडिशा राज्य 

"कोई भी पंचायत विधि की दृष्टि में न्यायालय नहीं है। एक सरपंच मजिस्ट्रेट के अधिकार का प्रयोग नहीं करता हैऔर न ही ग्राम के बुजुर्ग केवल बैठक बुलाकर आपराधिक मामलों पर अधिकार प्राप्त कर लेते हैं।" 

न्यायमूर्ति संजीब कुमार पाणिग्रही 

स्रोत: ओडिशा उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

उड़ीसा उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति संजीव कुमार पाणिग्राही नेसनत कुमार प्रधान बनाम ओडिशा राज्य (2026) के मामलेमें एक अवयस्क लड़की के साथ बार-बार मैथुन करने के दोषी पाए गए व्यक्ति के दण्ड को बरकरार रखासाथ ही दृढ़ता से यह भी कहा कि ग्राम पंचायतों को गंभीर आपराधिक मामलों - विशेष रूप से बाल लैंगिक शोषण - को मध्यस्थता या विवाह के वचनों के माध्यम से निपटाने का कोई अधिकार नहीं है। 

  • न्यायालय ने संबंधित जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक को जागरूकता अभियान चलाने का निदेश दिया जिससे सामुदायिक कार्यकर्त्ताओं को यह समझ में आ सके कि अवयस्कों के विरुद्ध लैंगिक अपराधों के आरोपों की सूचना बिना किसी विलंब के विधिक अधिकारियों को दी जानी चाहिये 

सनत कुमार प्रधान बनाम ओडिशा राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह घटना 18.07.2016 को कंधमाल के फिरिंगिया में घटीजहाँ अभियुक्त ने कथित तौर पर अवयस्क पीड़िता के घर उसके माता-पिता की अनुपस्थिति में जाकर उसके साथ बलपूर्वक मैथुन किया और उसे चुप रहने की धमकी दी। 
  • पीड़िता ने बाद में इस घटना की जानकारी अपनी माता को दीजिसके बादपंचायत की बैठक बुलाई गईजहाँ कथित तौर पर अपीलकर्त्ता ने इस कृत्य को स्वीकार किया और पीड़िता के बालिग होने पर उससे विवा करने के लिये सहमति जताई। 
  • दोनों पक्षकारों ने 12.05.2021 को विवाह कियालेकिन आरोप है कि अपीलकर्त्ता ने बीच के वर्षों में पीड़िता के साथ लैंगिक संबंध जारी रखेविवाह के तुरंत बाद उसे छोड़ दियाऔर उसके माता-पिता ने कथित तौर पर उसे जान से मारने की कोशिश की। 
  • प्रथम घटना के लगभग आठ वर्ष बाद, 30.01.2024 को प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई। 
  • विचारण के दौरानतदर्थ अपर जिला एवं सेशन न्यायाधीश (FTSC), कंधमालफूलबानी ने अपीलकर्त्ता को धारा 6(1) लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के साथ धारा 376(2)(भारतीय दण्ड संहिता के अधीन दोषसिद्ध ठहरायाऔर उसे 20 वर्ष के कठोर कारावास के साथ ₹20,000/- का जुर्माना लगाया।  
  • अपीलकर्त्ता ने दोषसिद्धि और दण्ड को चुनौती देते हुए उड़ीसा उच्च न्यायालय में एक दाण्डिक अपील दायर की। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने अपीलकर्त्ता द्वारा उठाए गए सभी आधारों पर दोषसिद्धि को बरकरार रखा। पीड़िता की अवयस्कता के प्रश्न परन्यायालय ने उसकी आयु के पर्याप्त सबूत के रूप में विद्यालय प्रवेश रजिस्टर को आधार बनाया। प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने में आठ वर्ष के विलंब को घातक नहीं माना गयाक्योंकि मामले के अनौपचारिक ग्राम-स्तरीय निपटान से इसकी पर्याप्त व्याख्या हो गई थी। प्रतिरक्षा पक्ष द्वारा बताए गए अन्वेषण संबंधी कमियों को खारिज कर दिया गया क्योंकि अभियुक्त को कोई ठोस नुकसान नहीं पहुँचाया गया था। अपीलकर्त्ता की ओर से उठाई गए अवयस्कता के अभिवचन को विधिक रूप से मान्य आधारभूत सामग्री के अभाव में सिरे से नामंजूर कर दिया गया। 
  • सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि न्यायालय ने माना कि अपीलकर्त्ता द्वारा पीड़िता से पश्चात्वर्ती विवाह विधि की दृष्टि से प्रतिरक्षा का आधार नहीं है -पश्चात्वर्ती विवाह प्रारंभिक अवैधता को पूर्वव्यापी रूप से समाप्त नहीं कर सकता या आपराधिक दायित्त्व को समाप्त नहीं कर सकता। 
  • पंचायत के हस्तक्षेप के प्रश्न परन्यायालय ने कठोर रुख अपनाते हुए कहा कि ग्राम निकायों कोआपराधिक मामलों पर कोई अधिकारिता नहींहै और विवाह के वचन के माध्यम से बाल लैंगिक शोषण का निपटारा करना अपराधी को संरक्षण देने और पीड़ित को चुप कराने के समान है। 
  • इसमें याद दिलाया गया कि लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा 19 और 21 के अधीन ऐसे अपराधों की रिपोर्ट विशेष किशोर पुलिस यूनिट (SJPU) या स्थानीय पुलिस को देना अनिवार्य है - एक ऐसा दायित्त्व जिसे कोई पंचायत अधिभावी नहीं कर सकती।  

भारत में पंचायतें क्या हैं? 

बारे में: 

  • पंचायतें जमीनी स्तर पर स्थानीय स्वशासन की संस्थाएँ हैंजिन्हें भारत के संविधान में निहित किया गया है। 
  • इस प्रणाली का उद्देश्य नागरिकों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में सम्मिलित करके लोकतांत्रिक सिद्धांतोंसामाजिक न्याय और समान विकास को बढ़ावा देना है। 
  • संस्कृत में "पंचायती राज" शब्द का शाब्दिक अर्थ "ग्राम परिषद का शासन" हैजो पारंपरिक ग्राम शासन में इसकी जड़ों को दर्शाता है। 

भारत में पंचायतों का सफर: 

  • बलवंत राय मेहता समिति (1957):सबसे पहले पंचायती राज व्यवस्था की सिफारिश कीग्राम पंचायतोंपंचायत समितियों और जिला परिषदों को मिलाकर त्रिस्तरीय संरचना की वकालत की गई। 
  • अशोक मेहता समिति (1977):ब्लॉक स्तर के मध्यस्थ को समाप्त करते हुए दो स्तरीय प्रणाली की सिफारिश कीग्राम पंचायतों और जिला परिषदों को शक्तियों के विकेंद्रीकरण पर बल दिया। 
  • 73वाँ सांविधानिक संशोधन अधिनियम, 1992:पंचायती राज संस्थाओं को सांविधानिक दर्जा प्रदान कियाग्रामब्लॉक और जिला स्तर पर त्रिस्तरीय प्रणाली को औपचारिक रूप दियाअनुसूचित जातियोंअनुसूचित जनजातियों और महिलाओं के लिये आरक्षण अनिवार्य कियाराज्य निर्वाचन आयोगों की स्थापना कीऔर पंचायतों को शक्तियों के हस्तांतरण का प्रावधान किया। 

प्रमुख सांविधानिक उपबंध: 

  • अनुच्छेद 40 (राज्य के नीति निदेशक तत्त्व (DPSP)):राज्य को ग्राम पंचायतों को संगठित करने और उन्हें स्थानीय स्वशासन की इकाइयों के रूप में कार्य करने के लिये आवश्यक शक्तियां प्रदान करने का निदेश देता है। 
  • अनुच्छेद 243:इसमें जिलाग्राम सभापंचायत और ग्राम सहित प्रमुख शब्दों की परिभाषाएँ दी गई हैं। 
  • अनुच्छेद 243:ग्राम सभा को ग्राम स्तर पर ऐसे कार्यों का निष्पादन करने का अधिकार देता है जैसा कि राज्य विधानमंडल विधि द्वारा विहित कर सकता है। 
  • अनुच्छेद 243-243:तीनों स्तरों पर पंचायतों की स्थापनासंरचनासीटों का आरक्षण और शक्तियों को नियंत्रित करते हैं। 

पंचायतों का गठन (अनुच्छेद 243): 

  • प्रत्येक राज्य ग्राममध्यवर्ती और जिला स्तर पर पंचायतों का गठन करेगा। 
  • जिन राज्यों की जनसंख्याबीस लाखसे अधिक नहीं हैउन्हें मध्यवर्ती स्तर पर पंचायतों के गठन से छूट दी गई है।