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सांविधानिक विधि
बाल अभिरक्षा विवादों में बंदी प्रत्यक्षीकरण का समावेश
«12-Feb-2026
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अकुल कुमार दिनेशभाई राणा और अन्य बनाम गुजरात राज्य और अन्य "किसी अवयस्क लड़की की उसकी माता के साथ अभिरक्षा को कभी भी विधिविरुद्ध अभिरक्षा या अवैध कारावास नहीं माना जा सकता, विशेषत: तब जब बालक की अभिरक्षा के संबंध में माता-पिता के बीच कोई कार्यवाही लंबित न हो।" न्यायमूर्ति एन.एस. संजय गौड़ा और न्यायमूर्ति डी.एम. व्यास |
स्रोत: गुजरात उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति एन.एस. संजय गौड़ा और न्यायमूर्ति डी.एम. व्यास की खंडपीठ ने अकुलकुमारा दिनेशभाई राणा और अन्य बनाम गुजरात राज्य और अन्य (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि कार्यरत माता द्वारा अपनी अवयस्क पुत्री को देखरेख और पालन-पोषण के लिये अपने माता-पिता के पास छोड़ने की व्यवस्था अवैध परिरोध नहीं है, और वैवाहिक विवाद में बच्चे की अभिरक्षा या कल्याण के प्रश्नों को हल करने के लिये बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पोषणीय नहीं है।
अकुलकुमारा दिनेशभाई राणा और अन्य बनाम गुजरात राज्य और अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह याचिका दो सरकारी कर्मचारियों के बीच वैवाहिक विवाद से संबंधित है, जो चार वर्ष की एक अवयस्क बच्ची के माता-पिता हैं।
- निरंतर सेवा तबादलों के कारण, माता-पिता दोनों को कुछ समय के लिये पृथक् स्थानों पर तैनात किया गया, जिसके बाद अंततः वे कच्छ जिले में एक साथ रहने लगे।
- जब दोनों पक्षकार पृथक् रहने लगे, तो तबादले के बाद पिता दूसरे शहर में चले गए, और लगभग एक वर्ष बाद, उन्होंने आपसी सहमति से विवाह विच्छेद का प्रस्ताव देते हुए एक विधिक नोटिस जारी किया।
- तत्पश्चात् माता ने पिता के विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498क के अधीन आपराधिक परिवाद दर्ज कराया।
- अगस्त 2023 में, माता चार वर्षीय बच्चे को अपने मायके ले गई, जहाँ बच्चा नाना-नानी के साथ रहने लगा।
- पिता ने अभिकथित किया कि यह व्यवस्था उनकी इच्छा के विरुद्ध की गई थी, और इस तथ्य की ओर इशारा किया कि उन्होंने बच्चे की स्कूली शिक्षा की व्यवस्था की थी और बच्चे को ले जाने से कुछ समय पहले ही स्कूल की फीस का संदाय किया था, और यह तर्क दिया कि यह निर्णय एकतरफा लिया गया था।
- माता का कहना था कि चूँकि दोनों माता-पिता नौकरी करते थे, इसलिये परिवार के सहयोग के बिना एक छोटे बच्चे की देखरेख करना व्यावहारिक रूप से मुश्किल हो गया था, और इसलिये उसने बच्चे की देखरेख में अपने माता-पिता की सहायता मांगी।
- पिता ने गुजरात उच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर माता और उसके नातेदार द्वारा अवयस्क बच्चे को अवैध रूप से निरोध में रखने का आरोप लगाया और बच्चे को न्यायालय के समक्ष पेश करने के साथ-साथ उसकी अभिरक्षा उसे सौंपने का निदेश देने की मांग की।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने प्रारंभ में ही यह बात नोट की कि किसी भी लंबित अभिरक्षा कार्यवाही या विद्यमान अभिरक्षा आदेशों की अनुपस्थिति में, चार वर्षीय बच्ची को उसकी माता के पास अभिरक्षा में रखना कभी भी विधिविरुद्ध अभिरक्षा या अवैध परिरोध के रूप में वर्णित नहीं किया जा सकता है।
- पीठ ने टिप्पणी की कि बच्चे की कम आयु को देखते हुए, बच्चे की आवश्यकताओं को पूरा करने का प्राथमिक उत्तरदायित्त्व स्वाभाविक रूप से पिता की बजाय माता पर होगी।
- न्यायालय ने कार्यरत दंपतियों द्वारा छोटे बच्चों के पालन-पोषण में आने वाली व्यावहारिक कठिनाइयों को स्वीकार किया और कहा कि यदि कोई कार्यरत माता बच्चे के सुरक्षित वातावरण में पालन-पोषण को सुनिश्चित करने के लिये अपने माता-पिता की सहायता लेने का निर्णय करती है, तो पिता को ऐसी व्यवस्था को अवैध अभिरक्षा या विधिविरुद्ध परिरोध करार देने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।
- पीठ ने दृढ़ता से कहा कि पिता की ऐसी व्यवस्था से असहमति इसे विधिविरुद्ध नहीं बनाती है, यह कहते हुए कि यह व्यवस्था एक माता द्वारा यह सुनिश्चित करने के लिये की गई थी कि उसकी पुत्री की अच्छी तरह से देखरेख की जाए, और यह पिता को बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर करने का अधिकार नहीं देगा।
- न्यायालय ने पिता की इस दलील को नामंजूर कर दिया कि बच्चे के कल्याण के लिये तत्काल अभिरक्षा अंतरण आवश्यक है, और यह माना कि वैवाहिक विवाद में बच्चे की अभिरक्षा या कल्याण के प्रश्नों का निर्णय करने के लिये बंदी प्रत्यक्षीकरण उपयुक्त उपचार नहीं है।
- पीठ ने निदेश दिया कि अंतरिम या स्थायी अभिरक्षा के लिये कोई भी दावा सक्षम कुटुंब न्यायालय के समक्ष बच्चे के कल्याण के मुद्दे पर उचित साक्ष्य प्रस्तुत करके ही किया जाना चाहिये।
- तदनुसार, बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज कर दी गई।
बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) क्या है?
अर्थ और प्रकृति:
- हेबियस कॉर्पस एक लैटिन शब्द है जिसका अर्थ है " तुम शरीर को प्रस्तुत करो।"
- यह एक विधिक प्रक्रिया है जो अवैध रूप से निरोध में लिये गए व्यक्तियों के लिये उपचारात्मक उपाय के रूप में कार्य करती है।
- इसका मूल उद्देश्य किसी व्यक्ति को विधिविरुद्ध निरोध या कारावास से छोड़ना है।
- यह न्यायालय द्वारा जारी किया गया एक आदेश है जिसमें बंदी को न्यायालय के समक्ष पेश करने और यह जांचने का निदेश दिया जाता है कि गिरफ्तारी वैध थी या नहीं।
- यह रिट किसी व्यक्ति के स्वतंत्रता और व्यक्तिगत आजादी के अधिकार का अवधारण करती है।
सांविधानिक उपबंध:
- अनुच्छेद 32 के अधीन उच्चतम न्यायालय और अनुच्छेद 226 के अधीन उच्च न्यायालयों को रिट जारी करने की शक्ति प्राप्त है।
- अनुच्छेद 32 के अधीन, उच्चतम न्यायालय मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के लिये रिट जारी करता है।
- अनुच्छेद 226 के अधीन, उच्च न्यायालयों के पास विधिक और मौलिक अधिकारों के उल्लंघन दोनों के लिये रिट जारी करने की व्यापक अधिकारिता है।
- उच्चतम न्यायालय को भारत की क्षेत्रीय सीमा के भीतर और बाहर स्थित सभी प्राधिकारियों पर अधिकारिता प्राप्त है।
- उच्च न्यायालय उन मामलों से निपटते हैं जब उस अधिकार पर उनका नियंत्रण होता है और वाद-हेतुक उनकी अधिकारिता के भीतर उत्पन्न होता है।
कौन आवेदन कर सकता है:
- वह व्यक्ति जो अवैध रूप से परिरोध या निरुद्ध किया गया हो।
- कोई भी ऐसा व्यक्ति जो मामले के हित से अवगत हो।
- मामले के तथ्यों और परिस्थितियों से परिचित कोई भी व्यक्ति जो स्वेच्छा से अनुच्छेद 32 या 226 के अधीन आवेदन दाखिल करता है।
- जैसा कि शीला बारसे बनाम महाराष्ट्र राज्य (1983) के मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया कि यदि निरुद्ध व्यक्ति स्वयं आवेदन प्रस्तुत करने में असमर्थ हो, तो उसकी ओर से कोई अन्य व्यक्ति आवेदन दायर कर सकता है।
जब याचिका खारिज हो जाती है:
- जब न्यायालय को निरुद्धकर्ता पर अधिकारिता प्राप्त न हो।।
- जब निरोध किसी सक्षम न्यायालय के आदेश से संबंधित हो।
- जब निरुद्ध व्यक्ति पहले ही मुक्त किया जा चुका हो।
- जब दोषों को दूर करके परिरोध को वैध ठहराया गया हो।
- जब कोई सक्षम न्यायालय गुण-दोष के आधार पर याचिका खारिज कर देता है।
प्रकृति और दायरा:
- यह एक प्रक्रियात्मक रिट है, न कि एक सार रिट, जैसा कि कानू सान्याल बनाम जिला मजिस्ट्रेट दार्जिलिंग (1974) के मामले में यह निर्णय दिया गया है।
- इस पद्धति में केवल शरीर को न्यायालय के समक्ष पेश करने के बजाय तथ्यों और परिस्थितियों की परीक्षा करके निरोध की वैधता पर बल दिया जाता है।
- यह रिट याचिका न केवल सदोष परिरोध से अपितु निरोध रखने वाले अधिकारियों द्वारा दुर्व्यवहार और विभेद से संरक्षण के लिये भी दायर की जा सकती है, जैसा कि सुनील बत्रा बनाम दिल्ली प्रशासन (1980) के मामले में कहा गया है।
- पूर्व-न्याय (res judicata) का सिद्धांत अवैध परिरोध के मामलों पर लागू नहीं होता; नए आधारों के साथ क्रमिक याचिकाएँ दायर की जा सकती हैं।
सबूत का भार:
- निरोध में रखने वाले व्यक्ति या प्राधिकारी पर यह साबित करने का भार होता है कि निरोध विधिक आधार पर था।
- यदि बंदी प्राधिकारी की अधिकारिता से बाहर विद्वेषपूर्ण परिरोध का आरोप लगाता है, तो सबूत का भार बंदी पर आ जाता है।