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आपराधिक कानून
गिरफ्तारी ज्ञापन
«16-Feb-2026
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शिवम चौरसिया बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, गृह मंत्रालय के प्रधान सचिव, लखनऊ और अन्य "गिरफ्तारी के कारणों को गिरफ्तार व्यक्ति को देना अनिवार्य है। यदि गिरफ्तारी के कारणों का उल्लेख गिरफ्तारी ज्ञापन में नहीं है और उस पर साक्षियों के हस्ताक्षर नहीं हैं, तो पृथक् कागज पर गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी अभियुक्त को देना अमान्य है।" न्यायमूर्ति अब्दुल मोइन और न्यायमूर्ति बबीता रानी |
स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति अब्दुल मोइन और न्यायमूर्ति बबीता रानी की पीठ ने शिवम चौरसिया बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, गृह मंत्रालय के प्रधान सचिव, लखनऊ और अन्य (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि गिरफ्तारी के कारणों को पृथक् कागज पर प्रस्तुत करना अमान्य है, जब इसका उल्लेख गिरफ्तारी ज्ञापन में न हो और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 36 के अधीन आवश्यक साक्षियों का अनुप्रमाणन न हो। न्यायालय ने आगे निदेश दिया कि याचिकाकर्त्ता को छोड़े दिया जाए, क्योंकि रिमांड आदेश यांत्रिक रूप से पारित किया गया था।
शिवम चौरसिया बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- याचिकाकर्त्ता और कथित पीड़िता लड़की के बीच आपसी सहमति से संबंध था, जिसका पीड़िता के परिवार ने विरोध किया था।
- पीड़िता के परिवार ने याचिकाकर्त्ता के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 137(2), 87, 64(1), और 351(3) तथा लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा 3 और 4 के अधीन प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज कराई है, जिसमें अभिकथित किया गया है कि याचिकाकर्त्ता ने लड़की को अंतरंग वीडियो ऑनलाइन जारी करने की धमकी देकर ब्लैकमेल किया।
- याचिकाकर्त्ता को पुलिस चौकी में बुलाया गया, जहाँ उसे गिरफ्तारी ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने के लिये विवश किया गया और बाद में उसे गिरफ्तार कर लिया गया।
- उसके भाई को चौकी छोड़ने का निदेश दिया गया था, और याचिकाकर्त्ता की माता को गिरफ्तारी की सूचना केवल टेलीफोन के माध्यम से दी गई थी।
- गिरफ्तारी संबंधी ज्ञापन में गिरफ्तारी के किसी भी आधार का प्रकटन नहीं किया गया था।
- प्रतापगढ़ स्थित लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण (POCSO) न्यायालय के विशेष न्यायाधीश ने साक्ष्यों पर ध्यान नहीं दिया और एक निरर्थक रिमांड आदेश के माध्यम से याचिकाकर्त्ता को 14 दिन की न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया। तत्पश्चात्, इलाहाबाद उच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की गई।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य (2025) के मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर विश्वास करते हुए कहा कि किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधारों की जानकारी दिये बिना निरोध में नहीं लिया जा सकता है, और ऐसे आधारों को गिरफ्तार व्यक्ति को सूचित करना अनिवार्य है।
- गिरफ्तारी ज्ञापन की परीक्षा करने पर न्यायालय ने पाया कि उसमें केवल उन धाराओं का उल्लेख था जिनके अधीन प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई थी, किंतु गिरफ्तारी के कोई आधार या कारण नहीं बताए गए थे। राज्य के अधिवक्ता ने गिरफ्तारी के कारणों को एक अलग कागज पर प्रस्तुत किया, जिस पर केवल याचिकाकर्त्ता के हस्ताक्षर थे।
- न्यायालय ने इन पृथक् रूप से प्रस्तुत किये गए आधारों पर विश्वास करने से इंकार कर दिया, यह देखते हुए कि वे गिरफ्तारी ज्ञापन का भाग नहीं थे, दिनांक 28.01.2026 के गिरफ्तारी ज्ञापन के कॉलम 12 या कॉलम 13 में, या ज्ञापन के किसी अन्य भाग में, यह संकेत नहीं दिया गया था कि आधार पृथक् रूप से प्रस्तुत किये जा रहे हैं, और उस पृथक् कागज पर किसी साक्षी का अनुप्रमाणन नहीं था। अतः न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि आधार या तो गिरफ्तारी ज्ञापन के साथ ही या उसके पश्चात् तैयार किये गए थे।
गिरफ्तारी ज्ञापन क्या होता है?
बारे में:
- गिरफ्तारी ज्ञापन एक औपचारिक लिखित दस्तावेज़ है जिसे पुलिस अधिकारी द्वारा गिरफ्तारी के समय तैयार किया जाता है, जिसमें गिरफ्तारी से संबंधित तात्त्विक विवरण दर्ज होते हैं।
- यह गिरफ्तारी की घटना का एक आधिकारिक अभिलेख के रूप में कार्य करता है और मनमानी या विधिविरुद्ध निरोध को रोकने के लिये प्राथमिक जवाबदेही उपकरण के रूप में काम करता है।
- यह प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) से पृथक् है - जबकि प्रथम सूचना रिपोर्ट में अपराध होने का विवरण अभिलिखित होता है, गिरफ्तारी ज्ञापन में गिरफ्तारी के तथ्य और परिस्थितियाँ अभिलिखित होती हैं।
विधिक आधार:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 36 (धारा 41ख, दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 के स्थान पर) - प्रत्येक पुलिस अधिकारी के लिये गिरफ्तारी करते समय गिरफ्तारी ज्ञापन तैयार करने का सांविधिक दायित्त्व निर्धारित करती है।
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 36 में गिरफ्तारी की प्रक्रिया और गिरफ्तार करने वाले अधिकारी के कर्त्तव्यों का वर्णन किया गया है।
- भारत के संविधान का अनुच्छेद 22(1) राज्य पर एक अनिवार्य अपवाद कर्त्तव्य अधिरोपित करता है कि वह गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार प्रदान करे जिससे वह व्यक्ति अपनी पसंद के विधिक व्यवसायी से परामर्श करके अपनी प्रतिरक्षा कर सके।
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 47 (दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 50 के अनुरूप) के अनुसार, गिरफ्तार करने वाले अधिकारी को गिरफ्तार व्यक्ति को अपराध का पूरा विवरण तुरंत सूचित करना अनिवार्य है।
- के. बसु (1997) द्वारा जारी गिरफ्तारी ज्ञापन संबंधी दिशानिर्देशों को बाद में 2008 के संशोधन अधिनियम के माध्यम से दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 में शामिल किया गया, जो 1 नवंबर 2010 से प्रभावी हुआ, और अब यह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 में परिलक्षित होता है।
गिरफ्तारी ज्ञापन की अनिवार्य सामग्री
धारा 36, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 और डी.के. बसु दिशानिर्देशों के अनुसार, गिरफ्तारी ज्ञापन में निम्नलिखित बातें होनी चाहिये:
- गिरफ्तार करने वाले अधिकारी का नाम और पहचान (यह सटीक, स्पष्ट और दिखाई देने योग्य होना चाहिये)।
- गिरफ्तार व्यक्ति का नाम और विवरण।
- गिरफ्तारी की तिथि और समय।
- गिरफ्तारी का स्थान।
- गिरफ्तारी के आधार या कारण — अर्थात्, वह अपराध या परिस्थितियाँ जिनके लिये गिरफ्तारी की जा रही है।
- वे विधिक धाराएँ जिनके अधीन गिरफ्तारी की गई है।
- गिरफ्तार व्यक्ति के हस्ताक्षर/प्रतिहस्ताक्षर।
- कम से कम एक साक्षी द्वारा अनुप्रमाणन - जो या तो गिरफ्तार व्यक्ति का परिवारजन हो अथवा उस क्षेत्र/स्थानीयता का कोई सम्मानित व्यक्ति हो, जहाँ गिरफ्तारी की गई है।
स्रोत: गिरफ्तारी करने वाला पुलिस अधिकारी गिरफ्तारी के समय गिरफ्तारी का ज्ञापन तैयार करेगा; इस ज्ञापन पर कम से कम एक साक्षी के हस्ताक्षर होने चाहिये, जो गिरफ्तार व्यक्ति के परिवार का सदस्य या उस क्षेत्र/ स्थानीयता का कोई सम्मानित व्यक्ति हो सकता है जहाँ से गिरफ्तारी की गई है। इस पर गिरफ्तार व्यक्ति के भी हस्ताक्षर होने चाहिये और इसमें गिरफ्तारी का समय और तारीख अभिलिखित होनी चाहिये।
साक्षी द्वारा अनुप्रमाणन की आवश्यकता
- गिरफ्तारी ज्ञापन पर कम से कम एक साक्षी द्वारा हस्ताक्षर किये जाने चाहिये — निम्नलिखित में से कोई एक:
- गिरफ्तार व्यक्ति का कोई पारिवारिक सदस्य , या
- जिस क्षेत्र/स्थानीयता में गिरफ्तारी हुई है, वहाँ का एक सम्मानित सदस्य।
- गिरफ्तार व्यक्ति को इस बात की जानकारी दी जानी चाहिये कि उसे अपने द्वारा नामित किसी नातेदार या मित्र को गिरफ्तारी की सूचना देने का अधिकार है, जब तक कि ज्ञापन पर परिवार के किसी सदस्य द्वारा पहले से ही हस्ताक्षर न किये गए हों।
- यदि परिवार का कोई सदस्य उपलब्ध नहीं है, तो अधिकारी को गिरफ्तार व्यक्ति को यह सूचित करना होगा कि उसे अपने किसी भी मित्र, नातेदार या अपनी पसंद के किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तारी की सूचना देने का अधिकार है।
- यदि नातेदार या मित्र किसी दूसरे जिले या शहर में है, तो गिरफ्तारी के 8-12 घंटे के भीतर संबंधित पुलिस थाने को टेलीग्राम द्वारा सूचित किया जाना चाहिये और फिर यह जानकारी नातेदार या मित्र तक पहुँचाई जानी चाहिये।