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सांविधानिक विधि
अवयस्क की अभिरक्षा संबंधी विवादों में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पोषणीय नहीं है
«27-Feb-2026
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हिमांशु दिलीप कुलकर्णी बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य और अन्य "बंदी प्रत्यक्षीकरण एक असाधारण उपचार है और सामान्यत: माता-पिता के बीच अभिरक्षा संबंधी विवादों में इसका सहारा नहीं लिया जाता है जब कोई प्रभावी वैकल्पिक उपचार विद्यमान हो।" मुख्य न्यायाधीश जी.एस. संधावालिया और न्यायमूर्ति बिपिन सी. नेगी |
स्रोत: हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जी.एस. संधावालिया और न्यायमूर्ति बिपिन सी. नेगी ने हिमांशु दिलीप कुलकर्णी बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामले में, एक पिता द्वारा अपनी अवयस्क पुत्री की पेशी और अभिरक्षा की मांग करते हुए दायर की गई बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को खारिज कर दिया।
- न्यायालय ने निर्णय दिया कि बंदी प्रत्यक्षीकरण एक असाधारण उपचार है और सामान्यत: माता-पिता के बीच अभिरक्षा संबंधी विवादों में इसका सहारा नहीं लिया जाना चाहिये जब सक्षम प्रतिपाल्य न्यायालय के समक्ष एक प्रभावी वैकल्पिक उपचार विद्यमान हो।
हिमांशु दिलीप कुलकर्णी बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह मामला धर्मशाला के पास कांगड़ा जिले में 06.07.2017 को जन्मी अवयस्क लड़की सुश्री यशिका के माता-पिता के बीच अब्जिरक्षा विवाद से उत्पन्न हुआ है।
- दोनों पक्षकारों का विवाह 25.02.2012 को संपन्न हुआ और 13.09.2021 को रजिस्ट्रीकृत हुआ। दंपति चंडीगढ़, मुंबई, बेंगलुरु और बाद में बैंकॉक, थाईलैंड सहित विभिन्न स्थानों पर रहे, जहाँ याचिकाकर्त्ता-पिता अभी भी रहते हैं।
- माता 10.10.2025 को अवयस्क संतान के साथ भारत गई थी। दिवाली के बाद बैंकॉक लौटने पर, उसे 25.11.2025 से 26.11.2025 तक अस्पताल में भर्ती कराया गया, इस दौरान उसका भाई भी बैंकॉक गया था।
- याचिकाकर्त्ता ने अभिकथित किया कि माता 13.12.2025 को उसकी जानकारी या सम्मति के बिना बैंकॉक से चली गई। 15.12.2025 को घर लौटने पर उसने पाया कि बच्चे का सामान गायब था। परिवार के सदस्यों के साथ 29.12.2025 को हुई कॉन्फ्रेंस कॉल सहित माता से संपर्क करने के बार-बार प्रयास करने के बावजूद, उसे कोई सहयोग नहीं मिला।
- बाद में याचिकाकर्त्ता को प्रत्यर्थी के पिता से सूचना मिली कि माता और बच्ची धर्मशाला पहुँच चुकी हैं। इसके बाद याचिकाकर्त्ता ने हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर बच्ची को पेश करने, उसकी तत्काल अभिरक्षा में लेने और उसके शैक्षणिक वर्ष को सुरक्षित रखने के लिये उसे उसके पूर्व विद्यालय में बहाल करने के निदेश देने की मांग की।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- यह मामला प्रारंभ में अवकाशकालीन न्यायाधीश के समक्ष सूचीबद्ध किया गया था, जिन्होंने याचिकाकर्त्ता को रिट याचिका की स्वीकार्यता को उचित ठहराने का निदेश दिया था।
- पीठ ने सौरभ रतन बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य और अन्य (2025) के मामले में अपने पहले के निर्णय का हवाला दिया, जिसमें उसने कहा था कि माता-पिता के बीच विवादों में, उचित उपचार प्रतिपाल्य न्यायालय के समक्ष है, जो साक्ष्य के आधार पर अभिरक्षा के मामलों का निर्णय करने के लिये सुसज्जित है।
- न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्त्ता ने याचिका में स्पष्ट रूप से कहा था कि माता और बच्चा धर्मशाला में रह रहे हैं। ऐसी स्थिति में, यह तर्क नहीं दिया जा सकता कि अवयस्क का पता अज्ञात था - जो बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर करने का एक मूलभूत आधार है।
- न्यायालय ने यह माना कि एक बार बंदी का स्थान ज्ञात हो जाने पर, जिस न्यायालय के प्रादेशिक अधिकारिता में बंदी रहता है, उसे बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करने का अधिकार होगा, न कि कहीं और स्थित न्यायालय को।
- इसमें आगे यह भी कहा गया कि यदि याचिकाकर्त्ता बच्चे के निवास स्थान पर अधिकारिता रखने वाले सक्षम न्यायालय से संपर्क करता है, तो वह न्यायालय इस विवाद्यक के प्रति संवेदनशील होगा और मामले पर शीघ्र विचार सुनिश्चित करेगा।
- अंतर्राष्ट्रीय पहलुओं को ध्यान में रखते हुए - बच्चे को विदेश से स्थानांतरित किया गया है, पिता विदेश में रह रहे हैं, और शपथ पत्र पुणे में सत्यापित किया गया है - न्यायालय ने विश्वास व्यक्त किया कि एक सक्षम न्यायालय ऐसे मामले को तत्परता और सावधानी से देखेगा।
- तदनुसार याचिका खारिज कर दी गई और याचिकाकर्त्ता को धर्मशाला स्थित उपयुक्त प्रतिपाल्य न्यायालय में जाने की स्वतंत्रता दी गई।
बंदी प्रत्यक्षीकरण क्या है?
अर्थ और प्रकृति:
- बंदी प्रत्यक्षीकरण एक लैटिन शब्द है जिसका अर्थ है " आप शरीर प्रस्तुत करें"।
- यह एक विधिक प्रक्रिया है, जो अवैध रूप से निरुद्ध व्यक्तियों के लिये उपचारात्मक उपाय के रूप में कार्य करती है ।
- इसका मूल उद्देश्य किसी व्यक्ति को विधिविरुद्ध निरुद्धि या कारावास से मुक्त कराना है।
- यह न्यायालय द्वारा जारी किया गया एक आदेश है जिसमें बंदी को न्यायालय के समक्ष पेश करने और यह जांचने का निदेश दिया जाता है कि गिरफ्तारी वैध थी या नहीं।
- यह याचिका किसी व्यक्ति के स्वतंत्रता और व्यक्तिगत आजादी के अधिकार का अवधारण करती है।
सांविधानिक उपबंध:
- अनुच्छेद 32 के अधीन उच्चतम न्यायालय और अनुच्छेद 226 के अधीन उच्च न्यायालयों को रिट जारी करने का अधिकार है।
- अनुच्छेद 32 के अधीन, उच्चतम न्यायालय मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के लिये रिट जारी करता है।
- अनुच्छेद 226 के अधीन, उच्च न्यायालयों के पास विधिक और मौलिक अधिकारों के उल्लंघन दोनों के लिये रिट जारी करने की व्यापक अधिकारिता है।
- भारत की प्रादेशिक सीमा के भीतर और बाहर स्थित सभी प्राधिकरणों पर उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता है।
- उच्च न्यायालय उन मामलों से निपटते हैं जब उस अधिकार पर उनका नियंत्रण होता है और वाद-हेतुक उनकी अधिकारिता के अंतर्गत आता है।
कौन आवेदन कर सकता है:
- वह व्यक्ति जिसे अवैध रूप से परिरोध या निरुद्ध किया गया हो।
- कोई भी व्यक्ति जो इस मामले के लाभ से अवगत हो।
- मामले के तथ्यों और परिस्थितियों से परिचित कोई भी व्यक्ति जो स्वेच्छया से अनुच्छेद 32 या 226 के अधीन आवेदन दाखिल करता है।
- जैसा कि शीला बारसे बनाम महाराष्ट्र राज्य (1983) में निर्णय दिया गया है , यदि कोई निरुद्ध किया गया व्यक्ति आवेदन दाखिल नहीं कर सकता है, तो कोई अन्य व्यक्ति उसकी ओर से आवेदन दाखिल कर सकता है।
याचिका कब खारिज हो जाती है:
- जब न्यायालय के पास निरोध के मामले पर प्रादेशिक अधिकारिता का अभाव हो।
- जब निरोध किसी सक्षम न्यायालय के आदेश से संबंधित हो।
- जब निरोध में लिया गया व्यक्ति पहले ही रिहा हो चुका हो।
- जब निरुद्धि में विद्यमान दोषों को दूर करके कारावास को वैध ठहराया गया हो।
- जब कोई सक्षम न्यायालय याचिका को गुण-दोष के आधार पर याचिका खारिज कर देता है।
प्रकृति और दायरा:
- यह एक प्रक्रियात्मक याचिका है, न कि एक सारभूत याचिका, जैसा कि कानू सान्याल बनाम जिला मजिस्ट्रेट दार्जिलिंग (1974) के मामले में कहा गया है।
- इस पद्धति में केवल शरीर को न्यायालय के समक्ष पेश करने के बजाय तथ्यों और परिस्थितियों की परीक्षा करके निरोध की वैधता पर ध्यान केंद्रित किया जाता है।
- यह रिट याचिका न केवल सदोष परिरोध निरुद्धि के विरुद्ध, अपितु निरोधक प्राधिकारी द्वारा किये गए दुर्व्यवहार अथवा भेदभाव के संरक्षण हेतु भी दायर की जा सकती है, जैसा कि सुनील बत्रा बनाम दिल्ली प्रशासन (1980) में कहा गया है।
- पूर्व-न्याय का सिद्धांत अवैध परिरोध के मामलों पर लागू नहीं होता; नए आधारों के साथ क्रमिक याचिकाएँ दायर की जा सकती हैं।
सबूत का भार:
- निरोध में लेने वाले व्यक्ति या प्राधिकरण पर यह साबित करने का भार होता है कि निरुद्धि विधिक आधार पर थी।
- यदि बंदी प्राधिकरण की अधिकारिता से बाहर विद्वेषपूर्ण कारावास का आरोप लगाता है, तो दायित्त्व बंदी पर आ जाता है।
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