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पारिवारिक कानून

नोटरीकृत शपथपत्रों के माध्यम से विवाह विच्छेद का समावेशन

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 30-Jan-2026

तुफज्जुल हुसैन बनाम फुलमाला खातून 

"नोटरी के समक्ष दिये गए शपथ पत्र के माध्यम से विवाह भंग नहीं किया जा सकता हैऔर मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम, 1939 को लागू करने के लिये पर्याप्त सबूत न होने की स्थिति मेंकेवल नोटरीकृत शपथ पत्र के आधार पर विवाह विच्छेद का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता है।" 

न्यायमूर्ति प्रांजल दास 

स्रोत: गुवाहाटी उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति प्रांजल दास ने तुफज्जुल हुसैन बनाम फुलमाला खातून (2025)के मामले मेंयह निर्णय दिया कि किसी नोटरी के समक्ष दिये गए शपथपत्र के माध्यम से विवाह भंग नहीं किया जा सकता हैऔर मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम, 1939 को लागू करने के लिये पर्याप्त सबूत न होने की स्थिति मेंकेवल नोटरीकृत शपथपत्र के आधार पर विवाह विच्छेद का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता है 

तुफज्जुल हुसैन बनाम फुलमाला खातून (2025) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह मामला बारपेटा स्थित कुटुंब न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश द्वारा पारित एक आदेश को चुनौती देने वाली आपराधिक पुनरीक्षण याचिका से उत्पन्न हुआ है। 
  • कुटुंब न्यायालय ने याचिकाकर्त्ता-पति को प्रत्यर्थी-पत्नी को प्रति माह 3,000 रुपए भरण-पोषण के रूप में देने का निदेश दिया था। 
  • प्रत्यर्थी पत्नी ने भरण-पोषण की मांग करते हुए दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के अधीन कुटुंब न्यायालय का रुख किया था। 
  • उसने दावा किया कि उसने याचिकाकर्त्ता से मुस्लिम विधि के अधीन विवाह किया थाउसके साथ रहती थीऔर बाद में कथित यातना और पैसों की मांग के बाद उसे घर से निकाल दिया गया था। 
  • याचिकाकर्त्ता ने वैवाहिक संबंध पर विवाद किया और तर्क दिया कि प्रत्यर्थी का मानिक अली नामक व्यक्ति से पहले विवाह हुआ थाजिसे विधिक रूप से भंग नहीं किया गया था। 
  • प्रत्यर्थी ने प्रतिपरीक्षा के दौरान स्वीकार किया कि उसने अपने पहले पति से 2000 में विवाह किया था और उस विवाह से उसके तीन बच्चे थे। 
  • उन्होंने बताया कि उनके पूर्व पति ने उसे तलाक नहीं दिया थाअपितु उन्होंने 2017 में उसे तलाक दे दिया था। 
  • दोनों पक्षकारों ने विवाह विच्छेद का उल्लेख करने वाले शपथपत्र की एक फोटोकॉपी का हवाला दियाकिंतु कार्यवाही के दौरान दस्तावेज़ को प्रदर्शित नहीं किया गया। 
  • प्रत्यर्थी ने मानिक अली के साथ अपने वैवाहिक संबंध को समाप्त करने का उल्लेख किया और शपथपत्र की एक प्रति जमा करने की बात कहीजबकि मूल प्रति अपने पास रखी। 
  • कुटुंब न्यायालय के समक्ष कार्यवाही के दौरानप्रत्यर्थी यह साबित करने के लिये पर्याप्त साक्ष्य पेश नहीं कर सका कि मानिक अली के साथ उसका पूर्व विवाह विधिक रूप से भंग हो गया था। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने टिप्पणी की कि किसी नोटरी के समक्ष दिये गए शपथ पत्र के माध्यम से विवाह भंग नहीं किया जा सकता हैऔर कहा, "यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि किसी नोटरी के समक्ष दिये गए शपथ पत्र के माध्यम से विवाह भंग नहीं किया जा सकता है।" 
  • न्यायालय ने पाया कि ऐसा कोई सबूत नहीं था जिससे यह संकेत मिले कि प्रत्यर्थी ने मानिक अली के साथ अपने वैवाहिक संबंध को भंग करने के लिये मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम, 1939 के प्रावधानों का सहारा लिया था। 
  • न्यायालय ने अभिलिखित किया कि प्रत्यर्थी का मानिक अली के साथ पूर्व विवाह एक स्वीकृत तथ्य था। 
  • न्यायालय ने पाया कि प्रत्यर्थी यह साबित करने के लिये पर्याप्त साक्ष्य पेश नहीं कर सकी कि उसका पूर्ववर्ती विवाह विधिक रूप से भंग हो गया था और वह अब उसकी विधिक रूप से विवाहित पत्नी नहीं थी। 
  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल प्रतिपरीक्षा के दौरान शपथपत्र का उल्लेख करना और भरण-पोषण की कार्यवाही में उसकी एक प्रति प्रस्तुत करनापूर्व विवाह विच्छेद का पर्याप्त सबूत नहीं होगा। 
  • न्यायालय ने यह माना कि नोटरी पब्लिक के समक्ष प्रत्यर्थी द्वारा शपथपूर्वक दिया गया कोई भी शपथपत्र विवाह के विधिक रूप से स्वीकार्य विवाह विच्छेद का आधार नहीं बनेगा। 
  • न्यायालय ने कहा कि ऐसे साक्ष्य वर्तमान याचिकाकर्त्ता की पत्नी होने का कोई दर्जा प्रदान नहीं करेंगेभले ही यह मान लिया जाए कि उसने वर्तमान याचिकाकर्त्ता से विवाह किया था। 
  • न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि कुटुंब न्यायालय ने इस पहलू को नजरअंदाज करने और याचिकाकर्त्ता की पत्नी के रूप में प्रत्यर्थी की वैवाहिक स्थिति को स्वीकार करने में त्रुटी की। 
  • न्यायालय ने यह माना कि पत्नी विधिक रूप से विवाहित पत्नी होने के नाते याचिकाकर्त्ता पति से भरण-पोषण का दावा नहीं कर सकती थी और इसलियेउसे उसकी ओर से भरण-पोषण नहीं दिया जा सकता है। 
  • कुटुंब न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश द्वारा पारित विवादित निर्णय और आदेश को अपास्त कर दिया गया। 
  • पुनर्विचार याचिका मंजूर कर ली गई और उसका निपटारा कर दिया गया। 

मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम, 1939 क्या है? 

परिचय: 

  • मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम, 1939 एक ऐसी विधि है जो भारत में मुस्लिम महिलाओं को कुछ निर्दिष्ट आधारों के अधीन विवाह विच्छेद का अधिकार प्रदान करता है। 
  • यह अधिनियम मुस्लिम विवाहों विच्छेद से संबंधित विधि को समेकित और स्पष्ट करने के लिये बनाई गई थी 
  • इस अधिनियम से पूर्वमुस्लिम महिलाओं के पास तलाक मांगने के सीमित अधिकार थेऔर तलाक से संबंधित विधि अक्सर अस्पष्ट था और इस्लामी विधिशास्त्र के विभिन्न स्कूलों के आधार पर भिन्न-भिन्न था। 
  • इस अधिनियम में कुछ विशिष्ट आधार दिये गए हैं जिनके आधार पर एक मुस्लिम महिला विवाह विच्छेद की मांग कर सकती हैजिनमें पति का चार वर्ष तक लापता रहनादो वर्ष तक भरण-पोषण न कर पानापति का सात वर्ष या उससे अधिक का कारावासपति का तीन वर्ष तक वैवाहिक दायित्त्वों का निर्वाह न करनापति का नपुंसक होनापति का पागल होना या कुष्ठ रोग या किसी संचारी रूप से रतिज रोग  से पीड़ित होनापत्नी द्वारा यौवन प्राप्त करने से पूर्व विवाह का त्याग करनापति द्वारा क्रूरता करना और मुस्लिम विधि के अधीन मान्यता प्राप्त कोई अन्य आधार सम्मिलित हैं। 
  • यह अधिनियम मुस्लिम महिलाओं को इन आधारों पर विवाह विच्छेद के लिये न्यायालय में जाने का अधिकार देता है। 

विवाह विच्छेद की आवश्यकताएँ: 

  • मुस्लिम विधि के अधीनविवाह विच्छेद के लिये विधि द्वारा विहित उचित विधिक प्रक्रियाओं का पालन करना आवश्यक है।  
  • किसी नोटरी पब्लिक के समक्ष शपथपत्र निष्पादित करने मात्र से विवाह भंग नहीं किया जा सकता है। 
  • मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम, 1939 के अधीन वैध तलाक के लियेमहिला को अधिनियम के प्रावधानों का सहारा लेना होगा और विहित प्रक्रिया का पालन करना होगा। 
  • तलाक को उचित साक्ष्य और दस्तावेज़ीकरण के माध्यम से विधिक रूप से स्थापित किया जाना चाहियेन कि केवल एकतरफा घोषणाओं या निजी दस्तावेज़ों के माध्यम से। 
  • किसी नोटरीकृत शपथपत्र का मात्र उल्लेख करना या उसकी प्रति प्रस्तुत करना विवाह के वैध विघटन का पर्याप्त सबूत नहीं माना जाएगा। 
  • विवाह विच्छेद न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से या मुस्लिम व्यक्तिगत विधि के अधीन मान्यता प्राप्त विधिक रीतियों से किया जाना चाहिये 
  • उचित विधिक प्रक्रिया के बिनातलाक का दावा विधिक रूप से मान्य नहीं होता और वैवाहिक स्थिति में परिवर्तन को साबित नहीं कर सकता।