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सिविल कानून

वक्फ अधिकरण की अधिकारिता का समावेशन

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 29-Jan-2026

हबीब अल्लादीन एवं अन्य बनाम मोहम्मद अहमद 

"वक्फ अधिकरणों की अधिकारिता केवल 'औक़ाफ़ की सूचीमें अधिसूचित संपत्तियों या वक्फ अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत संपत्तियों पर ही हैन कि अरजिस्ट्रीकृत संपत्तियों से संबंधित विवादों पर।" 

न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

हबीब अल्लादीन और अन्य बनाम मोहम्मद अहमद (2026)के मामले में न्यायमूर्ति संजय कुमार और के. विनोद चंद्रन की पीठ नेनिर्णय दिया कि वक्फ अधिकरणों की अधिकारिता केवल "औक़ाफ़ की सूची" में अधिसूचित संपत्तियों या वक्फ अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत संपत्तियों पर हैन कि अरजिस्ट्रीकृत संपत्तियों से संबंधित विवादों पर। 

हबीब अलादीन और अन्य बनाम मोहम्मद अहमद (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह मामला वक्फ अधिकरण के समक्ष दायर स्थायी व्यादेश की याचिका से उत्पन्न हुआ।          
  • प्रत्यर्थी/वादी ने दावा किया कि एक आवासीय परिसर में एक कमरा लंबे समय तक धार्मिक उपयोग के कारण 2008 में मस्जिद बन गया था और इसलिये वह वक्फ संपत्ति है।               
  • यह निर्विवाद था कि संपत्ति न तो धारा 5(2) के अधीन प्रकाशित वक्फ की सांविधिक सूची में सम्मिलित थी और न ही वक्फ अधिनियम, 1995 की धारा 37 के अधीन रजिस्ट्रीकृत थी।  
  • संपत्ति के रजिस्ट्रीकृत न होते हुए भीवक्फ अधिकरण ने वाद पर सुनवाई की और प्रत्यर्थी/वादी के पक्ष में अनुतोष प्रदान किया।  
  • तेलंगाना उच्च न्यायालय ने बाद में अरजिस्ट्रीकृत संपत्ति के संबंध में व्यादेश जारी करने के वक्फ अधिकरण के निर्णय की पुष्टि की।  
  • अपीलकर्त्ता ने इन आदेशों को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दीयह तर्क देते हुए कि अधिकरण के पास इस बात की परीक्षा करने की अधिकारिता नहीं थी कि संपत्ति वक्फ थी या नहींक्योंकि इसे अधिनियम के अधीन कभी अधिसूचित या रजिस्ट्रीकृत नहीं किया गया था। 
  • इस मामले ने वक्फ अधिकरण की अधिकारिता के दायरे के संबंध में दो परस्पर विरोधी पूर्व निर्णयों के बीच लंबे समय से चले आ रहे संघर्ष को उजागर किया। 
  • अनीस फातिमा बेगम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2010)औरराशिद वली बेग बनाम फरीद पिंडारी (2022)सहित पूर्व निर्णयों की एक श्रृंखला नेनिर्णय दिया कि धारा 83 (1) अधिकरण को "वक्फ या वक्फ संपत्ति से संबंधित किसी भी विवादप्रश्न या अन्य मामले" पर निर्णय लेने के लिये व्यापक अधिकारिता प्रदान करती हैयहाँ तक ​​कि असूचीबद्ध संपत्तियों के लिये भी। 
  • एक अन्य पूर्व निर्णय मेंविशेष रूप सेरमेश गोबिंद्रम बनाम सुगरा हुमायूं मिर्जा वक्फ (2010)ने निर्णय दिया कि अधिकरण की अधिकारिता विशिष्ट है और अधिनियम द्वारा स्पष्ट रूप से प्रदत्त मामलों तक सीमित हैजबकि धारा 83 केवल एक सक्षम उपबंध है। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • उच्चतम न्यायालय ने तेलंगाना उच्च न्यायालय के निर्णय से असहमति जताते हुए कहा कि वादपत्र को सरसरी तौर पर पढ़ने से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि संपत्ति न तो 'औक़ाफ़ की सूचीमें निर्दिष्ट थी और न ही अध्याय के अधीन रजिस्ट्रीकृत थी। 
  • न्यायालय ने माना कि यह निर्णय कि संपत्तिवक्फ संपत्ति है या नहींअधिकरण द्वारा तय नहीं किया जा सकता हैक्योंकि संपत्ति 'औक़ाफ़ की सूचीमें निर्दिष्ट नहीं हैजो कि अधिकरण से संपर्क करने के लिये वक्फ अधिनियम 1995 की धारा 6(1) और धारा 7(1) के अधीन अनिवार्य आवश्यकता है। 
  • न्यायालय ने नोट किया कि राशिद वली बेग का निर्णयजो विशेष रूप से धारा 83 (1) से संबंधित हैंने केवल "वक्फ या वक्फ संपत्ति से संबंधित किसी विवादप्रश्न या अन्य मामले के अवधारण के लियेशब्दों को लिया गया था और "इस अधिनियम के अधीन" शब्द छोड़ दियया गया था 
  • न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि वक्फ या वक्फ संपत्तियों को अधिनियम के अधीन एक दर्जा प्राप्त होना चाहियेजो केवल 'औक़ाफ़ की सूचीमें शामिल होने से ही संभव हैजिसमें अध्याय के अधीन सर्वेक्षण के बाद प्रकाशित सूची या अध्याय के अधीन किया गया रजिस्ट्रीकरण शामिल है। 
  • उच्चतम न्यायालय ने रमेश गोबिंद्रम मामले में प्रतिपादित सिद्धांत को शासी विधि के रूप में बहाल किया और सम्मानपूर्वक पुष्टि की कि वक्फ अधिनियम, 1995 के अधीन अधिकरण को प्रदत्त अधिकारिता और उक्तअधिनियम की धारा 85 के अधीन सिविल न्यायालय की अधिकारिता का अपवर्जन केवल अधिनियम के अधीन स्थिति प्राप्त संपत्तियों पर ही लागू होता है। 
  • न्यायालय ने अपीलकर्त्ता के इस तर्क को स्वीकार कर लिया कि अधिकरण के पास वाद की सुनवाई करने की अधिकारिता नहीं थीऔर यह माना कि अधिकरण के पास यह परीक्षा करने का कोई अधिकार नहीं था कि संपत्ति वक्फ थी या नहीं। 
  • न्यायालय ने माना कि अधिकारिता के अभाव में स्वयं वादपत्र को नामंजूर किया जाना चाहिये 
  • उच्चतम न्यायालय ने अपील मंजूर कर ली और वक्फ अधिकरण और उच्च न्यायालय के आदेशों को अपास्त कर दिया। 
  • न्यायालय ने अधिकारिता के अभाव में सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश नियम 11 के अधीन वादपत्र को नामंजूर कर दिया। 

वक्फ अधिकरण की अधिकारिता क्या है? 

परिचय: 

  • वक्फ अधिकरण, वक्फ अधिनियम, 1995 के अधीन स्थापित विशेषअर्ध-न्यायिक निकाय हैंजो वक्फ संपत्तियों से संबंधित विवादों का निपटारा करती हैं।  
  • वक्फ अधिकरणों की अधिकारिता को लेकर न्यायिक निर्वचनों में विवाद रहा हैविशेष रूप से इस संबंध में कि क्या वे उन संपत्तियों पर विवादों का निर्णय कर सकते हैं जो औपचारिक रूप से रजिस्ट्रीकृत नहीं हैं या वक्फ के रूप में सूचीबद्ध नहीं हैं। 

वक्फ अधिनियम, 1995 की धारा 83: 

  • धारा 83 अधिनियम के अंतर्गत वक्फ या वक्फ संपत्ति से संबंधित विवादोंप्रश्नों या अन्य मामलों के निर्धारण के लिये एक अधिकरण के गठन का उपबंध करती है। 
  • यह उपबंध राज्य सरकार को राज्य में वक्फों के संबंध में अधिकारिता का प्रयोग करने के लिये एक या अधिक अधिकरणों का गठन करने का अधिकार देता है। 
  • धारा 83(1) में कहा गया है कि अधिकरण अधिनियम के अंतर्गत "वक्फ या वक्फ संपत्ति से संबंधित किसी विवादप्रश्न या अन्य मामले" का अवधारण करेगा। 
  • महत्त्वपूर्ण वाक्यांश "इस अधिनियम के अधीन" यह दर्शाता है कि अधिकरण की  अधिकारिता उन संपत्तियों तक सीमित है जिन्होंने वक्फ अधिनियम के अधीन दर्जा प्राप्त कर लिया है। 

वक्फ अधिनियम की धारा और धारा 7: 

  • धारा 6(1) के अधीन राज्य सरकार को राज्य में विद्यमान वक्फों की सूची प्रकाशित करनी होगी। 
  • धारा 7(1) के अनुसारवक्फ की सूची के प्रकाशन से पीड़ित किसी भी व्यक्ति को अधिकरण के समक्ष अपील करनी होगी। 
  • इन धाराओं के माध्यम से यह स्थापित किया गया है कि अधिनियम के अधीन किसी संपत्ति को वक्फ संपत्ति के रूप में मान्यता प्राप्त करने के लिये ' औक़ाफ़ की सूचीमें सम्मिलित होना एक अनिवार्य आवश्यकता है।  
  • इस प्रकाशित सूची में शामिल नहीं की गई या अध्याय 5 (धारा 37) के अधीन रजिस्ट्रीकृत नहीं की गई संपत्तियाँ अधिकरण की अधिकारिता को लागू करने के लिये आवश्यक दर्जा प्राप्त नहीं करती हैं। 

वक्फ अधिनियम, 1995 क्या है? 

पृष्ठभूमि: 

  • वक्फ अधिनियम पहली बार संसद द्वारा 1954 में पारित किया गया था। 
  • इसे बाद में निरस्त कर दिया गयाऔर1995में एक नयावक्फ अधिनियमपारित किया गयाजिसने वक्फ बोर्डों को अधिक शक्तियां प्रदान कीं।  
  • 2013 मेंअधिनियम में आगे संशोधन किया गया जिससे वक्फ बोर्ड को संपत्ति को 'वक्फ संपत्तिके रूप में नामित करने के लिये व्यापक शक्तियां प्रदान की जा सकें। 

वक्फ: 

  • यह मुस्लिम विधि द्वारा मान्यता प्राप्तधार्मिकपवित्र या पूर्त्त प्रयोजनों के लियेचलया अचल संपत्तियोंका स्थायी समर्पण है।  
  • इसका तात्पर्य किसी मुसलमान द्वारा चल या अचलमूर्त या अमूर्त संपत्ति को ईश्वर को दान करने से हैइस आधार पर कि यह अंतरण जरूरतमंदों को लाभ पहुँचाएगा। 
  • वक्फ से प्राप्त धनराशि का उपयोग सामान्यत: शैक्षणिक संस्थानोंकब्रिस्तानोंमस्जिदों और आश्रय गृहों के वित्तपोषण के लिये किया जाता है। 
  • भारत में वक्फों का विनियमन वक्फ अधिनियम, 1995 द्वारा किया जाता है। 

वक्फ का प्रबंधन: 

  • एक सर्वेक्षण आयुक्त स्थानीय अन्वेषण करकेसाक्षियों को समन करके और लोक दस्तावेज़ों की मांग करके वक्फ के रूप में घोषित सभी संपत्तियों की सूची बनाता है।  
  • वक्फ का प्रबंधन मुतावली द्वारा किया जाता हैजो पर्यवेक्षक के रूप में कार्य करता है। 
  • भारतीय न्यास अधिनियम, 1882 के अधीन स्थापित न्यासों के विपरीतजो व्यापक उद्देश्यों की पूर्ति कर सकते हैं और बोर्ड द्वारा भंग किये जा सकते हैंवक्फ विशेष रूप से धार्मिक और पूर्त्त उपयोगों के लिये होते हैं और शाश्वत होने के उद्देश्य से बनाए जाते हैं।  
  • वक्फ सार्वजनिक हो सकते हैंजिनका उद्देश्य पूर्त्त कार्य करना होता हैया निजी हो सकते हैंजिनसे संपत्ति के स्वामी के प्रत्यक्ष वंशजों को लाभ होता है।  
  • वक्फ बनाने के लिये व्यक्ति का मानसिक रूप से स्वस्थ होना और संपत्ति का वैध स्वामित्व होना आवश्यक है। दिलचस्प बात यह है कि वक्फ निर्माताजिसे वक्फकार कहा जाता हैका मुसलमान होना आवश्यक नहीं हैबशर्ते वह इस्लामी सिद्धांतों में विश्वास रखता हो। 

वक्फ बोर्ड: 

  • वक्फ बोर्ड एक विधिक व्यक्तित्व है जो संपत्ति का अधिग्रहणधारण और अंतरण करने में सक्षम है। यह न्यायालय में वाद दायर कर सकता है और इसके विरुद्ध वाद दायर किया जा सकता है।  
  • यह वक्फ संपत्तियों का प्रबंधन करता हैलुप्त/अतिक्रमित संपत्तियों की पुनर्प्राप्ति करता है और विक्रयदानबंधक, विनिमय या पट्टे के माध्यम से अचल वक्फ संपत्तियों के अंतरण को मंजूरी देता हैजिसमें कम से कम दो-तिहाई बोर्ड सदस्यों द्वारा संव्यवहार के पक्ष में मतदान किया जाना आवश्यक है। 
  • केंद्रीय वक्फ परिषद (CWC) जिसकी स्थापना 1964 में की गई थीभारत भर में राज्य स्तरीय वक्फ बोर्डों के कार्यों की निगरानी करती है तथा उन्हें परामर्श प्रदान करती है।  

वक्फ संपत्तियाँ: 

  • रेलवे और रक्षा विभाग के बाद वक्फ बोर्ड को भारत में तीसरा सबसे बड़ा भूस्वामी कहा जाता है।  
  • एक बार किसी संपत्ति को वक्फ के रूप में नामित कर दिये जाने के बादवह गैर-अंतरणीय हो जाती है और ईश्वर के प्रति एक पूर्त्त कार्य के रूप में सदैव के लिये रखी जाती हैअनिवार्य रूप से स्वामित्व ईश्वर को अंतरित हो जाता है।