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सांविधानिक विधि
व-इन संबंध में रहने वाले दंपत्ति को माता-पिता की धमकियों से पुलिस संरक्षण का अधिकार है
« »05-Mar-2026
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"लिव-इन संबंध में रहने वाले दो वयस्क व्यक्तियों को परिवार के सदस्यों से धमकियों और हस्तक्षेप के विरुद्ध पुलिस संरक्षण का अधिकार है, यह दोहराते हुए कि जीवनसाथी चुनने का अधिकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 से प्राप्त होता है।" न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी |
स्रोत: दिल्ली उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी ने कार्तिक एवं अन्य बनाम दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र राज्य एवं अन्य (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि लिव-इन संबंध में साथ रहने वाले दो सहमति देने वाले वयस्क, माता-पिता सहित परिवार के सदस्यों की धमकियों और हस्तक्षेप के विरुद्ध पुलिस संरक्षण के हकदार हैं।
- न्यायालय ने इस बात की पुनः पुष्टि की कि अपने जीवनसाथी को स्वतंत्र रूप से चुनने का अधिकार भारत के संविधान, 1950 (COI) के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत गारंटीकृत एक मौलिक अधिकार है।
कार्तिक एवं अन्य बनाम दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र राज्य एवं अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- याचिकाकर्त्ता, जिनका जन्म क्रमशः 2006 और 2007 में हुआ था, सहमति से साथ रहने वाले वयस्क थे और 2024 से एक रिश्ते में थे और याचिका के समय एक साथ रह रहे थे।
- दंपति ने 17 फरवरी, 2026 को एक लिव-इन रिलेशनशिप करार पर हस्ताक्षर किये थे।
- याचिकाकर्त्ता संख्या 2 (महिला) के पिता कथित तौर पर इस रिश्ते से नाखुश थे और धमकियाँ दे रहे थे, जिससे दोनों याचिकाकर्त्ताओं के जीवन और स्वतंत्रता को खतरा था।
- दंपति ने पुलिस संरक्षण की मांग करते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर की।
- मुख्य विवाद्यक :
- क्या लिव-इन संबंध में रहने वाले दो सहमति देने वाले वयस्क परिवार के सदस्यों से धमकियों और हस्तक्षेप के विरुद्ध पुलिस संरक्षण के हकदार हैं, और क्या ऐसा संबंध भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के अधीन संरक्षित है।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
सांविधानिक दृष्टि से लिव-इन रिलेशनशिप विवाह के समान है:
- न्यायमूर्ति बनर्जी ने टिप्पणी की कि यद्यपि लिव-इन रिलेशनशिप विधिक रूप से विवाह के समकक्ष नहीं है, किंतु इसमें एक मूलभूत समानता है - यह जाति, पंथ, रंग, धर्म या आस्था की परवाह किये बिना, दो सहमति देने वाले व्यक्तियों के बीच का मिलन है।
- न्यायालय ने माना कि संविधान अनुच्छेद 19 के अधीन स्वतंत्रता के अधिकार और अनुच्छेद 21 के अधीन प्राण और स्वतंत्रता के अधिकार को प्रत्याभूत करता है, ये दोनों ही ऐसे संबंधों की रक्षा करते हैं।
हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं:
- न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि किसी भी व्यक्ति को - जिसमें माता-पिता, नातेदार या मित्र सम्मिलित हैं - को सहमति से लिव-इन संवंध में रहने वाले दंपत्ति के लिये बाधा उत्पन्न करने, हस्तक्षेप करने या धमकी देने का कोई अधिकार या प्राधिकार नहीं है।
- इस तथ्य को कि दंपति ने स्वेच्छया से लिव-इन रिलेशनशिप करार पर हस्ताक्षर किये थे, उनके आशय और उत्तरदायित्त्व के एक और पुष्टि के रूप में नोट किया गया था।
जीवनसाथी चुनने का अधिकार:
- न्यायमूर्ति बनर्जी ने इस बात की पुष्टि की कि दोनों याचिकाकर्त्ता, वयस्क और सहमति देने वाले वयस्क होने के नाते, अपने जीवनसाथी को चुनने और किसी भी तरह के हस्तक्षेप के बिना एक साथ रहने का पूर्ण अधिकार रखते हैं।
पुलिस संरक्षण प्रदान किया गया:
- न्यायालय ने याचिका मंजूर कर ली और निदेश दिया कि याचिकाकर्त्ता संबंधित SHO या बीट कांस्टेबल से संपर्क करने के लिये स्वतंत्र होंगे, जो विधि के अनुसार आवश्यक सहायता प्रदान करेंगे।
- यह भी स्पष्ट किया गया कि यदि दंपति किसी अन्य अधिकारिता में अपना निवास स्थान बदलते हैं, तो उन्हें तीन दिनों के भीतर संबंधित SHO को सूचित करना होगा, और सुरक्षा जारी रहेगी।
भारत में लिव-इन रिलेशनशिप की अवधारणा क्या है?
परिभाषा एवं पृष्ठभूमि:
- लिव-इन रिलेशनशिप का अर्थ बिना औपचारिक विवाह रजिस्ट्रीकरण के साथ रहना है।
- पश्चिमी देशों के विपरीत, भारत में इस तरह की भागीदारियों के लिये दीर्घकालिक विधिक प्रावधानों का अभाव है।
- भारतीय न्यायपालिका ने बदलते सामाजिक मानदंडों के अनुरूप विधिक ढाँचे को अनुकूलित किया है।
विधिक मान्यता:
- भारतीय विधि में इसकी कोई स्पष्ट सांविधिक परिभाषा या विनियमन विद्यमान नहीं है।
- खुशबू बनाम कनियाम्मल (2010) – उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि लिव-इन रिलेशनशिप अनुच्छेद 21 के अधीन जीवन के अधिकार का भाग हैं और इन्हें अवैध नहीं माना जा सकता है।
- वेलुसामी बनाम डी. पचैअम्मल (2010) – उच्चतम न्यायालय ने "विवाह के समान संबंध" की अवधारणा को चार शर्तों के साथ पेश किया: एक महत्त्वपूर्ण अवधि के लिये सहवास, एकविवाह, दोनों भागीदारों की विधिक रूप से विवाह योग्य आयु और विवाह के समान सहमतिपूर्ण आचरण।
भरणपोषण का अधिकार:
- लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाएँ घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 और धारा 125 दण्ड प्रक्रिया संहिता (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144) के अधीन भरणपोषण का दावा कर सकती हैं।
- पात्रता इस बात पर निर्भर करती है कि क्या संबंध विवाह जैसे मानदंडों को पूरा करता है।
संपत्ति का अधिकार:
- साथ रहने वाले भागीदारों को स्वतः उत्तराधिकार का अधिकार नहीं मिलता।
- यदि किसी भागीदार ने संपत्ति के अधिग्रहण में स्पष्ट रूप से योगदान दिया हो, तो वह संबंध के दौरान अर्जित संपत्ति पर अधिकार प्राप्त कर सकता है।
बच्चों का अधिकार:
- लिव-इन रिलेशनशिप से पैदा हुई संतान वैधता और उत्तराधिकार के अधिकारों के हकदार होते हैं।
- तुलसा बनाम दुर्घाटिया (2008) - यदि माता-पिता काफी समय तक एक ही छत के नीचे सहवास करते हैं तो बच्चों को अधर्मज नहीं माना जा सकता है।
घरेलू हिंसा से संरक्षण:
- घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं को संरक्षण प्रदान करता है।
- हकदार अधिकारों में सम्मिलित हैं: साझी गृहस्थी में रहने का अधिकार, संरक्षण आदेश प्राप्त करने का अधिकार और हुई क्षति के लिये प्रतिकर का दावा करने का अधिकार।