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सिविल कानून

डिक्री निर्णय के अनुरूप होनी चाहिये

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 15-Jan-2026

महेंद्र प्रसाद तिवारी बनाम श्रीमती. चिंटी यादव एवं अन्य 

"अंतिम रूप से हस्ताक्षर किये जाने से पहले विचारण न्यायालय का यह दायित्त्व था कि वह डिक्री में हुई त्रुटि को सुधार ले।" 

न्यायमूर्ति विवेक जैन 

स्रोत: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

जबलपुर स्थित मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति विवेक जैन नेमहेंद्र प्रसाद तिवारी बनाम श्रीमती चिन्ती यादव और अन्य (2026)के मामले में विचारण न्यायालय को यह सुनिश्चित करने का निदेश दिया कि डिक्री निर्णय के अनुरूप होक्योंकि निर्णय में स्पष्ट रूप से कब्जे की वसूली का उल्लेख न होने होते हुए भी डिक्री में स्पष्ट त्रुटि पाई गई थी। 

महेंद्र प्रसाद तिवारी बनाम श्रीमती चिंटी यादव और अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • वादी ने मध्य प्रदेश के सतना जिले की रामनगर तहसील के कैथाहा गाँव में स्थित सर्वे संख्या 615/2 में 0.105 हेक्टेयर भूमि के संबंध में स्वामित्व की घोषणाकब्जे की वसूली और स्थायी व्यादेश की मांग करते हुए एक वाद दायर किया। 
  • विचारण न्यायालय ने मामले में निर्णय के लिये छह विवाद्यक निर्धारित किये 
  • विवाद्यक संख्या इस बात से संबंधित थी कि क्या प्रतिवादी से ने सर्वेक्षण संख्या 615/2 में वादी की भूमि पर अतिक्रमण किया था। 
  • विवाद्यक संख्या इस बात से संबंधित थी कि क्या वादीकब्जे की वसूली से अनुतोष पाने का हकदार था। 
  • विचारण के पश्चात्न्यायालय ने सभी सुसंगत विवाद्यकों को वादी के पक्ष में साबित मान लिया। 
  • निर्णय के पैराग्राफ 18 मेंविचारण न्यायालय ने स्पष्ट रूप से पाया कि प्रतिवादियों ने वादी की भूमि पर अवैध रूप से अतिक्रमण किया था और वादी प्रतिवादियों से खाली कब्जा वापस लेने का हकदार था। 
  • तथापिजब ड्राफ्ट डिक्री तैयार की गई थीतब न्यायालय ने केवल स्थायी व्यादेश का आदेश पारित कियापरंतु डिक्री में कब्जे की वसूली के अनुतोष को सम्मिलित करने में विफल रही। 
  • वादी ने डिक्री पर अंतिम हस्ताक्षर होने से पूर्व सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 152 के अधीन एक आक्षेप आवेदन दायर कर उसमें संशोधन या सुधार की मांग की। 
  • विचारण न्यायालय ने 13 नवंबर 2025 को आवेदन को नामंजूर कर दियायह मानते हुए कि ऐसे आक्षेप सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 152 के अधीन पोषणीय नहीं थेऔर डिक्री को अंतिम रूप देने और उस पर हस्ताक्षर करने की कार्यवाही की। 
  • तत्पश्चात् वादी ने इस आदेश को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय में सिविल रिवीजन पुनरीक्षण संख्या 1364/2025 दायर की। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • उच्च न्यायालय ने पाया कि डिक्री में स्पष्ट त्रुटि थीजिसके अधीन विचारण न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट रूप से यह पाए जाते हुए भी कि प्रतिवादियों ने भूमि पर अतिक्रमण किया था और वादी कब्जे की वसूली की डिक्री का हकदार थाकब्जे की वसूली को दर्ज करना छोड़ दिया था। 
  • न्यायालय ने टिप्पणी की किस्थायी व्यादेश कब्जे की वसूली के परिणामस्वरूप होना चाहिये थान कि एक स्वतंत्र अनुतोष के रूप में। 
  • न्यायालय ने माना कि चाहे आवेदन सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 152 के अधीन सही ढंग से शीर्षकित किया गया हो या नहींएक बार जब विचारण न्यायालय को यह बताया गया था कि निर्णय में यह उल्लेख होते हुए भी याचिकाकर्त्ता कब्जे की वसूली का हकदार थाडिक्री में इस अनुतोष को छोड़ दिया गया थातो विचारण न्यायालय को इस विसंगति को दूर करना चाहिये था। 
  • न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि विचारण न्यायालय को सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा धारा 152 के लागू न होनेके आधार पर यांत्रिक रूप से डिक्री पर हस्ताक्षर करने की आवश्यकता नहीं थी। 
  • उच्च न्यायालय ने कहा कि भले ही विचारण न्यायालय ने यह निष्कर्ष निकाला हो कि आवेदन का शीर्षक गलत थायदि डिक्री में कोई त्रुटि थीतो अंतिम रूप से डिक्री पर हस्ताक्षर करने से पहले विचारण न्यायालय उस त्रुटि को सुधारने के लिये बाध्य था 
  • न्यायालय ने विचारण न्यायालय की इस बात के लिये आलोचना की कि उसने आक्षेप को सरसरी तौर पर खारिज कर दिया और फिर मूल त्रुटि को दूर किये बिना ही डिक्री पर हस्ताक्षर कर दिये 
  • उच्च न्यायालय ने निदेश दिया कि अब चूँकिडिक्री पर अंतिम रूप से हस्ताक्षर हो चुके हैंइसलिये सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 152 के अधीन आक्षेप वास्तव में पोषणीय होंगे । 
  • विचारण न्यायालय को सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 152 के अधीन एक विशिष्ट आदेश पारित करने और यह सुनिश्चित करने का निदेश दिया गया था कि डिक्री निर्णय के अनुरूप होन कि निर्णय के विपरीत। 
  • न्यायालय ने विचारण न्यायालय को 30 दिनों के भीतर उचित आदेश पारित करने का निदेश दिया। 

सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 152 क्या है? 

बारे में: 

  • यह धारानिर्णयों, डिक्रियों या आदेशों में संशोधन से संबंधित है। 
  • इसमें कहा गया है कि निर्णयोंडिक्रियों या आदेशों में की लेखन या गणित संबंधी भूलें या किसी आकस्मिक भूल या लोप से उसमें हुई न्यायालय द्वारास्वप्रेरणा से या पक्षकारों में से किसी के आवेदन पर किसी भी समयशुद्ध की जा सकेंगी 
  • यह धारादो महत्त्वपूर्ण सिद्धांतों पर आधारित है: 
    • न्यायालय की किसी भी कार्यवाही से किसी भी पक्षकार के प्रति पूर्वाग्रह नहीं होना चाहिये 
    • यह न्यायालयों का कर्त्तव्य है कि वे यह सुनिश्चित करें कि उनके रिकॉर्ड सही हों और वे वास्तविक स्थिति का सही प्रतिनिधित्व करते हों। 
  • यह न्यायालयों को किसी भी समय आकस्मिक भूल या लोप से उत्पन्न होने वाले निर्णयोंडिक्रियों या आदेशों में किसी भी लिपिकीय या गणितीय त्रुटियों को सुधारने की अनुमति देता है। 
  • यह उपबंध अभिलेख में स्पष्ट रूप से दिखाई देने वाली त्रुटियों को सुधारने में सक्षम बनाता है। 
  • धारा 152 को या तो पक्षकारों के आवेदन पर या न्यायालय द्वारा स्वतः संज्ञान लेकर लागू किया जा सकता है। 
  • इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अंतिम डिक्री में न्यायालय के उस आशय को सटीक रूप से प्रतिबिंबित किया जाए जैसा कि निर्णय में व्यक्त किया गया है। 

सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 152 के अधीन संशोधन का दायरा: 

  • यह धारा लिपिकीय त्रुटियों को सुधारने की अनुमति देता हैजिसमें टाइपिंग की त्रुटियाँगणना संबंधी त्रुटियाँ और वास्तव में लिये गए निर्णयों को दर्ज करने में त्रुटियाँ सम्मिलित हैं। 
  • यह निर्णय या डिक्री में ऐसे महत्त्वपूर्ण परिवर्तनों की अनुमति नहीं देता है जो पक्षकारों के अधिकारों को बदल दें। 
  • यदि निर्णय में स्पष्ट रूप से तय की गई बातों को लागू करने में निर्णय विफल रहता हैतो न्यायालय त्रुटियों को सुधार सकते हैं। 
  • सुधार का उद्देश्य किसी स्पष्ट त्रुटी को सुधारना होना चाहियेन कि निर्णय का पुनर्विलोकन या पुनर्विचार करना। 

आवेदन का समय: 

  • धारा 152 के अधीन आवेदन किसी भी समय दाखिल किये जा सकते हैंयहाँ तक ​​कि डिक्री पर हस्ताक्षर और निष्पादन हो जाने के पश्चात् भी। 
  • तथापिक्रियान्वयन में जटिलताओं से बचने के लिये डिक्री को अंतिम रूप दिये जाने से पहले ही आक्षेप उठाना उचित है। 

न्यायालयों का दायित्त्व: 

  • न्यायालयों का यह कर्त्तव्य है कि वे निर्णयों और डिक्रियों में एकरूपता सुनिश्चित करें। 
  • जब कोई स्पष्ट त्रुटि इंगित की जाती हैतो न्यायालयों को आवेदन के शीर्षक की तकनीकी बारीकियों की परवाह किये बिना उसे ठीक करना चाहिये 
  • इस मामले में स्थापित सिद्धांत इस बात को पुष्ट करता है कि जब वास्तविक त्रुटियाँ विद्यमान हों जो निर्णय के निष्कर्षों के विपरीत होंतो न्यायालयों को डिक्री में सुधार के लिये आवेदनों को यंत्रवत रूप से खारिज नहीं करना चाहिये