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सिविल कानून

बीमाकर्त्ता नियोजक द्वारा अधिरोपित विलंबित शास्ति के लिये उत्तरदायी नहीं

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 24-Feb-2026

न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम रेखा चौधरी और अन्य 

"किसी नियोजक द्वारा अपने कर्मचारी को प्रतिकर के संदाय में विलंब के लिये शास्ति का दायित्त्व बीमा कंपनी पर नहीं थोपा जा सकता है।" 

न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और प्रसन्ना बी. वराले 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और प्रसन्ना बी. वराले की पीठ नेन्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम रेखा चौधरी और अन्य (2026)के मामले में यह निर्णय दिया कि विलंबित प्रतिकर के संदाय के लिये कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923 की धारा 4 (3) (ख) के अधीन शास्ति का दायित्त्व नियोजक का व्यक्तिगत दायित्त्व है और इसेबीमाकर्त्ता पर नहीं थोपा जा सकता है। 

न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम रेखा चौधरी और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह मामला एक वाणिज्यिक चालक की मृत्यु से जुड़ा हैजो अपने नियोजक के वाहन को चलाते समय गिर पड़ा था। 
  • मृतक ड्राइवर के विधिक वारिसों ने प्रतिकर की मांग करते हुए कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923 के अधीन आयुक्त से संपर्क किया। 
  • आयुक्त ने 7.36 लाख रुपए का प्रतिकर 12% ब्याज सहित देने का आदेश दिया और संदाय में विलंब के लिये नियोजक को कारण बताओ नोटिस भी जारी किया। 
  • नियोजक द्वारा कारण बताओ नोटिस का जवाब न देने के कारणकर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923 की धारा 4(3)(ख) के अधीन नियोजक पर 35% की शास्ति अधिरोपित की 
  • नियोजक का वाहन अपीलकर्त्ता - न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के पास बीमित था। 
  • यद्यपि बीमा कंपनी ने प्रतिकर की राशि और ब्याज के लिये दायित्त्व स्वीकार कर लियापरंतु उसने शास्ति के रूप राशि का संदाय करने के अपने दायित्त्व का विरोध किया। 
  • तथापिदिल्ली उच्च न्यायालय ने बीमा कंपनी को न केवल प्रतिकर और ब्याज अपितु नियोजक के विलंब के लिये अधिरोपित किये गए शास्ति के रूप राशि का संदाय करने करने का निदेश दियाजिसके बाद न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड ने उच्चतम न्यायालय में अपील की। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायमूर्ति अरविंद कुमार द्वारा लिखित एक निर्णय मेंपीठ ने यह माना किनियोजक की व्यक्तिगत त्रुटी या उपेक्षा के लिये बीमाकर्त्ता को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है। 
  • न्यायालय ने वेद प्रकाश गर्ग बनाम प्रेमी देवी (1997) 8 एससीसी 1 में स्थापित पूर्व निर्णय पर विश्वास कियाजिसमें यह स्थापित किया गया था कि कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923 की धारा 4 (3) (ख) के अधीन अधिरोपित की गई शास्ति का भार केवल नियोजक द्वारा वहन किया जाना चाहिये और इसे बीमा कंपनी पर नहीं डाला जा सकता है। 
  • न्यायालय ने टिप्पणी की कि "जब संविधि ने स्वयं नियोक्ता को एक मास के भीतर संदाय करने के लिये बाध्य किया हैतो ऐसे दायित्त्व को किसी संविदात्मक दायित्त्व के अधीन या सांविधिक दायित्त्व को दरकिनार करने के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता हैक्योंकि यह उक्त उपबंध के अधीन परिकल्पित विधायी आशय की अवहेलना के समान होगा।" 
  • न्यायालय ने आगे कहा कि जब अधिनियम विलंबित संदाय के लिये नियोजक पर सांविधिक दायित्त्व अधिरोपित करता हैतो वह दायित्त्व केवल संविदात्मक बीमा करार के कारण बीमाकर्त्ता को अंतरित नहीं किया जा सकता है। 
  • उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के उस आदेश के उस भाग को अपास्त कर दिया जिसमें अपीलकर्त्ता-बीमाकर्त्ता पर शास्ति के रूप में राशि का दायित्त्व तय किया गया थाऔर नियोजक (प्रत्यर्थी संख्या 4) को आदेश की तारीख से आठ सप्ताह के भीतर शास्ति राशि का संदाय करने का निदेश दिया। 
  • तदनुसारन्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के पक्ष में अपील मंजूर कर ली गई। 

कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923 क्या है? 

बारे में: 

  • कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम, 1923 (जिसे पहले कामगार प्रतिकर अधिनियम, 1923 के नाम से जाना जाता था) एक सामाजिक सुरक्षा विधान है जिसे नियोजन के दौरान और उससे उत्पन्न होने वाली दुर्घटनाओं की स्थिति में कर्मचारियों और उनके आश्रितों को प्रतिकर प्रदान करने के लिये बनाया गया है। 
  • यह अधिनियम कार्य संबंधी क्षतियोंविकलांगताओं या मृत्यु की स्थिति में श्रमिकों और उनके परिवारों को वित्तीय संरक्षण प्रदान करने के लिये अधिनियमित किया गया था। 
  • इस अधिनियम में 'आश्रितकी परिभाषा में मृतक कर्मचारी के कुछ ऐसे रिश्तेदारों को सम्मिलित किया गया है जो मृत्यु के समय कर्मचारी की कमाई पर पूर्णतः या भागत: आश्रित थे। 

धारा 4 — शोध्य हो जाने पर प्रतिकर का दिया जाना और व्यतिक्रम के लिये शास्ति: 

मूल नियम (उपधारा 1): 

  • प्रतिकर नियत तारीख पर यथाशीघ्र दिया जाना चाहिये—इसमें कोई विलंब अनुमेय नहीं है। 

विवादित दायित्त्व (उपधारा 2): 

  • यदि नियोजक पूरे दावे पर विवाद करता हैतो भी उसे स्वीकार किये गए अंश के लिये अस्थायी संदाय करना होगा। 
  • यह अस्थायी संदाय आयुक्त को या प्रत्यक्षत: कर्मचारी को किया जाता है। 
  • अस्थायी संदाय करने से कर्मचारी को शेष राशि का दावा करने से रोका नहीं जा सकता। 

व्यतिक्रम एवं परिणाम (उपधारा 3): 

  • यदि नियोजक नियत तिथि से एक मास के भीतर संदाय करने में विफल रहता हैतो आयुक्त निम्नलिखित कार्रवाई करेगा: 
  • (क) ब्याज — नियोजक को निदेश दें कि वह बकाया राशि पर 12% साधारण ब्याज प्रति वर्ष (या केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किसी भी अनुसूचित बैंक की अधिकतम उधार दर तक) का संदाय करे। 
  • (ख) शास्ति — यदि विलंब का कोई औचित्य नहीं हैतो नियोजक को बकाया राशि के 50% तक का अतिरिक्त शास्ति अधिरोपित करने का निदेश दे सकता है 

किसी भी शास्ति आदेश को पारित करने से पहले नियोजक को कारण बताने का उचित अवसर दिया जाना चाहिये 

ब्याज एवं शास्ति का लाभार्थी (उपधारा 3): 

  • ब्याज और शास्ति दोनों की राशि कर्मचारी या उनके आश्रित को देय हैन कि राज्य को। 

मुख्य निष्कर्ष 

  • व्यतिक्रम होने पर दो स्तरीय परिणाम होते हैं — अनिवार्य ब्याज + विवेकाधीन शास्ति — और इन दोनों का भार व्यक्तिगत रूप से नियोजक पर पड़ता हैन कि किसी बीमाकर्त्ता पर।