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आपराधिक कानून
जघन्य अपराधों के लिये लागू जमानत के सिद्धांत गंभीर आर्थिक अपराधों पर भी समान रूप से लागू होते हैं
«18-Feb-2026
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राकेश मित्तल बनाम अजय पाल गुप्ता उर्फ सोनू चौधरी एवं अन्य "जघन्य अपराधों में जमानत से संबंधित सिद्धांत गंभीर आर्थिक अपराधों पर भी समान रूप से लागू होते हैं, क्योंकि ऐसे अपराध प्रत्यक्षत: नागरिकों की आर्थिक भलाई और जीवन की गुणवत्ता को कमजोर करते हैं।" न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
राकेश मित्तल बनाम अजय पाल गुप्ता उर्फ सोनू चौधरी और अन्य (2026) के मामले में न्यायमूर्ति संजय कुमार और के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के उस आदेश को अपास्त कर दिया, जिसमें एक आभ्यासिक वित्तीय कपट करने वाले को जमानत दी गई थी। पीठ ने निर्णय दिया कि जघन्य अपराधों में जमानत के लिये लागू सिद्धांत गंभीर आर्थिक अपराधों पर भी समान रूप से लागू होते हैं। न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि जीवन और स्वतंत्रता का मूल्य व्यक्तिगत सुरक्षा से कहीं अधिक है और इसमें नागरिकों की आर्थिक भलाई भी सम्मिलित है।
राकेश मित्तल बनाम अजय पाल गुप्ता उर्फ सोनू चौधरी और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह याचिका इलाहाबाद उच्च न्यायालय (लखनऊ पीठ) के उस आदेश के विरुद्ध दायर की गई है जिसमें बड़े पैमाने पर छल, आपराधिक न्यासभंग, कूटरचना और आपराधिक अभित्रास से जुड़े एक मामले में अभियुक्त को जमानत दी गई थी।
- अपीलकर्त्ता-परिवादकर्त्ता ने अभिकथित किया कि उसने अभियुक्त और उसके सहयोगियों को 11.52 करोड़ रुपए से अधिक मूल्य का अनाज दिया था, लेकिन उसे केवल 5.02 करोड़ रुपए का संदाय प्राप्त हुआ। शेष राशि को कथित तौर पर कूटरचित दस्तावेज़ों, फर्जी पतों और कई मिथ्या पहचानों के माध्यम से हड़प लिया गया।
- प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) भारतीय दण्ड संहिता की धारा 406, 419, 420, 467, 468, 471 और 506 के अधीन दर्ज की गई थी। अन्वेषण के दौरान, भारतीय दण्ड संहिता की धारा 409 (विश्वास के पद पर आसीन व्यक्ति द्वारा आपराधिक न्यासभंग) भी जोड़ी गई।
- अभियोजन पक्ष ने अभिकथित किया कि अभियुक्त कई उपनामों से काम करता था, उसके पास कई कूटरचित आधार और पैन कार्ड थे, वह लगभग 20 महीनों तक फरार रहा और इनाम की घोषणा के बाद ही उसे गिरफ्तार किया गया।
- सेशन न्यायालय ने आपराधिक पृष्ठभूमि छिपाने और जानबूझकर न्यायालय को गुमराह करने का हवाला देते हुए पहले जमानत याचिका खारिज कर दी थी। तथापि, उच्च न्यायालय ने सह-अभियुक्तों के साथ समानता के आधार पर जमानत दे दी, यह देखते हुए कि अपराध मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय था, आरोप पत्र दाखिल किया जा चुका था और अभियुक्त कुछ समय अभिरक्षा में बिता चुका था।
- उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुए परिवादकर्त्ता ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन द्वारा लिखित निर्णय में पीठ ने निम्नलिखित प्रमुख टिप्पणियां कीं:
- न्यायालय ने निर्णय दिया कि यद्यपि नीरू यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2014) और सुधा सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2021) जैसे पूर्व के निर्णय जघन्य और हिंसक अपराधों से संबंधित थे, परंतु उनमें निहित अंतर्निहित सिद्धांत वित्तीय कपट से जुड़े मामलों पर भी समान रूप से लागू होते हैं।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि जीवन और स्वतंत्रता का मूल्य केवल शारीरिक व्यक्ति तक ही सीमित नहीं है, अपितु इसमें जीवन की गुणवत्ता भी सम्मिलित है, जिसमें आर्थिक कल्याण भी सम्मिलित है - जिससे जमानत संबंधी विधिशास्त्र के प्रयोजनों के लिये गंभीर आर्थिक अपराध हिंसक अपराधों से कम गंभीर नहीं हैं।
- पीठ ने पाया कि उच्च न्यायालय ने अपराध में अभियुक्त की सक्रिय भूमिका, उसके बार-बार अपराध करने के इतिहास, कई फर्जी पहचानों के प्रयोग और जमानत मिलने के बावजूद फरार होने के उसके पूर्व आचरण पर विचार किये बिना, समानता के सिद्धांत को अंधाधुंध लागू करने में त्रुटी की।
- न्यायालय ने अभियुक्त को एक पेशेवर अपराधी और समाज के लिये खतरा पाया , यह देखते हुए कि उसने पहले प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) संख्या 229/2017 में जमानत प्राप्त की थी, उसके बाद फरार हो गया और उसी तरह की कपटपूर्ण क्रियाकलापों में लिप्त रहा, जिसके परिणामस्वरूप वर्षों में कई प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की गईं।
- न्यायालय ने माना कि आपराधिक इतिहास, फरार होने के आचरण, फर्जी पहचान के उपयोग और बार-बार अपराध करने की संभावना को नजरअंदाज करने से जमानत आदेश विकृत हो जाता है और अपीलीय हस्तक्षेप के लिये कमजोर हो जाता है ।
आर्थिक अपराध क्या हैं?
बारे में:
- आर्थिक अपराध वे अपराध हैं जो आर्थिक या व्यावसायिक क्रियाकलापों के दौरान किये जाते हैं और जिनसे वित्तीय नुकसान होता है तथा देश की आर्थिक भलाई और वित्तीय स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
- इन अपराधों में सामान्यत: कर चोरी, मनी लॉन्ड्रिंग, बैंक कपट, प्रतिभूति घोटाले, कॉर्पोरेट कपट, तस्करी और भ्रष्टाचार जैसी कपटपूर्ण क्रियाकलाप शामिल होते हैं जो सार्वजनिक और निजी दोनों वित्तीय हितों को प्रभावित करते हैं।
- तथापि भारत में ऐसा कोई विशिष्ट विधान नहीं है जो आर्थिक अपराधों को व्यापक रूप से परिभाषित करता हो, फिर भी उन्हें अपराधों की एक भिन्न श्रेणी के रूप में माना जाता है, जिन पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती है - जिसे प्रथम बार भारत के 47वें विधि आयोग (1972) द्वारा मान्यता दी गई थी ।
- आर्थिक अपराधों को पारंपरिक अपराधों की तुलना में अधिक गंभीर माना जाता है क्योंकि वे पूरी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं, देश के वित्तीय स्वास्थ्य के लिये गंभीर संकट उत्पन्न करते हैं और वित्तीय प्रणाली में जनता के विश्वास को हिला देते हैं।
- इन अपराधों में अक्सर जटिल संव्यवहार, परिष्कृत तरीके और सार्वजनिक धन की महत्त्वपूर्ण मात्रा शामिल होती है, जो इन्हें नियमित आपराधिक अपराधों से भिन्न बनाती है और इसके लिये विशेष अन्वेषण और अभियोजन दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है।
आर्थिक अपराधों से संबंधित विधिक उपबंध:
भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023:
- भारतीय न्याय संहिता ने भारतीय दण्ड संहिता, 1860 का स्थान लिया है और आर्थिक अपराधों से संबंधित उपबंधों को बरकरार रखते हुए उन्हें समेकित किया है। भारतीय न्याय संहिता की धारा 316 छल और बेईमानी से संपत्ति सौंपने के लिये प्रेरित करने से संबंधित है। धारा 316(2) विशेष रूप से लोकहित से जुड़े छल के मामलों को संबोधित करती है। आपराधिक न्यासभंग (धारा 316 को धारा 318 के साथ सहपठित), कूटरचना (धारा 336-340) और आपराधिक दुर्विनियोग (धारा 314) से संबंधित उपबंध नई संहिता के अधीन वित्तीय कपट के मामलों को नियंत्रित करते रहेंगे।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता ने दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 का स्थान लिया है और आर्थिक अपराधों के मामलों में जमानत के प्रक्रियात्मक पहलुओं को नियंत्रित करता है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 482 अग्रिम जमानत से संबंधित है, जिसमें आर्थिक अपराध के मामले भी सम्मिलित हैं। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 479 जमानतीय अपराधों में जमानत को नियंत्रित करती है, जबकि धारा 480 अजमानतीय अपराधों में जमानत को नियंत्रित करती है। वित्तीय कपट के मामलों में आपराधिक पृष्ठभूमि, भागने का जोखिम और बार-बार अपराध करने की संभावना पर विचार करते समय ये दोनों धाराएँ सुसंगत होती हैं।
धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002:
- धारा 2(प) "अपराध की आगम" को आपराधिक गतिविधि से प्राप्त या अर्जित संपत्ति के रूप में परिभाषित करती है।
- धारा 3 धन शोधन को अपराध की आय से संबंधित प्रक्रियाओं में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लिप्त होने, साशय सहायता करने, पक्षकार बनने या शामिल होने के प्रयासों के रूप में परिभाषित करती है।
- धन शोधन निवारण अधिनियम के अधीन जमानत धारा 45 के अधीन कठोर दोहरी शर्तों के अधीन है, जिसके लिये न्यायालय को संतुष्ट होना आवश्यक है कि यह मानने के लिये उचित आधार हैं कि अभियुक्त दोषी नहीं है और जमानत पर रहते हुए कोई अपराध करने की संभावना नहीं है।
कंपनी अधिनियम, 2013:
- धारा 447 कपट की एक व्यापक परिभाषा प्रदान करती है, जिसमें कृत्य और लोप, तथ्यों को छिपाना, पद का दुरुपयोग, अनुचित लाभ के लिये की गई कार्रवाई और कंपनी या हितधारकों के हितों को नुकसान पहुँचाने वाली कार्रवाई सम्मिलित हैं।
आयकर अधिनियम, 1961:
- यह अधिनियम कर चोरी और आय छिपाने को अपराध घोषित करता है, और रिटर्न प्रस्तुत करने में विफलता, नोटिस का अनुपालन न करने और आय या अतिरिक्त लाभ संबंधी विवरणों को छिपाने के लिये दण्ड का प्रावधान करता है।
सीमा शुल्क अधिनियम, 1962:
- यह अधिनियम देश के अंदर और बाहर माल की आवाजाही को नियंत्रित करता है, अवैध रूप से आयातित माल की जब्ती का प्रावधान करता है, और तस्करी के विरुद्ध सुरक्षा उपाय प्रदान करता है।
भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम, 2018:
- यह विधान उन अपराधियों को लक्षित करता है जो अभियोजन से बचने के लिये भारत से भाग गए हैं। यह धन शोधन निवारण अधिनियम के अधीन निदेशकों और उप निदेशकों को अधिकार प्रदान करता है और भगोड़े आर्थिक अपराधियों की संपत्तियों की कुर्की और ज़ब्ती का प्रावधान करता है।
दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016:
- दण्ड प्रावधानों में कपटपूर्ण दिवालिया कार्यवाही के लिये कम से कम 1 लाख रुपए के दण्ड का उपबंध है, जिसे 1 करोड़ रुपए तक बढ़ाया जा सकता है।
अन्य विशिष्ट विधियाँ:
- कई अन्य विधि आर्थिक अपराधों की विशिष्ट श्रेणियों को संबोधित करती हैं, जिनमें केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम, 1944 (उत्पाद शुल्क की चोरी), सेबी विनियम, 1995 (शेयर बाजार में हेरफेर), सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (क्रेडिट कार्ड कपट एवं साइबर अपराध), तथा राज्य-विशिष्ट भूमि हड़पने से संबंधित विधि, जैसे आंध्र प्रदेश भूमि हड़प प्रतिषेध अधिनियम, 1982, सम्मिलित हैं।
ऐतिहासिक मील के पत्थर माने जाने वाले मामले:
- हर्षद मेहता सिक्योरिटीज घोटाला (1992):
- बैंकिंग प्रणाली और शेयर बाजार में हेरफेर से जुड़ा पहला बड़ा वित्तीय घोटाला।
- फर्जी बैंक रसीदों और प्रतिभूतियों के माध्यम से ₹4,000 करोड़ का नुकसान हुआ।
- सत्यम घोटाला (2009):
- राजस्व में हेरफेर और 14,000 करोड़ रुपए के फर्जी बिलों से जुड़ा एक ऐतिहासिक कॉर्पोरेट कपट मामला।
- भारत में कॉर्पोरेट गवर्नेंस सुधारों के लिये एक महत्त्वपूर्ण पूर्व निर्णय स्थापित किया।
- 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला (2011):
- स्पेक्ट्रम लाइसेंसों के अनियमित एवं मनमाने आवंटन से संबंधित सबसे बड़ा दूरसंचार घोटाला।
- इसके परिणामस्वरूप ₹1.76 लाख करोड़ का नुकसान हुआ और 122 लाइसेंस रद्द कर दिये गए।
- PNB कपट मामला (2018):
- फर्जी लेटर ऑफ क्रेडिट से जुड़ा एक बड़ा बैंकिंग घोटाला, जिसकी कीमत ₹14,000 करोड़ है।
- बैंकिंग प्रणाली में उजागर हुई कमजोरियों के कारण बड़े मूल्य के संव्यवहार की कठोर निगरानी शुरू हुई।