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सिविल कानून

विदेशी डिक्रियों के निष्पादन में विवाद्यकों की विरचना अनिवार्य नहीं है

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 13-Feb-2026

एलिस जेन क्विनलान और अन्य बनाम नवीन कुमार सेठ 

यह हर मामले में आवश्यक नहीं है कि संहिता की धारा 13 के खंड (क) से (च) के अंतर्गत सूचीबद्ध परिस्थितियों की जांच के लिये विवाद्यकों की विरचना की जाएं और साक्ष्य प्रस्तुत किये जाएं। ऐसा इसलिये है क्योंकि विधायी उद्देश्य व्यतिकारी राज्यक्षेत्र में विदेशी न्यायालय द्वारा पारित डिक्री का त्वरित और शीघ्र निष्पादन सुनिश्चित करना है।” 

न्यायमूर्ति संदीप वी. मार्ने 

स्रोत: बॉम्बे उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

बॉम्बे हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति संदीप वी. मार्ने ने एलिस जेन क्विनलान और अन्य बनाम नवीन कुमार सेठ (2026)के मामले मेंविदेशी डिक्रीदारों द्वारा दायर एक रिट याचिका को खारिज कर दियाजिसमें जिला न्यायाधीश के उस आदेश को चुनौती दी गई थी जिसमें विवाद्यकों की विरचना की गई थी और सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) की धारा 44क के अधीन निष्पादन कार्यवाही में साक्ष्य पेश करने की अनुमति दी गई थी। 

  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि व्यतिकारी राज्यक्षेत्रों से विदेशी डिक्रियों के निष्पादन में विवाद्यकों की विरचना अनिवार्य नहीं है।  

एलिस जेन क्विनलान और अन्य बनाम नवीन कुमार सेठ (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह निर्णय संयुक्त अरब अमीरात के फुजैराह सिविल न्यायालय ने दिया 
  • संयुक्त अरब अमीरात को सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 44क के अधीन व्यतिकारी राज्यक्षेत्र के रूप में अधिसूचित किया गया था। 
  • डिक्रीदारों ने भारत में निष्पादन कार्यवाही प्रारंभ की। 
  • निर्णय के देनदार ने विवाद्यकों की विरचना करने और साक्ष्य प्रस्तुत करने की अनुमति मांगने के लिये एक आवेदन दायर किया। 
  • निष्पादन न्यायालय ने निम्नलिखित से संबंधित कई विवाद्यकों की विरचना की: 
    • कपट 
    • प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन 
    • तात्विक तथ्यों का दमन 
    • परिसीमा  
    • पोषणीयता  
  • इससे व्यथित होकरडिक्रीदारों ने रिट याचिका के अधीन उच्च न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

व्यतिकारी और अव्यतिकारी राज्यक्षेत्रों के बीच अंतर: 

न्यायालय ने धारा 13, 14 और 44क सिविल प्रक्रिया संहिता की योजना की परीक्षा की और मौलिक अंतर को दोहराया: 

  • व्यतिकारी राज्यक्षेत्र – विदेशी डिक्री को घरेलू डिक्री की तरह ही निष्पादित किया जा सकता हैकेवल धारा 13 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन सीमित अपवादों के अधीन। 
  • अव्यतिकारी राज्यक्षेत्र – विदेशी निर्णय के आधार पर एक नया वाद करना होगाजिससे पूर्ण विचारण होगा 

इस प्रकारधारा 44क के अधीन कार्यवाही किसी विदेशी निर्णय पर संस्थित करने के समकक्ष नहीं है। 

धारा 44क के अंतर्गत जांच की प्रकृति: 

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि: 

  • धारा 44क (3) के साथ धारा 13 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन जांच सामान्यत:संक्षिप्त प्रकृति की होतीहै । 
  • यह साबित करने का भार कि डिक्री धारा 13 सिविल प्रक्रिया संहिता के खण्ड (क) से (च) के अंतर्गत किसी अपवाद के अंतर्गत आती हैनिर्णितऋणी पर है। 
  • अपवादों का अस्तित्व सामान्यतः निम्नलिखित से ज्ञात किया जा सकता है: 
    • अभिवचन 
    • विदेशी निर्णय 
    • विदेशी न्यायालय के समक्ष कार्यवाही 

अंतिम निदेश: 

  • रिट याचिका खारिज कर दी गई। 
  • जिला न्यायाधीश को निदेश दिया गया कि वे विवाद्यकों की विरचना पर शीघ्रता सेअधिमानतःतीन महीनेके भीतरअपने निष्कर्ष प्रस्तुत करें। 

सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 13 क्या है? 

सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 13 मेंकहा गया है कि विदेशी निर्णय उसके द्वारा उन्हीं पक्षकारों के बीच या उसी हक के अधीन मुकदमा करने वाले ऐसे पक्षकारों के बीचजिनसे व्युत्पन्न अधिकार के अधीन वे या उनमें से कोई दावा करते हैंप्रत्यक्षतः न्यायनिर्णीत किसी विषय के बारे में वहाँ के सिवाय निश्चायक होगा जहाँ 

  • (क) वह सक्षम अधिकारिता वाले न्यायालय द्वारा नहीं सुनाया गया है; 
  • (ख) वह मामले के गुणागुण के आधार पर नहीं दिया गया है; 
  • (ग) कार्यवाहियों के सकृत दर्शने स्पष्ट है कि वह अंतर्राष्ट्रीय विधि के अशुद्ध बोध पर या भारत की विधि को उन मामलों में जिनको वह लागू हैमान्यता देने से इंकार करने पर आधारित है; 
  • (घ) वे कार्यवाहियाँजिनमें वह निर्णय अभिप्राप्त किया गया थानैसर्गिक न्याय के विरुद्ध हैं; 
  • (ङ) वह कपट द्वारा अभिप्राप्त किया गया है; 
  • (च) वह भारत में प्रवृत्त किसी विधि के भंग पर आधारित दावे को ठीक ठहराता है 

इस धारा में यह उपबंधित किया गया है कि उपर्युक्त छह खण्डों के सिवाय, कोई विदेशी निर्णय पूर्व-निर्णय के रूप में कार्य कर सकता है। 

(क) सक्षम न्यायालय द्वारा नहीं दिया गया विदेशी निर्णय 

  • पक्षकारों के मध्य निश्चायक होने के लिये विदेशी न्यायालय का निर्णय ऐसे न्यायालय द्वारा पारित होना चाहियेजो सक्षम अधिकारिता रखता हो 
  • सक्षम न्यायालय से आशय ऐसा न्यायालय हैजिसे पक्षकारों तथा विवाद के विषय-वस्तु पर अधिकारिता प्राप्त हो 
  • किसी विदेशी देश के न्यायालय को निम्नलिखित परिस्थितियों में अधिकारिता प्राप्त मानी जाती है: 
  • जहाँ वाद की शुरुआत के समय प्रतिवादी उस देश में निवास करता हो अथवा वहाँ उपस्थित होजिससे उसे उस देश की विधयों का संरक्षण तथा लाभ प्राप्त हो 
    • जहाँ निर्णय के समय प्रतिवादी उस देश का नागरिक या प्रजा हो। 
    • जहाँ विदेशी न्यायालय की अधिकारिता पर आक्षेप करने वाले पक्षकार ने अपने आचरण द्वारा उस अधिकारिता को स्वीकार कर लिया हो, 
      • वादी के रूप में उपस्थित होकर या प्रतिदावा करकेया 
      • प्रतिवादी के रूप में स्वेच्छा से उपस्थित होकरया 
      • अभिव्यक्त या विवक्षित रूप से यह संविदा करने कि वह ऐसे न्यायालय की अधिकारिता को स्वीकार करेगा।  
  • भारत निधि लिमिटेड बनाम मेघ राज महाजन (1964)के मामले में यह निर्णय दिया गया था कि किसी विदेशी निर्णय कोभारतीय न्यायालयों मेंपूर्व-निर्णयके रूप में लागू होने के लिये केवल सक्षम अधिकारिता वाले विदेशी न्यायालय द्वारा हीपारित किया जाना चाहिये 

(ख) गुण-दोष पर आधारित न होने वाला विदेशी निर्णय 

  • विदेशी निर्णय तभी निश्चायक माना जाएगा जब वह गुण-दोष पर आधारित होअर्थात् न्यायालय द्वारा मामले की सत्यता या असत्यता पर विचार कर पारित किया गया हो 
  • यह निर्धारित करने की वास्तविक कसौटी यह है कि क्या निर्णय मात्र औपचारिक रूप से अथवा प्रतिवादी के आचरण के दण्डस्वरूप पारित किया गया हैया फिर वादी के दावे की सत्यता/असत्यता पर विचार कर दिया गया है।  

(ग) भारतीय या अंतर्राष्ट्रीय विधि के प्रतिकूल विदेशी निर्णय 

  • ऐसा निर्णयजो अंतरराष्ट्रीय विधि की गलत व्याख्या पर आधारित हो या जहाँ लागू होने पर भी भारतीय विधि को मान्यता देने से इंकार किया गया होनिर्णायक नहीं माना जाएगा 
  • यह त्रुटि कार्यवाही के अभिलेख से स्पष्ट रूप से दिखाई देनी चाहिये 

(घ) प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध विदेशी निर्णय 

  • विदेशी निर्णय को प्राकृतिक न्याय की न्यूनतम आवश्यकताओं का पालन करना चाहियेअर्थात् पक्षकारों को युक्तिसंगत सूचना दी गई हो तथा प्रत्येक पक्षकार को अपना पक्ष प्रस्तुत करने का समुचित अवसर प्रदान किया गया हो 
  • मात्र यह तथ्य कि विदेशी न्यायालय ने भारतीय न्यायालयों की प्रक्रिया का अनुसरण नहीं कियाअपने आप में निर्णय को प्राकृतिक न्याय के प्रतिकूल नहीं बनाता 
  • शंकरन बनाम लक्ष्मी (1974)के मामले मेंउच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि प्राकृतिक न्याय अभिव्यक्तिमामले की गुण-दोष के बजाय प्रक्रिया में अनियमितताओं से संबंधित है। 

(कपट द्वारा प्राप्त विदेशी निर्णय 

  • निजी अंतर्राष्ट्रीय विधि का यह एक सुस्थापित सिद्धांत है कि यदि विदेशी निर्णय कपट से प्राप्त किया गया हैंतो वेपूर्व-निर्णय के रूप में कार्य नहीं करेंगा 
    • अधिकारिता से संबंधित तथ्यों पर किया गया कपट सभी न्यायिक कार्यों को दूषित कर देता है।  
    • यह कपट या तोउस पक्षकार के साथ हो सकता है जो किसी विदेशी निर्णय को अमान्य ठहरा रहा हैजिसके पक्ष में निर्णय दिया गया हैयाफिर उस न्यायालय के साथ हो सकता है जिसने निर्णय दिया है। 
  • सत्य बनाम तेजा सिंह (1975)के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि वादी द्वारा विदेशी न्यायालय को उसकी अधिकारिता के संबंध में गुमराह किये जाने के कारण प्राप्त निर्णय कपटयुक्त था और इसलिये वह निश्चायक नहीं है। 

(भारतीय विधि के उल्लंघन पर आधारित विदेशी निर्णय  

  • धारा 13(च) केअधीन यह आवश्यक नहीं है कि विदेशी न्यायालय की प्रक्रिया भारत में न्यायालयों की प्रक्रिया के समान या समरूप हो। 
  • तथापिजब कोई विदेशी निर्णय भारत में लागू किसी विधि के उल्लंघन पर आधारित होता हैतोउसे भारत में लागू नहीं किया जाएगा।