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सिविल कानून
वाद-हेतुक का अनुचित संयोजन
«19-Mar-2026
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विक्टोरिया एंटरप्राइजेज लिमिटेड बनाम डी.एन.एम. ट्रस्टी सर्विस प्राइवेट लिमिटेड "वाद-हेतुक के संयोजन के संबंध में किया गया आक्षेप मात्र एक विचारणीय प्रश्न उत्पन्न करता है, और ऐसा आक्षेप इस निष्कर्ष पर पहुँचने का कोई आधार नहीं है कि वादपत्र में कोई वाद-हेतुक प्रकट नहीं होता, जिससे सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश 7 नियम 11(क) के अंतर्गत वादपत्र के नामंजूर किये जाने को उचित ठहराया जा सके।" न्यायमूर्ति गौरी गोडसे |
स्रोत: बॉम्बे उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
बॉम्बे उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति गौरी गोडसे ने विक्टोरिया एंटरप्राइजेज लिमिटेड बनाम डी.एन.एम. ट्रस्टी सर्विस प्राइवेट लिमिटेड (2026) के मामले में सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के आदेश 7 नियम 11 के अधीन वादपत्र के नामंजूर करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया।
- न्यायालय ने माना कि वाद-हेतुक का अनुचित संयोजन केवल विचारणीय प्रश्न उत्पन्न करता है और प्रारंभिक प्रक्रम में नामंजूरी का आधार नहीं हो सकता। कार्यवाही में विलंब करने के प्रयास के लिये प्रतिवादी पर ₹50,000 का जुर्माना अधिरोपित किया गया।
विक्टोरिया एंटरप्राइजेज लिमिटेड बनाम डी.एन.एम. ट्रस्टी सर्विस प्राइवेट लिमिटेड (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह विवाद 2 फरवरी 2008 के एक रजिस्ट्रीकृत करार से उत्पन्न हुआ, जिसके अधीन विक्टोरिया एंटरप्राइजेज लिमिटेड ने 31 मार्च 2008 तक कुछ यूनिट्स का कब्जा क्रेताओं को सौंपने पर सहमति व्यक्त की थी।
- डी.एन.एम. ट्रस्टी सर्विस प्राइवेट लिमिटेड ने करार के अधीन सुविधाओं, पार्किंग स्थलों और अन्य सुविधाओं से संबंधित वैधानिक और संविदात्मक दायित्त्वों के गैर-अनुपालन का आरोप लगाते हुए एक वाणिज्यिक वाद दायर किया।
- विक्टोरिया एंटरप्राइजेज लिमिटेड ने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 7 नियम 11(क) और (घ) के अधीन एक अंतरिम आवेदन दायर किया, जिसमें तर्क दिया गया कि वाद परिसीमा द्वारा वर्जित था, कि वादपत्र में वैध वाद-हेतुक नहीं बताया गया था, और आदेश 2 नियम 4 के अधीन वाद-हेतुक का अनुचित संयोजन था।
- जब यह आवेदन दायर किया गया था, तब तक वाद काफी आगे बढ़ चुका था और सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 13-क के अधीन वादी द्वारा संक्षिप्त निर्णय के लिये आवेदन करने के प्रक्रम में था।
- न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- वाद-हेतुक पर: न्यायालय ने वादपत्र के विभाजन विलेख एवं न्यास विलेख की परीक्षा की और यह अभिनिर्णीत किया कि अभिवचनों से वादी के वाद दायर करने के अधिकार का पर्याप्त प्रकटीकरण सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश 31 नियम 1 के अंतर्गत होता है। अतः वाद-हेतुक के अभाव संबंधी आक्षेप प्रारंभिक प्रक्रम पर ग्राह्य नहीं माना गया।
- वाद-हेतुक के संयोजन पर: न्यायालय ने माना कि प्रतिवादी द्वारा आदेश 2 नियम 4 पर विश्वास करना अनुचित था। अनुचित संयोजन पर आक्षेप केवल विचारणीय विवाद्यक उत्पन्न करता है और आदेश 7 नियम 11(क) के अधीन वादपत्र को नामंजूर करने का आधार नहीं हो सकता। वादी विचारण में अपने वाद-हेतुक के समर्थन में साक्ष्य प्रस्तुत करने का हकदार है।
- परिसीमा के संबंध में: न्यायालय ने पाया कि सुविधाओं और व्यवस्थाओं से संबंधित संविदात्मक दायित्त्वों का अनुपालन न करना निरंतर उल्लंघन माना जा सकता है। वादपत्र में बार-बार याद दिलाने और प्रतिवादी द्वारा अपने दायित्त्वों को पूरा करने में निरंतर असफलता के संबंध में विस्तृत विवरण शामिल थे, जिससे परिसीमा का प्रश्न विचारण के लिये खुला रह गया।
- विलंब के संबंध में: न्यायालय ने पाया कि आदेश 7 नियम 11 के अंतर्गत आवेदन दाखिल करना, उस समय जब मामला पहले से ही न्यायालय के समक्ष संक्षिप्त निर्णय के लिये प्रस्तुत था, कार्यवाही में विलंब करने का स्पष्ट प्रयत्न था, जो वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम के अधीन शीघ्र निपटान के उद्देश्य के विपरीत है। तदनुसार, ₹50,000 का जुर्माना अधिरोपित किया गया।
सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश 7 नियम 11 में वादपत्र का नामंजूर किया जाना क्या है?
बारे में:
सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 7 नियम 11 में विशिष्ट परिस्थितियों में वादपत्र को नामंजूर करने का उपबंध है। यह एक असाधारण शक्ति है जिसका प्रयोग अत्यंत सावधानी और विवेक के साथ किया जाना चाहिये और इसका उपयोग केवल तकनीकी आधार पर, मामले के गुण-दोष पर पूरी तरह से विचार किये बिना, वास्तविक दावों को खारिज करने के लिये नहीं किया जाना चाहिये।
नामंजूरी के कारण निम्नलिखित हैं:
- खण्ड (क) के अनुसार, जहाँ वह वाद-हेतुक प्रकट नहीं करता है।
- खण्ड (ख) के अनुसार, जहाँ दावाकृत अनुतोष का मूल्यांकन कम किया गया है और वादी मूल्यांकन को ठीक करने के लिये न्यायालय द्वारा अपेक्षित किये जाने पर उस समय के भीतर जो न्यायालय ने नियत किया है, ऐसा करने में असफल रहता है।
- खण्ड (ग) जहाँ दाषाकृत अनुतोष का मूल्यांकन ठीक है किंतु वादपत्र अपर्याप्त स्टाम्प-पत्र पर लिखा गया है और वादी अपेक्षित स्टाम्प पत्र के देने के लिये न्यायालय द्वारा अपेक्षित किये जाने पर उस समय के भीतर, जो न्यायालय ने नियत किया है, ऐसा करने में असफल रहता है।
- खण्ड (घ) के अनुसार, जहाँ वादपत्र में के कथन से यह प्रतीत होता है कि वाद किसी विधि द्वारा वर्जित है।
- खण्ड (ङ) में यह उपबंध है कि यदि वादपत्र दो प्रतियों में दाखिल नहीं किया गया है तो उसे नामंजूर कर दिया जाएगा।
- खण्ड (च) में नामंजूरी का यह उपबंध है कि यदि वादी नियम 9 के उपबंधों का अनुपालन करने में असफल रहता है, तो वादपत्र को नामंजूर कर दिया जाएगा।
इस परंतुक में यह कहा गया है कि मूल्यांकन में सुधार करने या स्टांप-पेपर उपलब्ध कराने के लिये समय सीमा तब तक नहीं बढ़ाई जाएगी जब तक कि न्यायालय संतुष्ट न हो जाए कि वादी किसी असाधारण कारण से ऐसा करने में असमर्थ था और इंकार करने से गंभीर अन्याय होगा।
आदेश 7 नियम 11 को नियंत्रित करने वाले प्रमुख सिद्धांत:
- आदेश 7 नियम 11 के अधीन किसी आवेदन की जांच करते समय, न्यायालय कठोरता से वादपत्र में दिये गए कथनों और उससे संलग्न या उसमें संदर्भित दस्तावेज़ों तक ही सीमित रहते हैं।
- प्रतिवादी द्वारा प्रस्तुत प्रतिरक्षा पर विचार नहीं किया जा सकता है, और न्यायालय वादपत्र की सीमाओं से परे नहीं जा सकता है।
- खण्ड (घ) के अधीन, न्यायालय को स्वयं वादपत्र से यह अवधारित करना होगा कि क्या वादपत्र किसी विधि द्वारा, जिसमें परिसीमा की विधि भी सम्मिलित है, वर्जित है।
- इस शक्ति का प्रयोग केवल स्पष्ट और प्रत्यक्ष मामलों में ही किया जाना चाहिये जहाँ वाद प्रथम दृष्टया वर्जित हो।
- जहाँ परिसीमा का अवधारण साक्ष्य की परीक्षा या विधि और तथ्य के मिश्रित प्रश्नों पर विचार करने की आवश्यकता होती है, वहाँ खण्ड (घ) के अधीन वादपत्र को नामंजूर नहीं किया जा सकता है।
- इसके अतिरिक्त, जहाँ कई अनुतोषों की मांग की जाती है और यहाँ तक कि एक अनुतोष भी परिसीमा के भीतर है, वहाँ वादपत्र को विधि द्वारा वर्जित होने के कारण पूरी तरह से नामंजूर नहीं किया जा सकता है।
वाद-हेतुक क्या है?
विभिन्न न्यायिक मामलों में "वाद-हेतुक" शब्द की व्याख्या इस प्रकार की गई है:
- ओम प्रकाश श्रीवास्तव बनाम भारत संघ एवं अन्य, (2006):
- उच्चतम न्यायालय ने वाद-हेतुक को इस प्रकार परिभाषित किया है: "प्रत्येक तथ्य, जिसे चुनौती दिये जाने पर, न्यायालय के निर्णय के अपने अधिकार का समर्थन करने के लिये वादी के लिये साबित करना आवश्यक होगा।"
- दूसरे शब्दों में, यह उन तथ्यों का समूह है जिन्हें वादी को अपने वाद में सफल होने के लिये साबित करना आवश्यक है।
- ब्लूम डेकोर लिमिटेड बनाम सुभाष हिम्मतलाल देसाई, (1994):
- इस मामले ने यह स्थापित किया कि वाद-हेतुक उन तथ्यों के संग्रह को संदर्भित करता है जिन्हें वादी को अनुकूल निर्णय प्राप्त करने के लिये साबित करना होगा।
- सदानंदन भद्रन बनाम माधवन सुनील कुमार (1998):
- न्यायालय ने निर्णय दिया कि व्यापक अर्थ में (जैसा कि सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 20 में प्रयुक्त है), वाद-हेतुक वह प्रत्येक तथ्य है जो निर्णय प्राप्त करने के अधिकार को स्थापित करने के लिये आवश्यक है।
- साउथ ईस्ट एशिया शिपिंग कंपनी लिमिटेड बनाम नव भारत एंटरप्राइजेज (पी.) लिमिटेड (1996):
- इस मामले ने स्पष्ट किया कि वाद-हेतुक का आधार वे तथ्य होते हैं जो न्यायोचित निवारण हेतु विधिक जांच प्रारंभ करने का कारण बनते हैं। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इसमें प्रतिवादी द्वारा किया गया कोई कार्य शामिल होना चाहिये, क्योंकि ऐसे कार्य के बिना वाद-हेतुक का कोई आधार उत्पन्न नहीं होगा।
- राजस्थान उच्च न्यायालय अधिवक्ता संघ बनाम भारत संघ, (2001):
- न्यायालय ने वाद-हेतुक के सीमित और व्यापक अर्थों के बीच अंतर स्पष्ट किया:
- सीमित अर्थ में: वे परिस्थितियाँ जो अधिकार के उल्लंघन का कारण बनती हैं
- व्यापक अर्थ में: वाद को बनाए रखने के लिये आवश्यक शर्तें, जिनमें उल्लंघन और स्वयं अधिकार दोनों सम्मिलित हैं।
- इस निर्णय में उन तथ्यों के बीच भी अंतर बताया गया है जिन्हें साबित करना आवश्यक है (जो वाद-हेतुक का आधार बनते हैं) और उन तथ्यों को साबित करने के लिये आवश्यक साक्ष्यों के बीच (जो वाद-हेतुक का आधार नहीं बनते)।
- न्यायालय ने वाद-हेतुक के सीमित और व्यापक अर्थों के बीच अंतर स्पष्ट किया:
- गुरदित सिंह बनाम मुंशा सिंह (1977):
- इस मामले ने वाद-हेतुक के दो निर्वचनों पर बल दिया:
- सीमित दृष्टिकोण: वे तथ्य जो किसी अधिकार के उल्लंघन या आधार का गठन करते हैं।
- व्यापक दृष्टिकोण: उन सभी महत्त्वपूर्ण तथ्यों का पूरा समूह, जिन्हें सफल होने के लिये वादी को साबित करना अनिवार्य है।
- इस मामले ने वाद-हेतुक के दो निर्वचनों पर बल दिया:
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