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सिविल कानून

निविदा में सशर्त स्वीकृति से संपन्न संविदा का निर्माण नहीं होता

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 09-Mar-2026

मसीबुल हसन बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य 

"भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 के अधीन निविदा की स्वीकृति आत्यंकित और बिना शर्तहोनी चाहियेऔर जहाँ स्वीकृति सशर्त हैवहाँ संविदा तब तक अधूरी रहती है जब तक कि निर्धारित शर्तें पूरी नहीं हो जातीं।" 

न्यायमूर्ति कौसिक चंदा 

स्रोत: कलकत्ता उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति कौसिक चंदा ने मसीबुल हसन बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य (2026)के मामले में, मुर्शिदाबाद जिला परिषदद्वारा बलिया श्यामपुर फेरी घाट के निपटान के लियेजारी किये गए एक नए ई-नीलामी नोटिस को चुनौती देने वाली एक रिट याचिका को खारिज कर दिया । 

  • न्यायालय ने माना किकोई भी अंतिम संविदा अस्तित्व में नहीं आईक्योंकि सफल बोलीदाता अनिवार्य निविदा शर्त का पालन करने में असफल रहाजिसमें बैंक प्रत्याभूति प्रस्तुत करना आवश्यक था। न्यायालय ने आगे स्पष्ट किया कि शर्तों के अनुपालन के लिये समय विस्तार कोप्राधिकरण द्वाराअधित्यजन के रूप में नहीं माना जा सकता । 

मसीबुल हसन बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • याचिकाकर्त्ता ने 6 जनवरी, 2026 की ई-नीलामी सूचना कोचुनौती देते हुए तर्क दिया कि उसने अक्टूबर, 2024 को आयोजित पूर्ववर्ती नीलामी प्रक्रिया के अनुसार 19 दिसंबर, 2024 से 18 दिसंबर, 2027 तक तीन वर्ष के लिये फेरी घाट का समझौता पहले ही हासिल कर लिया था । 
  • याचिकाकर्त्ता नेपहले वर्ष के लिये 26.74 लाख रुपए कीबोली लगाकरउच्चतम बोलीदाता के रूप में उभर कर अपनी पहचान बनाई थी। 
  • 18 नवंबर, 2024 को जारी स्वीकृति पत्र केमाध्यम सेजिला परिषद ने कुछ शर्तों के अधीन उनकी बोली स्वीकार कर लीजिनमें पहले वर्ष के पट्टे के किराए का जमा करनाएक औपचारिक करार पर हस्ताक्षर करना औरतीसरे वर्ष के पट्टे के किराए के अनुरूप 32.36 लाख रुपए की बैंक प्रत्याभूति प्रस्तुत करना सम्मिलित है। 
  • याचिकाकर्त्ता ने पहले वर्ष का किराया तो जमा कर दियालेकिन वहबैंक प्रत्याभूति देने में असफल रहाऔर उसने बार-बार समय बढ़ाने की मांग की।  
  • अंततः प्राधिकरण नेकार्यकाल को घटाकर एक वर्ष कर दियाजो 18 दिसंबर, 2025 को समाप्त हो गयाजिसके बाद 31 जनवरी, 2026 तक नौका सेवाओं को बनाए रखने के लिये एक अस्थायी विस्तार प्रदान किया गया। 
  • तत्पश्चात्, विवादित नई नीलामी सूचनाजारी की गईजिसके कारण याचिकाकर्त्ता ने कलकत्ता उच्च न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने माना कि बैंक प्रत्याभूति प्रस्तुत करने की आवश्यकता निविदा शर्तों में निहित एकअनिवार्य वित्तीय सुरक्षा उपायथीऔर चूँकि याचिकाकर्त्ता विस्तारित समय सीमा के भीतर भी इसका अनुपालन करने में असफल रहाइसलिये कथिततीन वर्ष की संविदा कभी भी साकार नहीं हुई 
  • न्यायालय ने कहा कि भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 के अधीननिविदा की स्वीकृति "आत्यंकित और बिना शर्त" होनी चाहियेऔर जहाँ स्वीकृति सशर्त हैवहाँ संविदातब तक अधूरी रहता है जब तक कि निर्धारित शर्तें पूरी नहीं हो जातीं। 
  • न्यायमूर्ति चंदा नेयाचिकाकर्त्ता के इस तर्क को खारिज कर दियाकि जिला परिषद ने समय सीमा बढ़ाकर बैंक प्रत्याभूति की आवश्यकता को क्षमा कर दिया थाऔर कहा कि किसी लोक प्राधिकरण द्वारा अधित्यजनस्पष्ट और साशयहोना चाहियेऔर केवल समय बढ़ाने से लोक राजस्व की रक्षा के लिये बनाए गए संविदात्मक सुरक्षा उपाय का परित्याग नहीं हो सकता है। 
  • न्यायालय ने आगे यह भी कहा कि याचिकाकर्त्ता द्वाराबार-बार समय बढ़ाने की मांग करनाही इस बात का प्रमाण है कि वह बैंक प्रत्याभूति प्रस्तुत करने के अपने दायित्त्व को स्वीकार करता है। 
  • संविधान के अनुच्छेद 226 के अधीन न्यायिक पुनर्विलोकन की सीमाओंपर बल देते हुएन्यायालय ने दोहराया कि सरकारी निकायों से जुड़े संविदात्मक मामलों में लिये गए निर्णयों में सामान्यत: तब तक हस्तक्षेप नहीं किया जाता है जब तक कि यहमनमानादुर्भावनापूर्ण या सांविधिक प्रावधानों का उल्लंघन साबित न हो जाए। 
  • जिला परिषद के निर्णय में ऐसी कोई अवैधता न पाते हुएन्यायालय नेरिट याचिका खारिज कर दीनई नीलामी प्रक्रिया को बरकरार रखा और इस मामले में पूर्ववर्ती दिये गए अंतरिम आदेश को रद्द कर दिया। 

भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 के अंतर्गत निविदा क्या होती है? 

बारे में: 

  • विधिक संदर्भ में, "निविदा" सेतात्पर्य किसी संविदात्मक दायित्त्व को पूरा करने के प्रस्ताव से है। 
  • एक सामान्य खरीद निविदानियोक्ता द्वाराविक्रेताओं को निर्दिष्ट शर्तों के अधीन निर्दिष्ट कार्य को पूरा करने के लिये प्रतिस्पर्धी बोलियां प्रस्तुत करने का औपचारिक निमंत्रण है। 
  • भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 (ICA) के अनुसारनिविदा को सामान्यत: विधिक प्रस्ताव के बजाय एकआमंत्रण माना जाता है। 
  • निविदा प्रक्रिया में भाग लेना औरबोली प्रस्तुत करनाविधिक अर्थों मेंएक "प्रस्ताव" कहलाता है। 
  • निविदा या प्रस्तावस्वीकारहो जाने के बादकुछ औपचारिकताओं की पूर्ति के अधीन एक संविदा बन जाता है। 

निविदा का पालन: 

  • संविदा अधिनियम की धारा 38निविदा के निष्पादन से संबंधित हैअर्थात्कोई पक्षकार विधिक रूप से अपने वचन को पूरा करने की पेशकश कब और कैसे कर सकता है। 
  • यह प्राप्ति के संदर्भ में "निविदा" से अलग है और विशेष रूप से किसी पक्षकार द्वारा अपने संविदात्मक दायित्त्व को पूरा करने के प्रस्ताव को संदर्भित करता है। 

वैध निविदा पालन के लिये आवश्यक तत्त्व: 

  • बिना शर्त प्रस्ताव:निविदा बिना किसी शर्त के प्रस्तुत की जानी चाहिये। उदाहरण के लियेकोई आपूर्तिकर्त्ता माल की आपूर्ति केवल तभी करने की पेशकश नहीं कर सकता जब क्रेता अतिरिक्त भाड़ा चुकाएक्योंकि इससे निविदा अमान्य हो जाती है। 
  • उचित समय और स्थान:पालन की प्रस्थापना संविदा में विनिर्दिष्ट समय और स्थान पर ही की जानी चाहिये। यदि कोई समय विनिर्दिष्ट नहीं हैतो इसे युक्तियुक्त समय सीमा के भीतर किया जाना चाहिये 
  • उचित व्यक्ति:निविदा/निष्पादन का प्रस्ताव वचनगृहीता या उस व्यक्ति को किया जाना चाहिये जिसे इसे प्राप्त करने के लिये विधिवत् अधिकृत किया गया हो। किसी अनाधिकृत पर-पक्षकार को पालन की पेशकश करने से यह विधिक रूप से अप्रभावी हो जाता है। 
  • पूर्ण पालन:पालन पूर्ण और संविदा की शर्तों के अनुरूप होना चाहिये। आंशिक या दोषपूर्ण पालन वैध निविदा नहीं माना जाएगा। उदाहरण के लियेसंविदा के अंतर्गत निर्धारित वस्तुओं में से केवल कुछ वस्तुओं की आपूर्ति करना वैध निविदा नहीं है 
  • पालन की क्षमता एवं तत्परता:वचन देने वाले व्यक्ति को संपूर्ण दायित्त्व निभाने के लिये तैयार और इच्छुक होना चाहियेऔर उनके आचरण से दायित्त्व को पूरा करने का वास्तविक आशय प्रदर्शित होना चाहिये 

वैध निविदा के पालन के विधिक निहितार्थ: 

  • यदि वचनदाता वैध पेशकश करता है और वचनगृहीता उसे स्वीकार करने से इंकार कर देता हैतो वचनदाता गैर-पालन के लिये दायित्त्व से मुक्त हो जाता है। 
  • माल के विक्रय जैसे संदाय संबंधी संविदाओं मेंवैध संदाय को स्वीकार करने से इंकार करने पर वचनदाता के विरुद्ध संविदा उल्लंघन का दावा वर्जित हो सकता है। 
  • भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 38 के अधीनयदि वचनदाता ने पालन का वैध प्रस्ताव दिया है और वचनगृहीता इसे स्वीकार करने से इंकार करता हैतो वचनदाता गैर-पालन के लिये उत्तरदायी नहीं है और संदाय के अधिकार या दायित्त्व से बचने के अधिकार जैसे अपने विधिक अधिकारों को बरकरार रखता है। 

दृष्टांतदर्शक उदाहरण: 

  • 'A' एक निश्चित दिन पर 'B' को सामान पहुँचाने की संविदा करता है। 'A' उस दिन सामान लेकर 'B' के परिसर में पहुँचता है और सामान देने की पेशकश करता हैकिंतु 'B' बिना किसी वैध कारण के सामान लेने से इंकार कर देता है। 
  • ऐसे मामले में, 'A' संविदा के उल्लंघन के लिये उत्तरदायी नहीं हैक्योंकि पालन का एक वैध प्रस्ताव विधिवत रूप से किया गया था और वचनगृहीता द्वारा इसे सदोष रूप से अस्वीकार कर दिया गया था।