आज ही हमारे ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स में एडमिशन लें और अपनी तैयारी को और बेहतर बनाएँ | हिंदी माध्यम बैच: 9 मार्च, सुबह 8 बजे   |   आज ही एडमिशन लें बिहार APO (प्रिलिम्स + मेन्स) कोर्स में और अपने सपनों को दे नई दिशा | ऑफलाइन एवं ऑनलाइन मोड में उपलब्ध | 12 जनवरी 2026  से कक्षाएँ आरंभ   |   एडमिशन ओपन: UP APO प्रिलिम्स + मेंस कोर्स 2025, बैच 6th October से   |   ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स (प्रयागराज)   |   अपनी सीट आज ही कन्फर्म करें - UP APO प्रिलिम्स कोर्स 2025, बैच 6th October से










होम / करेंट अफेयर्स

सांविधानिक विधि

आदेशों की अवज्ञा करने पर गैर-पक्षकार भी अवमान ​​के लिये उत्तरदायी होंगे

    «    »
 03-Mar-2026

"यह अब कोई नया मामला नहीं है कि यदि कोई पक्षकार इस न्यायालय के किसी आदेश से अवगत हो जाता है या उसे इसकी जानकारी हो जाती हैफिर भी वह जानबूझकर व्यतिक्रम करता है या जानबूझकर उसका पालन नहीं करता है या संबंधित आदेश का उल्लंघन करता हैतो वह अवमान ​​अधिकारिता के पूर्ण प्रकोप का सामना करने के लिये उत्तरदायी हो जाता है।" 

न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति आर. महादेवन 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ नेइसरार अहमद खान बनाम अमरनाथ प्रसाद और अन्य (2026) के मामलेमें यह निर्णय दिया कि अवमान ​​अधिकारिता मूल निर्णय में नामित पक्षकारों तक ही सीमित नहीं है। 

  • न्यायालय ने निर्णय दिया कि कोई भी व्यक्ति या प्राधिकरण जो न्यायालय के आदेश से अवगत है और जानबूझकर उसकी अवज्ञा में योगदान देता हैउसके विरुद्ध अवमान ​​​​के लिये कार्यवाही की जा सकती है। 
  • छत्तीसगढ़ सरकार के अधिकारियों के संबंध में न्यायालय के 20 मई, 2025 के निर्णय का पालन न करने के आरोप वाली अवमान ​​याचिकाओं की सुनवाई के दौरान ये टिप्पणियां की गईं। 

इसरार अहमद खान बनाम अमरनाथ प्रसाद और अन्य (2026) के मामलेकी पृष्ठभूमि क्या थी ? 

  • इससे पहले उच्चतम न्यायालय ने छत्तीसगढ़ सरकार और छत्तीसगढ़ राज्य लघु वन उपज सहकारी संघ के अधिकारियों को गोदाम रक्षक के एक अतिरिक्त पद के सृजन सहित विशिष्ट कदम उठाने का निदेश दिया था। 
  • इन निदेशों का पालन तीन मास के भीतर किया जाना था। 

तथापि: 

  • अधिकारियों ने निर्धारित समय सीमा के भीतर आदेश को लागू करने में असफल रहे। 
  • अपर मुख्य सचिव सहित वरिष्ठ अधिकारियों को इस निर्णय की जानकारी थी। 
  • अनुपालन में विलंब इस आधार पर हुआ कि राज्य सरकार से मार्गदर्शन की प्रतीक्षा की जा रही थी। 
  • अनुपालन अवधि समाप्त होने के बाद पुनर्विचार याचिका दायर की गई थी और वह दोषपूर्ण थी। 
  • पुनर्विचार याचिका के परिणाम के आधार पर अनुपालन को सशर्त बनाने का प्रयास किया गया था। 
  • अतः जानबूझकर अवज्ञा करने का आरोप लगाते हुए अवमान ​​याचिकाएँ दायर की गईं। 
  • मुख्य विवाद्यक: 
  • क्या अवमान ​​की अधिकारिता उन व्यक्तियों या अधिकारियों तक विस्तारित हो सकती है जिन्हें मूल रूप से कार्यवाही में पक्षकार नहीं बनाया गया थाकिंतु वे आदेश से अवगत थे और उसके कार्यान्वयन में सम्मिलित थे? 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

पर-पक्षकार अवमान का अपराध कर सकते हैं: 

  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अवमान ​​केवल उस व्यक्ति तक सीमित नहीं है जो प्रत्यक्षत आदेश से बाध्य है। 
  • कोई पर-पक्षकार जो जानबूझकर अवज्ञा में सहायता करता है या उसे सक्षम बनाता हैउसे भी दण्डित किया जा सकता हैक्योंकि ऐसा आचरण न्याय प्रशासन में बाधा डालता है। 
  • किसी गैर-पक्षकार की जवाबदेही स्वतंत्र रूप से उत्पन्न होती है  इसलिये नहीं कि उन्होंने तकनीकी रूप से आदेश का उल्लंघन कियाअपितु इसलिये कि उनके कार्यों ने इसके प्रवर्तन में बाधा उत्पन्न की। 

गैर-पक्षकार दायित्त्व के लिये शर्तें: 

यदि कोई गैर-पक्षकार है, तो उसे निम्नलिखित स्थितियों में उत्तरदायी ठहराया जा सकता है: 

  • उस व्यक्ति या प्राधिकरण को न्यायालय के आदेश की जानकारी थी। 
  • उन्होंने जानबूझकर अवज्ञा या गैर-अनुपालन में सहायता की। 
  • उनके आचरण ने आदेश के कार्यान्वयन में बाधा उत्पन्न की या उसे असफल कर दिया। 
  • न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि दायित्त्व का स्रोत न्यायिक अधिकार को कमजोर करने वाला आचरण हैन कि औपचारिक पक्षकार का दर्जा। 

कार्यान्वयन श्रृंखला में अधिकारियों का कर्त्तव्य: 

  • पीठ ने निर्णय दिया कि एक बार जब अधिकारियों को न्यायालय के आदेश की जानकारी हो जाती हैतो वे अनुपालन सुनिश्चित करने के लिये कर्तव्यबद्ध होते हैं। 
  • कार्यान्वयन श्रृंखला का भाग बनने वाला कोई प्राधिकरण यह दावा करके उत्तरदायित्त्व से बच नहीं सकता कि उसे मूल रूप से मामले में पक्षकार नहीं बनाया गया था। 
  • यदि अनुपालन के लिये उच्च अधिकारियों द्वारा कार्रवाई की आवश्यकता थी या यह उनकी क्षमता से परे थातो उन्हें स्पष्टीकरण या निदेशों के लिये न्यायालय से संपर्क करना चाहिये था। 
  • ऐसा न करने को अवमान ​​की कार्यवाही में प्रतिरक्षा के रूप में प्रयोग नहीं किया जा सकता है। 

अवमान की अधिकारिता का विस्तार: 

  • न्यायालय ने दोहराया कि अवमान ​​अधिकारिता का प्रयोग करते समयन्यायालय केवल यह परीक्षा करता है कि मूल आदेश का अनुपालन किया गया है या नहीं। 

इससे संबंधित विवाद्यक: 

  • मूल निर्णय की शुद्धता 
  • अनुपालन की व्यवहार्यता 
  • प्रशासनिक कठिनाइयाँ 
  • निदेश की वैधता 

अवमान ​​की कार्यवाही में यह मुद्दा नहीं उठाया जा सकता। 

  • यदि किसी पक्षकार को कोई आदेश अव्यवहारिक या त्रुटिपूर्ण लगता हैतो उचित उपचार स्पष्टीकरणसंशोधन की मांग करना या परिसीमा के भीतर अपील दायर करना है। 

तथ्यों पर आधारित निष्कर्ष: 

न्यायालय ने पाया कि: 

  • राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों को 20 मई, 2025 के निर्णय की जानकारी थी। 
  • वे समय पर अनुपालन सुनिश्चित करने में असफल रहे। 
  • विलंब का कोई औचित्य नहीं था। 
  • अनुपालन अवधि के बाद दोषपूर्ण पुनर्विचार याचिका दाखिल करने से गैर-अनुपालन को क्षमा नहीं किया जा सकता। 
  • न्यायालय ने माना कि अवमान ​​का प्रथम दृष्टया मामला बनता हैजिसमें वे अधिकारी भी सम्मिलित हैं जो मूल रूप से पक्षकार नहीं थे किंतु आदेश से अवगत थे और इसके कार्यान्वयन में सम्मिलित थे। 
  • अनुपालन करने के लिये अंतिम अवसर दिया गया थाऐसा न करने पर आरोप विरचित किये जाएंगे। 

न्यायालय का अवमान क्या है और इससे संबंधित विधिक उपबंध क्या हैं? 

बारे में: 

  • संविधानअनुच्छेद 129 और 215 के माध्यम सेउच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों कोअवमान ​​के लिये दण्डित करने का अधिकार प्रदान करता हैजिसकी परिचालन प्रक्रियाएँ न्यायालयों अवमान ​​अधिनियम, 1971 (1971 का अधिनियम) में उल्लिखित हैं। 

न्यायालय का अवमान: 

  • न्यायालय की अवमान ​​एकविधिक अवधारणाहै जिसका उद्देश्य न्यायिक प्रणाली की गरिमा और अधिकार की रक्षा करना है। 
  • भारत में, न्यायालय की अवमान ​​से संबंधित मामले 1971 के अधिनियम के अधीन निपटाए जाते हैंजो अवमानपूर्ण कार्यों को परिभाषित करता है और उनके लिये दण्ड विहित करता है। 
  • इसका प्राथमिक उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया कीपवित्रता को बनाए रखनाहै यह सुनिश्चित करना कि न्यायपालिका के अधिकार का सम्मान और उसे बरकरार रखा जाए।  
  • तथापिअवमान ​​विधियों के निर्वचन और उनका प्रयोग अक्सर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर संभावित उल्लंघन के बारे में चिंताएँ उत्पन्न करता हैजिससे एक नाजुक संतुलन बना रहता है जिसे बनाए रखना आवश्यक है। 

न्यायालय के अवमान ​​के प्रकार: 

  • भारत में न्यायालय के अवमान ​​को सामान्यत: दो प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता हैसिविल अवमान ​​और आपराधिक अवमान। 
  • 1971 के अधिनियम की धारा 2()के अधीनकिसी न्यायालय के किसी निर्णयडिक्रीनिदेशआदेशरिट या अन्य आदेशिका की जानबूझकर अवज्ञा करना अथवा न्यायालय से किये गए किसी वचनबंध को जानबूझकर भंग करनाअभिप्रेत हैजबकि आपराधिक अवमान ​​में ऐसे कार्य शामिल होते हैं जो किसी न्यायालय के अधिकार को कलंकित करते हैं या कलंकित करने की प्रवृत्ति रखते हैंया कम करते हैं या कम करने की प्रवृत्ति रखते हैं। 
  • 1971 के अधिनियम की धारा 2()के अंतर्गत “आपराधिक अवमान”से किसी भी ऐसी बात का चाहे बोले गए या लिखे गए शब्दों द्वाराया संकेतों द्वाराया रूपणों द्वाराया अन्यथा प्रकाशन अथवा किसी भी अन्य ऐसे कार्य का करना अभिप्रेत है 

(i) जो किसी न्यायालय को कलंकित करता है या जिसकी प्रवृत्ति उसे कलंकित करने की है अथवा जो उसके प्राधिकार को अवनत करता है या जिसकी प्रवृत्ति उसे अवनत करने की हैअथवा 

(ii) जो किसी न्यायिक कार्यवाही के सम्यक् अनुक्रम पर प्रतिकूल प्रभाव डालता हैया उसमें हस्तक्षेप करता है या जिसकी प्रवृत्ति उसमें हस्तक्षेप करने की हैअथवा 

(iii) जो न्याय प्रशासन में किसी अन्य रीति से हस्तक्षेप करता है या जिसकी प्रवृत्ति उसमें हस्तक्षेप करने की है अथवा जो उसमें बाधा डालता है या जिसकी प्रवृत्ति उसमें बाधा डालने की है। 

न्यायालय अवमान ​​अधिनियम, 1971 के अंतर्गत उपलब्ध प्रतिरक्षा: 

  • निर्दोष प्रकाशन:धारा के अधीन यदि प्रकाशन करने वाले व्यक्तियों के पास प्रकाशन के समय यह मानने का कोई उचित आधार नहीं था कि कार्यवाही लंबित थीतो प्रकाशन को "निर्दोष" कहा जाता है। 
  • न्यायिक कार्यवाही की निष्पक्ष और सही रिपोर्ट:धारा 4 के अधीन कोई व्यक्ति न्यायिक कार्यवाही या उसके किसी भी प्रक्रम की निष्पक्ष और सही रिपोर्ट प्रकाशित करने के लिये न्यायालय अवमान ​​का दोषी नहीं होगा। 
  • निष्पक्ष आलोचना:धारा के अधीन भारतीय नागरिक को यह विशेषाधिकार प्राप्त अधिकार है कि वह जो सत्य मानता है उस पर विश्वास करे और अपने मन की बात खुलकर कहे। 
  • पीठासीन अधिकारी के विरुद्ध परिवाद:धारा 6 के अधीन कोई व्यक्ति किसी अधीनस्थ न्यायालय के पीठासीन अधिकारी के संबंध में सद्भावनापूर्वक दिये गए किसी भी कथन के लिये न्यायालय अवमान ​​का दोषी नहीं होगा। 
  • सत्य को प्रतिरक्षा के रूप में:धारा 13 न्यायालय को किसी भी अवमान ​​कार्यवाही में सत्य द्वारा औचित्य को वैध प्रतिरक्षा के रूप में अनुमति देने में सक्षम बनाती है यदि यह लोक हित में हो या सद्भावनापूर्ण हो। 
  • क्षमा याचना:धारा 12(1)के परंतुक मेंकहा गया है कि न्यायालय की संतुष्टि के अनुसार क्षमा याचना किये जाने पर अभियुक्त को उन्मुक्त किया जा सकता है या दी दिये गए दण्ड को क्षमा किया जा सकता है।