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विवाह-विच्छेद की डिक्री और व्हाट्सएप चैट

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 05-Mar-2026

"केवल व्हाट्सएप चैट के आधार पर विवाह-विच्छेद की डिक्री का आदेश नहीं दिया जा सकताक्योंकि यह साक्ष्य प्रस्तुत करके साबित नहीं हुआ है।" 

न्यायमूर्ति भारती डांगरे और मंजूषा देशपांडे 

स्रोत: बॉम्बे उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

बॉम्बे उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति भारती डांगरे और मंजुषा देशपांडे की खंडपीठ नेसुप्रिया गौरव देवारे बनाम गौरव जितेंद्र पाटिल (2026) के मामलेमें निर्णय दिया कि व्हाट्सएप चैट और एस.एम.एस. आदान-प्रदान के आधार पर विवाह-विच्छेद की डिग्री तब तक नहीं दी जा सकती जब तक कि उचित सबूतों के माध्यम से ऐसे इलेक्ट्रॉनिक संसूचना को साबित न किया जाए। 

  • न्यायालय नेहिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (HMA) की धारा 13(1)( i-) के अधीन कुटुंब न्यायालय द्वारा पारित एकपक्षीय निर्णय और विवाह-विच्छेद की डिक्री को अपास्त कर दिया और दोनों पक्षकारों को साक्ष्य प्रस्तुत करने का पूरा अवसर प्रदान करने के बाद मामले को नए सिरे से अवधारण के लिये वापस भेज दिया। 

सुप्रिया गौरव देवरे बनाम गौरव जीतेन्द्र पाटिल (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अपीलकर्त्ता पत्नी थीजिसने नासिक के कुटुंब न्यायालय द्वारा पारित एकपक्षीय विवाह-विच्छेद के निर्णय को चुनौती दी थी। 
  • पति ने क्रूरता के आधार पर हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(i-क) के अधीन विवाह-विच्छेद के लिये याचिका दायर की थी। 
  • कुटुंब न्यायालय ने 27 मई 2025 को एकपक्षीय निर्णय देते हुए पति की याचिका को मंजूर कर लिया। 
  • कुटुंब न्यायालय द्वारा क्रूरता का निष्कर्ष निकालने का एकमात्र आधार पक्षकारों के बीच व्हाट्सएप चैट और एस.एम.एस. का आदान-प्रदान था। 
  • कुटुंब न्यायालय ने पाया कि चैट से पता चलता है कि पत्नी इस बात पर बल दे रही थी कि पति नासिक में अपने माता-पिता के साथ रहने के बजाय पुणे चला जाएऔर कुछ संदेशों में कथित तौर पर पति के परिवार के सदस्यों के प्रति अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया गया था। 
  • पत्नी को कुटुंब न्यायालय द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों का खंडन करने का कोई अवसर नहीं दिया गया। 
  • पत्नी ने कुटुंब न्यायालय में अपील के माध्यम से बॉम्बे उच्च न्यायालय में इस निर्णय को चुनौती दी। 
  • मुख्य विवाद्यक: 
  • क्या हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(i-के अधीन विवाह-विच्छेद की डिग्री केवल व्हाट्सएप चैट के आधार पर दी जा सकती हैजिसे विधिक रूप से ग्राह्य साक्ष्य के माध्यम से साबित नहीं किया गया हैऔर विपक्षी पक्षकार को ऐसी सामग्री का खंडन करने का अवसर दिये बिना। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

व्हाट्सऐप चैट साक्ष्यों के माध्यम से साबित नहीं हुई हैं: 

  • खंडपीठ ने माना कि कुटुंब न्यायालय द्वारा जिस इलेक्ट्रॉनिक संसूचना पर विश्वास किया गया थावह उचित साक्ष्य के माध्यम से साबित नहीं हुआ था। 
  • विधिक तौर पर मान्य साधनों के माध्यम से रिकॉर्ड पर स्थापित किये बिनाकेवल व्हाट्सएप चैट का प्रस्तुतीकरण या संदर्भ देनाऐसी सामग्री को क्रूरता के निष्कर्ष को बरकरार रखने के लिये विधिक रूप से अपर्याप्त बना देता है। 

साक्ष्य का खंडन करने का अधिकार: 

  • न्यायालय ने कहा कि पत्नी को कुटुंब न्यायालय द्वारा विश्वास किये गए व्हाट्सएप संदेशों और एस.एम.एस. आदान-प्रदान का खंडन करने का कोई अवसर नहीं दिया गया था। 
  • प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत यह मांग करते हैं कि किसी भी पक्षकार को उसके विरुद्ध प्रयोग किये गए साक्ष्यों का खंडन करने का उचित अवसर दिया जाना चाहियेविशेष रूप से विवाह-विच्छेद की याचिका जैसी महत्त्वपूर्ण कार्यवाही में। 

विधिक रूप से अस्थिर दृष्टिकोण: 

  • पीठ ने माना कि कुटुंब न्यायालय द्वारा पति के परिसाक्ष्य को केवल अप्रमाणित इलेक्ट्रॉनिक संसूचना द्वारा समर्थित मानकर और फिर उस आधार पर विवाह-विच्छेद की डिक्री देना विधिक रूप से अस्थिर था। 

डिक्री को अपास्त किया गया और मामला वापस भेजा गया: 

  • उच्च न्यायालय ने विवाह-विच्छेद के निर्णय और डिक्री को अपास्त कर दिया और मामले को कुटुंब न्यायालय को वापस भेज दिया जिससे याचिका में उठाए गए विवाद्यकों का नए सिरे से अवधारण किया जा सकेजिसमें दोनों पक्षकारों को साक्ष्य प्रस्तुत करने का पूरा अवसर दिया जाएगा। 

हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)( i-क) क्या है? 

  • यह धाराक्रूरता को विवाह-विच्छेद के आधार के रूप में मानती है। 
  • हिंदू विवाह अधिनियम में 1976 में हुए संशोधन से पूर्व, क्रूरता हिंदू विवाह अधिनियम के अधीन विवाह-विच्छेद का दावा करने का आधार नहीं थी। 
  • यह अधिनियम की धारा 10 के अधीन न्यायिक पृथक्करण का दावा करने का केवल एक आधार था।  
  • 1976 के संशोधन द्वाराक्रूरता को तलाक का आधार बना दिया गया। 
  • इस अधिनियम में क्रूरता शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है। 
  • सामान्यतःक्रूरता कोई भी ऐसा व्यवहार है जोसाशय या अनजाने में शारीरिक या मानसिक क्षति कारित करता है। 
  • उच्चतम न्यायालय द्वारा कई निर्णयों में निर्धारित विधि के अनुसारक्रूरता दो प्रकार की होती है। 
  • शारीरिक क्रूरता - हिंसक व्यवहार जिसके कारण पति या पत्नी को पीड़ा पहुँचे 
  • मानसिक क्रूरता – पति या पत्नी को किसी भी प्रकार के मानसिक तनाव से ग्रस्त किया जाता है या उन्हें निरंतर मानसिक पीड़ा से गुजरना पड़ता है। 
  • शोभा रानी बनाम मधुकर रेड्डी (1988)के मामले मेंउच्चतम न्यायालय नेयह निर्णय दिया कि क्रूरता शब्द की कोई निश्चित परिभाषा नहीं हो सकती। 
  • मायादेवी बनाम जगदीश प्रसाद (2007)के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि पति-पत्नी में से किसी के भी द्वारा झेली गई किसी भी प्रकार की मानसिक क्रूरता के मामले में न केवल महिलाअपितु पुरुष भी क्रूरता के आधार पर विवाह-विच्छेद के लिये आवेदन कर सकते हैं। 

भारतीय न्यायालयों में साक्ष्य के रूप में व्हाट्सएप चैट 

सामान्य विधिक स्थिति: 

  • व्हाट्सएप पर हुई बातचीतइलेक्ट्रॉनिक अभिलेख होने के नातेभारतीय विधि के अधीन साक्ष्य के रूप में ग्राह्य हैपरंतु केवल तभी जब वे कठोर प्रमाणीकरण और प्रमाणिकता मानकों को पूरा करती हों। 

इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य विधि का विकास 

  • डिजिटल साक्ष्य की ग्राह्यता भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के माध्यम से किये गए संशोधनों से जुड़ी है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65क और 65ख में विशेष रूप से "इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख" को संबोधित किया गया हैजिसमें उन्हें इलेक्ट्रॉनिक रूप से उत्पन्नसंग्रहीत या प्रसारित डेटा के रूप में परिभाषित किया गया हैजिसमें व्हाट्सएप संदेशवॉयस नोट्स और मीडिया फाइलें सम्मिलित हैं। 
  • अनवर पी.वी. बनाम पी.के. बशीर (2014)में एक महत्त्वपूर्ण क्षण आया, जहाँ उच्चतम न्यायालय ने द्वितीयक इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के लिये धारा 65 (4) के अधीन अनिवार्य प्रमाण पत्र अनिवार्य कर दियायह मानते हुए कि इस प्रमाण पत्र के बिना अप्रतिबंधित प्रिंटआउट या सी.डीअग्राह्य हैं। 
  • भारतीय साक्षी अधिनियम, 2023 (BSA), जो जुलाई, 2024 से प्रभावी हुआने इस व्यवस्था को आधुनिक बनाया। धारा 63, धारा 65ख के समान हैपरंतु इसका दायरा स्मार्टफोन जैसे "संसूचना उपकरणों" तक विस्तारित किया गया हैजिसमें व्हाट्सएप को स्पष्ट रूप से सम्मिलित किया गया है। 

धारा 63 भारतीय साक्ष्य अधिनियम में प्रमाणपत्र — इसके लिये क्या आवश्यक है: 

  • ग्राह्यता के केंद्र में धारा 63(4) का प्रमाण पत्र हैजो दो भागों वाला दस्तावेज़ है जिसके बिना व्हाट्सएप चैट केवल अनुश्रुत बातें हैं। 
  • भाग क — डिवाइस के स्वामी/उपयोगकर्त्ता से — में निम्नलिखित विवरण होना चाहिये: 
  • इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख की पहचानउत्पादन का तरीका (जैसेकिसी विशिष्ट तिथि पर व्हाट्सएप निर्यात)डिवाइस का विवरण (मॉडलऑपरेटिंग सिस्टम संस्करण)और उत्पादन के बाद किसी भी प्रकार के परिवर्तन न होने का आश्वासन। 
  • भाग ख — आदर्श रूप से एक स्वतंत्र विशेषज्ञ द्वारा — यह सत्यापित करता है कि हैश वैल्यू (डिजिटल फिंगरप्रिंट) मूल से मेल खाता हैऔर सेलेब्राइट या ऑटोप्सी जैसे फोरेंसिक उपकरणों के माध्यम से अखंडता की पुष्टि करता है। 

प्रमुख ऐतिहासिक निर्णय: 

  • अनवर पी.वी. बनाम पी.के. बशीर (2014)उच्चतम न्यायालय ने धारा 65 (4) के अधीन प्रमाणीकरण को अनिवार्य आवश्यकता के रूप में अनिवार्य कियाडिजिटल प्रारूपों में छेड़छाड़ की आसानी पर बल दिया। 
  • अर्जुन पंडितराव खोटकर बनाम कैलाश कुशनराव गोरंत्याल (2020) : उच्चतम न्यायालय ने मूल दस्तावेज़ प्रस्तुत किये जाने पर साक्ष्य की ग्राह्यता को बरकरार रखालेकिन प्रतियों के लिये प्रमाणीकरण को दोहराया और इस नियम को पूरी तरह से क्षमा करने से इंकार कर दिया। इस निर्णय ने धारा 65 को सामान्य साक्ष्य सिद्धांतों के साथ सामंजस्य स्थापित किया और प्रासंगिकता एवं प्रमाणिक मूल्य पर बल दिया। इसने यह भी स्पष्ट किया कि यदि साक्षी मूल दस्तावेज़ प्रस्तुत करता हैतो किसी प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं है। 
  • डेल इंटरनेशनल सर्विसेज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड बनाम भारत संघ (दिल्ली उच्च न्यायालयजुलाई 2024): उपभोक्ता विवाद याचिका में दायर व्हाट्सएप स्क्रीनशॉट को धारा 63 के प्रमाण पत्र के अभाव में खारिज कर दिया गया। न्यायमूर्ति सुब्रमणियम प्रसाद ने कहा कि "साक्ष्य अधिनियम के अधीन अनिवार्य उचित प्रमाण पत्र के बिना व्हाट्सएप वार्तालापों को साक्ष्य के रूप में नहीं माना जा सकता।" यहाँ तक ​​कि ब्लू टिक (डिलीवरी/रीड रिसीप्टभी प्रमाण पत्र के अभाव में अपर्याप्त थे