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आपराधिक कानून
किसी लड़की को आत्महत्या की धमकी देना व्यपहरण माना जाता है
«02-Mar-2026
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"अपीलार्थी ने आत्महत्या करने की धमकी देकर पीड़िता को भावनात्मक दबाव एवं प्रपीड़न के अधीन रखा, जिससे उसकी मानसिक स्थिति प्रभावित हुई और उक्त मानसिक दबाव उसके मन पर इस प्रकार प्रभावी रहा कि उसने घर छोड़ने का निर्णय लिया।" न्यायमूर्ति श्रीराम शिरसात |
स्रोत: बॉम्बे उच्च न्यायालय (गोवा बेंच)
चर्चा में क्यों?
बॉम्बे उच्च न्यायालय की गोवा खंडपीठ के न्यायमूर्ति श्रीराम शिरसात ने शोभित कुमार बनाम स्टेट (2026) के मामले में निर्णय दिया कि किसी अवयस्क लड़की के साथ न जाने पर आत्महत्या करने की धमकी देना भारतीय दण्ड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 363 के अधीन "प्रलोभन" माना जाता है।
- न्यायालय ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 363 (व्यपहरण), धारा 376 (बलात्संग) और और लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के संबंधित प्रावधानों के अधीन उनकी दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए, फास्ट ट्रैक कोर्ट द्वारा दिये गए 10 वर्ष के कारावास के दण्ड की पुष्टि की।
शोभित कुमार बनाम राज्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- पीड़िता गोवा के पणजी में रहने वाली 16 वर्षीय लड़की थी।
- 32 वर्षीय अभियुक्त ने उसे 11 दिसंबर, 2021 को पणजी बस स्टैंड पर मिलने के लिये कहा था।
- उसने धमकी दी कि यदि वह नहीं आई तो वह आत्महत्या कर लेगा।
- पीड़िता को भय था कि वह स्वयं को नुकसान पहुँचा सकता है, इसलिये उसने अपने संरक्षक की जानकारी या सम्मति के बिना अपना घर छोड़ दिया।
- तत्पश्चात् अभियुक्त उसे अहमदाबाद ले गया, जहाँ उसके लिये एक किराए का कमरा बुक किया गया था।
- 3 जनवरी, 2022 को पीड़िता ने अपनी माता को फोन किया और बताया कि अभियुक्त ने कई बार उसके साथ मैथुन किया और वह घर लौटना चाहती है।
- पुलिस ने अभियुक्त को गिरफ्तार कर लिया और एक फास्ट ट्रैक कोर्ट ने उसे जुर्माने सहित 10 वर्ष के कारावास का दण्ड दिया।
- अभियुक्त ने बॉम्बे उच्च न्यायालय में अपनी दोषसिद्धि को चुनौती दी।
- मुख्य विवाद्यक:
- क्या किसी अवयस्क लड़की को आत्महत्या की धमकी देकर उसे उसके संरक्षक की अभिरक्षा छोड़ने के लिये विवश करना भारतीय दण्ड संहिता की धारा 363 के अधीन "प्रलोभन" माना जाता है, जिससे व्यपहरण के अपराध का गठन होता है?
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
प्रलोभन के रूप में आत्महत्या की धमकी:
- न्यायमूर्ति शिरसात ने माना कि अभियुक्त द्वारा पीड़िता को अपने साथ न ले जाने पर आत्महत्या करने की धमकी देना जानबूझकर उकसाने और बहकाने का कृत्य था। पीड़िता अपनी मर्जी से घर से नहीं निकली, अपितु अभियुक्त द्वारा उसके मन में उत्पन्न किये गए प्रपीड़न के कारण निकली थी।
- न्यायालय ने टिप्पणी की कि अभियोजन पक्ष के लिये यह साबित करना आवश्यक नहीं था कि अभियुक्त ने पीड़िता को जबरदस्ती हटाया था - यह साबित करना ही पर्याप्त था कि उस पर डाले गए प्रभाव के कारण उसे जाने के लिये विवश किया गया था।
व्यपहरण के लिये पर्याप्त भावनात्मक दबाव:
- न्यायालय ने माना कि प्रलोभन देने के लिये शारीरिक बल का प्रयोग आवश्यक नहीं है। भावनात्मक छलयोजना—जिसमें भय उत्पन्न करने या कार्रवाई के लिये विवश करने वाली धमकियाँ सम्मिलित हैं—धारा 363 भारतीय दण्ड संहिता के अधीन प्रलोभन साबित करने के लिये पर्याप्त है।
पीड़ित का परिसाक्ष्य विश्वसनीय पाया गया:
- न्यायमूर्ति शिरसात ने पीड़िता के परिसाक्ष्य को विश्वसनीय और भरोसेमंद पाया। उसके कथन से स्पष्ट रूप से यह साबित हुआ कि उसने अपनी माता की अभिरक्षा केवल इसलिये छोड़ी थी क्योंकि उसे भय था कि अभियुक्त स्वयं को नुकसान कारित कर सकता है।
दोषसिद्धि बरकरार:
- न्यायालय ने निर्णय दिया कि अभियोजन पक्ष ने अपने मामले को संदेह से परे साबित कर दिया है और भारतीय दण्ड संहिता की धारा 363, भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 और लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के अधीन दोषसिद्धि को बरकरार रखा है।
भारतीय न्याय संहिता, 2023 के अंतर्गत व्यपहरण क्या है?
बारे में:
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 137 अपहरण के अपराध से संबंधित है। इसमें कहा गया है कि-
(1) व्यपहरण दो किस्म का होता है: भारत में से व्यपहरण और विधिपूर्ण संरक्षकता में से व्यपहरण––
(क) जो कोई किसी व्यक्ति का उस व्यक्ति की, या उस व्यक्ति की ओर से सम्मति देने के लिये वैध रूप से प्राधिकृत किसी व्यक्ति की सम्मति के बिना, भारत की सीमाओं से परे प्रवहण कर देता है, वह भारत में से उस व्यक्ति का व्यपहरण करता है, यह कहा जाता है।
(ख) जो कोई किसी बालक को या किसी विकृत चित्त व्यक्ति को, ऐसे बालक या विकृत चित्त व्यक्ति के विधिपूर्ण संरक्षक की संरक्षकता में से ऐसे संरक्षक की सम्मति के बिना ले जाता है या बहका ले जाता है, वह ऐसे बालक या ऐसे व्यक्ति का विधिपूर्ण संरक्षकता में से व्यपहरण करता है, यह कहा जाता है।
स्पष्टीकरण - इस खण्ड में "विधिपूर्ण सरंक्षक शब्दों के अंतर्गत ऐसा व्यक्ति आता है, जिस पर ऐसे बालक या अन्य व्यक्ति की देखरेख या अभिरक्षा का भार विधिपूर्वक न्यस्त किया गया है।
अपवाद — इस खण्ड का विस्तार किसी ऐसे व्यक्ति के कार्य पर नहीं है, जिसे सद्भावपूर्वक यह विश्वास है कि वह किसी अधर्मज बालक का पिता है, या जिसे सद्भावपूर्वक यह विश्वास है कि वह ऐसे बालक की विधिपूर्ण अभिरक्षा का हकदार है, जब तक कि ऐसा कार्य दुराचारिक या विधिविरुद्ध प्रयोजन के लिये न किया जाए।
(2) जो कोई भारत में से या विधिपूर्ण संरक्षकता में से किसी व्यक्ति का व्यपहरण करेगा, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा।
भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 64 क्या है?
- भारतीय न्याय संहिता की धारा 64 बलात्संग के लिये दण्ड का उपबंध करती है।
- इससे पूर्व इस मामले को भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 376 के अधीन निपटाया जाता था।
- धारा 64(1) बलात्संग के लिये साधारण दण्ड के रूप में कम से कम दस वर्ष के कठोर कारावास की अवधि निर्धारित करती है, जिसे जुर्माने के साथ आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है।
- धारा 64(2) बलात्संग के उग्र या गुरुतर रूपों के लिये अधिक गंभीर दण्ड का उपबंध करती है।
- धारा 64(2)(ज) विशेष रूप से ऐसी स्थिति से संबंधित है जहाँ कोई व्यक्ति "किसी महिला से यह जानते हुए कि वह गर्भवती है, बलात्संग करेगा।"
- धारा 64(2)(ज) के अधीन अपराधों के लिये विहित दण्ड कम से कम दस वर्ष का कठोर कारावास है, जिसे आजीवन कारावास (अर्थात् व्यक्ति के शेष प्राकृत जीवनकाल) तक बढ़ाया जा सकता है, साथ ही जुर्माना का भी दायी होगा।
- यह उपबंध गर्भवती महिला के साथ बलात्संग को लैंगिक उत्पीड़न का एक गुरुतर रूप है, जो गर्भवती पीड़ितों की अतिरिक्त भेद्यता और महिला और उसके अजन्मे बच्चे दोनों को होने वाले संभावित नुकसान को मान्यता देता है।
- धारा 64(2)(ज) धारा 64(2) में सूचीबद्ध कई परिस्थितियों में से एक है जहाँ विधि अपराध को विशेष रूप से जघन्य प्रकृति के कारण अधिक गंभीर दण्ड अधिरोपित करती है।
- यह धारा इस बात को स्वीकार करती है कि पीड़िता के गर्भवती होने की जानकारी के साथ बलात्संग करना गंभीर अपराध है जिसके लिये कठोर दण्ड दिया जाना चाहिये।
- इस अपराध का वर्गीकरण धारा 64(1) के बजाय धारा 64(2) के अधीन करना विधायिका के ऐसे मामलों से अधिक गंभीरता से निपटने के आशय को दर्शाता है।