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आपराधिक कानून

परिवीक्षा अवधि समाप्त होने पर नियोजन संबंधी निरर्हता समाप्त हो जाती है

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 16-Feb-2026

भारत संघ और अन्य बनाम राजेश 

"अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 की धारा 12 के अधीन परिवीक्षा पर छोड़े जाने पर दोषसिद्धि से संलग्न निरर्हता को हटा देती हैभले ही दोषसिद्धि स्वयं समाप्त न हो।" 

मुख्य न्यायाधीश देवेन्द्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया 

स्रोत: दिल्ली उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

दिल्ली उच्च न्यायालय की एक खंडपीठजिसमें मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया शामिल थेनेयूनियन ऑफ इंडिया और अन्य बनाम राजेश (2026)के मामले में यह निर्णय दिया कि अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 की धारा 12 के अधीन परिवीक्षा पर छोड़े जाने पर लोक नियोजन के प्रयोजनों के लिये दोषसिद्धि से संलग्न निरर्हता को हटा देती हैभले ही दोषसिद्धि स्वयं समाप्त न हो।  

यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य बनाम राजेश (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • प्रत्यर्थी को उसकी पत्नी द्वारा दायर एक आपराधिक मामले में भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498क और 406 के अधीन दोषसिद्ध ठहराया गया था। 
  • उसने अपनी दोषसिद्धि के विरुद्ध अपीलीय न्यायालय में अपील दायर की। 
  • अपील की सुनवाई के दौरानदोनों पक्षकारों की आपसी सहमति से विवाह भंग कर दिया गया। 
  • अपीलीय न्यायालय ने दोषसिद्धि को बरकरार रखा लेकिनप्रत्यर्थी कोअपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 के अधीन सदाचरण पर परिवीक्षा पर छोड़ दिया गया 
  • तत्पश्चात्भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI) ने जूनियर एक्जीक्यूटिव (सामान्य कैडर) के पद पर भर्ती के लिये एक विज्ञापन जारी किया। प्रत्यर्थी ने आवेदन किया और चयन प्रक्रिया में सफल पाया गया।  
  • चयनित होने के बादउम्मीदवार ने आवश्यकतानुसार सत्यापन पत्र में अपने पूर्व दोषसिद्धि और तत्पश्चात् परिवीक्षा पर छोड़े जाने का प्रकटन किया। 
  • भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI) ने उनकी नियुक्ति इस आधार पर रद्द कर दी कि उन्हें नैतिक अधमता से संलग्न अपराध के लिये दोषसिद्ध ठहराया गया था और इसलिये वे AAI के सेवा विनियमों के विनियमन 6(7)(ख) के अधीन नियुक्ति के लिये अयोग्य था 
  • उम्मीदवार ने इस रद्द करने को दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी। एकल न्यायाधीश ने उनकी याचिका मंजूर कर ली और AAI को उसे नियुक्त करने का निदेश दियायह मानते हुए कि अपराधी परिवीक्षा अधिनियम की धारा 12 के अधीन निरर्हता समाप्त हो गई थी। 
  • एकल न्यायाधीश के आदेश से असंतुष्ट होकर, AAI ने खंडपीठ के समक्ष लेटर पेटेंट अपील (Letters Patent Appeal) दायर की। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने नोट किया कि भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI) के सेवा विनियमों के विनियमन 6(7)(ख) के अनुसार नैतिक अधमता से जुड़े अपराध के लिये दोषसिद्ध ठहराए गए व्यक्ति को नियुक्ति के लिये अयोग्य माना जाता है। 
  • खंडपीठ ने शंकर दास बनाम भारत संघ (1985) में उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर विश्वास किया,जिसमेंयह देखा गया कि 1958 अधिनियम की धारा 12 में "निरर्हता" शब्द का प्रयोग उन संविधि के संदर्भ में किया जाता है जो किसी दोषसिद्ध व्यक्ति को कुछ अधिकारों या पदों से वंचित करते हैंजैसे कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के अधीन विधायी सदस्यता के लिये निरर्हता 
  • न्यायालय ने माना कि शास्ति के रूप में विद्यमान नौकरी से बर्खास्तगी धारा 12 के अर्थ में निरर्हता नहीं हैकिंतु दोषसिद्धि के परिणामस्वरूप नई नियुक्ति पर रोक वास्तव में इस प्रावधान के अधीन परिकल्पित निरर्हता है। 
  • खंडपीठ ने माना कि AAI के नियमों के अधीन उम्मीदवार की अपात्रता सीधे तौर पर उसकी दोषसिद्धि से संबंधित थी। चूँकि उसे परिवीक्षा पर छोड़ा गया थाइसलिये 1958 अधिनियम की धारा 12 लागू होती हैऔर परिणामस्वरूप, उसकी दोषसिद्धि से संलग्न निरर्हता हटा दी गई है।  
  • न्यायालय ने आगे स्पष्ट किया कि निरर्हता को हटाने का अर्थ यह नहीं है कि दोषसिद्धि ही समाप्त हो जाती हैइसका अर्थ केवल यह है कि लोक नियोजन पर लगा परिणामी प्रतिबंध हटा दिया जाता है।  
  • खंडपीठ ने इसके अतिरिक्त यह भी कहा कि यह अपराध एक वैवाहिक विवाद से उत्पन्न हुआ था जिसे बाद में सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझा लिया गया थाविवाह आपसी सहमति से भंग कर दिया गया थाऔर परिवादकर्त्ता पत्नी ने कोई आक्षेप नहीं किया था 
  • तदनुसारखंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के उस आदेश को बरकरार रखा जिसमें AAI को उम्मीदवार को जूनियर एक्जीक्यूटिव के पद पर नियुक्त करने का निदेश दिया गया थाऔर AAI द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया। 

अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 क्या है? 

अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 का परिचय 

क्रम सं. 

पहलू 

विवरण 

1. 

शीर्षक 

परिवीक्षा अधिनियम, 1958 

2. 

अधिनियम संख्या 

1958 का अधिनियम संख्यांक 20 

3. 

अधिनियमन की तिथि 

16 मई, 1958 

4. 

प्रवर्तन की तिथि 

किसी राज्य में उस तिथि सेयह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जिसे वह राज्य सरकार राजपत्र, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करेऔर राज्य के विभिन्न भागों के लिये विभिन्न तारीखें नियत  की जा सकेगी 

5. 

स्थानीय विस्तार 

संपूर्ण भारत में प्रवर्तनीय (2019 के संशोधन के पश्चात् जम्मू एवं कश्मीर सहित)। 

6. 

उद्देश्य 

अपराधियों को परिवीक्षा पर या सम्यक् भर्त्सना के पश्चात् छोड़ दिये जाने के लिये और इससे संबद्ध बातों के लिये उपबंध करने के लिये अधिनियम 

7. 

संरचना 

कुल धाराएँ: 19 

 अधिनियम के बारे में: 

  • अपराधियों कोपरिवीक्षा पर या सम्यक् भर्त्सना के पश्चात् छोड़ दिये जाने और उससे संबंधित मामलों के लियेएक अधिनियम। 
  • इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य अपराधियों कोकठोर अपराधी बनने से रोकने के लियेउन्हें स्वयं को सुधारने का अवसर देना है। 
  • यह अधिनियम अपराधियों को परिवीक्षा पर या सम्यक् भर्त्सना के पश्चात् छोड़े जाने का उपबंध करता है। 
  • यह अधिनियम अपराधियों को सदाचार के आधार पर परिवीक्षा पर छोड़े जाने की अनुमति देता हैबशर्ते कि उनके द्वारा किये गए कथित अपराध के लिये आजीवन कारावास या मृत्युदण्ड का दण्ड न हो। 
  • यह अधिनियम दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) के उपबंधों के अधीन दोषसिद्ध ठहराए गए लोगों केसाथ-साथ उन लोगों को भी सम्यक् भर्त्सना के पश्चात् छोड़ जाने की अनुमति देता हैजिन्हें वर्ष का दण्ड या जुर्माना या दोनों का दण्ड दिया गया है। 

अधिनियम की धारा 12: 

धारा 12 – दोषसिद्धि से संलग्न निरर्हता का हटाया जाना  

  • यह किसी अन्य संविधि में निहित किसी भी उपबंध के होते हुए भी प्रवर्तनीय है — अर्थात् अन्य अधिनियमों के परस्पर विरोधी उपबंधों पर अधिभावी प्रभाव रखता है 
  • यह उन व्यक्तियों पर लागू होता है जिन्हें किसी अपराध का दोषसिद्ध पाया गया हो और जिनके साथधारा 3 (भर्त्सना के पश्चात् छोड़ देना) याधारा 4 (सदाचरण की परिवीक्षा पर छोड़े देना) के अधीन कार्यवाही की गई हो। 
  • ऐसे व्यक्तियों कोकिसी भी प्रकार की निरर्हता का सामना नहीं करना पड़ेगाजो सामान्यतः किसी विधि के अधीन दोषसिद्धि से संलग्न होते है (उदाहरण के लियेलोक नियोजन पर प्रतिबंधविधायी सदस्यता पर प्रतिबंध आदि)। 
  • दोषसिद्धि स्वयं निरस्त नहीं होती — केवल परिणामी निरर्हता को हटाया जाता हैं। 
  • परंतुक (अपवाद):धारा 12 के अधीन संरक्षण लागू नहीं होगा यदि व्यक्ति को धारा के अधीन परिवीक्षा पर छोड़े जाने के पश्चात् मूल अपराध के लिये दण्ड सुनाया जाता है (अर्थात्यदि परिवीक्षा रद्द कर दी जाती है और मूल दण्ड अधिरोपित किया जाता है)।