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सांविधानिक विधि

राज्य द्वारा आयोजित मंदिर उत्सवों में जातिगत नामों का स्थायीकरण नहीं किया जा सकता

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 20-Feb-2026

एन. समरन बनाम आयुक्त और अन्य 

"देश में प्रत्येक प्राधिकारी का प्रयास केवल जाति व्यवस्था का उन्मूलन होना चाहियेन कि उसे स्थिर रखना ।" 

न्यायमूर्ति भरत चक्रवर्ती 

स्रोत: मद्रास उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति भरत चक्रवर्ती ने एन समरन बनाम आयुक्त और अन्य (2026)के मामले मेंटिप्पणी की कि हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती (HR&CE) विभाग के माध्यम से राज्य द्वारा आयोजित मंदिर उत्सवों को उत्सव के निमंत्रणों में जाति के नामों का प्रमुखता से विज्ञापन करके जाति को स्थापित रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। 

एन. समरान बनाम कमिश्नर और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • एन. समरन द्वारा दायर याचिका में हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती (HR&CE) के आयुक्तसंयुक्त आयुक्त और अरुलमिगु कंधासामी थिरुकोविल के कार्यकारी अधिकारी को आगामी मंदिर उत्सव के निमंत्रण पत्रों में जातिगत नामों के उपयोग पर रोक लगाने के निदेश देने की मांग की गई थी। 
  • याचिकाकर्त्ता ने इसके अतिरिक्त यह निदेश देने की भी मांग की कि केवल कार्यकारी अधिकारी द्वारा अधिकृत व्यक्तियों को ही "श्री पद्मथांगी" के रूप में जुलूस के दौरान मूर्ति ले जाने की अनुमति दी जाए। 
  • जब इस मामले पर सुनवाई हुईतो राज्य ने न्यायालय को सूचित किया कि मंदिर स्वयं किसी जाति के नाम का उपयोग नहीं कर रहा थालेकिन यह स्वीकार किया कि उत्सव के निमंत्रण पत्र में व्यक्तियों के जातिगत नाम मुद्रित किये गए थे। 
  • राज्य ने यह तर्क दिया कि चूँकि निमंत्रण पत्र पहले ही छप चुके हैंइसलिये वर्तमान महोत्सव वर्ष के लिये कोई और निदेश जारी नहीं किये जा सकते। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने कहा कि जाति केवल लोगों के मन में ही विद्यमान है और जाति की अवधारणा पूरी तरह से जन्म पर आधारित हैजो अकेले ही लोगों को विभाजित करती है। 
  • न्यायमूर्ति चक्रवर्ती ने इस बात पर बल दिया किभारत के संविधान का अनुच्छेद 14 समता के सिद्धांत को स्थापित करता है और भारत के गणतंत्र बनने का मूल उद्देश्य सभी के साथ समान व्यवहार करना था। 
  • न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि यदि कोई ऐसा त्योहार जिसमें सरकारी विभागअर्थात् हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग शामिल हैजाति का प्रचार करने और अपनी जाति का विज्ञापन करने या उस पर गर्व करने के उद्देश्य से आयोजित किया जाता हैतो इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती। 
  • न्यायालय ने निदेश दिया कि आगामी त्योहार से आगेयदि कोई व्यक्ति अपने नाम के साथ अपनी जाति का नाम जोड़ता हैतो केवल जाति का प्रत्यय हटा दिया जाएगा और निमंत्रण पत्र में केवल नाम ही मुद्रित किया जाएगा। 
  • न्यायालय ने मामले को मंदिर के लिये खुला छोड़ने की राज्य की प्रार्थना को खारिज कर दिया और उपरोक्त निदेश जारी किया। 
  • जुलूस के लिये व्यक्तियों की नियुक्ति संबंधी प्रार्थना के संबंध मेंन्यायालय ने कहा कि स्वयंसेवक सामान्यत: मूर्ति को ले जाते हैं और सामान्यत: इसे मौके पर ही सक्षम भक्तों द्वारा संभाला जाता है। 
  • न्यायालय ने मंदिर की शोभायात्राओं के लिये कोई मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार करने से इंकार कर दियायह देखते हुए कि इस तरह के सूक्ष्म प्रबंधन से कई समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं और इसे मंदिर का जमीनी स्तर पर प्रबंधन करने वाले व्यक्तियों पर छोड़ देना चाहिये 

भरता के संविधान का अनुच्छेद 14 क्या है? 

बारे में: 

  • भारत के संविधान, 1950 का अनुच्छेद 14 सभी व्यक्तियों को "विधि के समक्ष समता" और "विधियों के समान संरक्षण" के मौलिक अधिकार की पुष्टि करता है। 
  • पहला वाक्यांश "विधि के समक्ष समता" इंग्लैंड की देन है और दूसरा वाक्यांश "विधियों के समान संरक्षणअमेरिकी संविधान से लिया गया है।  
  • समता भारत के संविधान की उद्देशिका में निहित एक प्रमुख सिद्धांत हैजिसे इसके प्राथमिक उद्देश्य के रूप में वर्णित किया गया है।  
  • यह सभी मनुष्यों के साथ निष्पक्षता और समान व्यवहार करने की एक प्रणाली है। 
  • यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 15 में उल्लिखित आधारों पर विभेदकारी प्रणाली भी स्थापित करता है।   

अवधारणा: 

  • विधि के समक्ष समता की प्रत्याभूतडाइसी द्वारा वर्णित विधि के शासन का एक पहलू है। 
  • रुबिंदर सिंह बनाम भारत संघ (1983)के मामले में यह निर्णय दिया गया थाकि विधि का शासन यह मांग करता है कि किसी भी व्यक्ति को कठोरअसभ्य या विभेदकारी व्यवहार के अधीन नहीं किया जाएगाभले ही इसका उद्देश्य विधि और व्यवस्था की सर्वोपरि आवश्यकताओं को सुनिश्चित करना हो।   
  • अनुच्छेद 14 का उद्देश्य समान परिस्थितियों वाले व्यक्तियों को प्रदत्त विशेषाधिकारों और अधिरोपित किये गए दायित्त्वों दोनों में समान व्यवहार प्रदान करना है। 
  • वर्गीकरण मनमाना नहीं अपितु तर्कसंगत होना चाहिये 
  • इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण (1975)के मामले में यह निर्णय दिया दिया गया थाकि अनुच्छेद 14 में निहित विधि का शासन भारतीय संविधान की मूल विशेषता है और इसलिये इसे भारत के संविधान के अनुच्छेद 368 के अधीन संविधान में संशोधन द्वारा भी नष्ट नहीं किया जा सकता है। 
  • अनुच्छेद 14 के अंतर्गत आने वाला संरक्षण नागरिकों और गैर-नागरिकों दोनों पर लागू होता है। 

परिभाषाएँ 

  • अनुच्छेद 14: विधि के समक्ष समता - "राज्य भारत के क्षेत्र के भीतर किसी भी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा।" 
  • जेनिंग्स - "विधि के समक्ष समता का अर्थ है कि समान लोगों के बीच विधि समान होनी चाहिये और समान रूप से प्रशासित होनी चाहियेकि समान लोगों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिये।" 
  • मुख्य न्यायाधीश पतंजलि शास्त्री नेकहा, “दूसरी अभिव्यक्ति पहली अभिव्यक्ति का परिणाम है और ऐसी स्थिति की कल्पना करना कठिन है जिसमें विधियों के समान संरक्षण का उल्लंघन विधि के समक्ष समता का उल्लंघन न हो। इस प्रकारसार रूप में दोनों अभिव्यक्तियों का अर्थ एक ही है।” 

अपवाद 

  • अनुच्छेद 361क संसद सदस्यों (MP) और राज्य विधान सभा सदस्यों (MLA) को सत्र के दौरान किसी भी न्यायालय के समक्ष उपस्थित न होने का विशेष विशेषाधिकार प्रदान करता है। 
  • अनुच्छेद 105 और 194 विधायकों और सांसदों को उनके भाषणों और विचारों के लिये न्यायालय के समक्ष जवाबदेह होने से रोकते हैं। 
  • अनुच्छेद 361 के अधीन राष्ट्रपति और राज्यपालों को अपने कर्त्तव्यों और शक्तियों के क्रियान्वयन के संबंध में किसी भी न्यायालय के प्रति उत्तरदायी न होने का विशेषाधिकार प्राप्त है। 
  • अनुच्छेद 361 के अधीन उपर्युक्त अधिकारियों को उनके कार्यकाल के दौरान किसी भी प्रकार की गिरफ्तारी से छूट प्राप्त है। 
  • राष्ट्रपति और राज्यों के राज्यपालों के विरुद्ध कोई भी आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया जा सकता है। 
  • राष्ट्रपति और राज्यपालों के विरुद्ध कोई भी सिविल कार्यवाही महीने की पूर्व सूचना के बाद ही शुरू की जा सकती है। 
  • अनुच्छेद 31अनुच्छेद 14 का अपवाद है। यह उपबंध करता है कि अनुच्छेद 39 के खण्ड (ख) या खण्ड (ग) में निहित नीति निदेशक तत्त्वों को लागू करने के लिये  राज्य द्वारा बनाई गई विधि को इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती कि वे अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करते हैं।संजीव कोक मैन्युफैक्चरिंग कंपनी बनाम भारत कुकिंग कोल लिमिटेड (1982)के मामले में यह निर्णय दिया गया था कि, "जहाँ अनुच्छेद 31ग लागू होता हैवहाँ अनुच्छेद 14 लागू नहीं होता"। 
  • विदेशी शासकोंराजदूतों और राजनयिकों को आपराधिक और सिविल कार्यवाही से छूट प्राप्त है। 
  • संयुक्त राष्ट्र संगठन और उसकी अभिकरणों को राजनयिक की प्रतिरक्षा प्राप्त है। 

उचित वर्गीकरण के लिये परीक्षा  

  • अनुच्छेद 14 वर्ग विधान को प्रतिबंधित करता हैतथापियह विशिष्ट प्रयोजनों की प्राप्ति के लिये विधायिका द्वारा व्यक्तियोंवस्तुओं और संव्यवहार के उचित वर्गीकरण को प्रतिबंधित नहीं करता है। 
  • पश्चिम बंगाल राज्य बनाम अनवर अली सरकार (1952)के मामले में दो शर्तें निर्धारित की गईं । 
  • बोधगम्य भिन्नता का अस्तित्व होना आवश्यक हैजहाँ विधि का अनुप्रयोग प्रत्येक मनुष्य पर सार्वभौमिक नहीं होना चाहिये 
  • लागू किये गए भेदभाव राज्य के मूल उद्देश्य के अनुरूप होने चाहिये 

मनमानी का सिद्धांत 

  • निष्पक्षता और मनमानी एक दूसरे के विपरीत हैंदोनों अवधारणाओं को एक ही दायरे में नहीं रखा जा सकता है। 
  • इसलियेन्यायालय ने मनमानी वाले निर्णयों को सूची से बाहर करके उचित वर्गीकरण की सूची में एक विकास लाने का प्रयास किया। 
  • यह सिद्धांत पी. ​​रायप्पा बनाम तमिलनाडु राज्य (1973)के मामले में प्रतिपादित किया गया था, जहाँ पीठ ने समता को एक गतिशील अवधारणा बताया और कहा कि उचित वर्गीकरण के दायरे को मनमानी के उपयोग से परिवर्तित नहीं नहीं जा सकता है। 
  • इस सिद्धांत को बाद में मेनका गांधी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1978) और आर.डी. शेट्टी बनाम इंटरनेशनल एयरपोर्ट अथॉरिटी (1979)के मामलों में लागू किया गया, जिसमें न्यायालयों ने राय दी कि मनमानी का तात्पर्य समता से वंचित करना है।