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आपराधिक कानून

परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 143-क के पाल अंतरिम प्रतिकर

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 31-Jan-2026

श्री मधु राम डेका बनाम असम राज्य एवं अन्य 

"अंतरिम प्रतिकर देने से पूर्व न्यायालय को प्रथम दृष्टया मामले से संतुष्ट होना आवश्यक है। यदि अभियुक्त की प्रतिरक्षा प्रथम दृष्टया विश्वसनीय पाई जाती हैतो न्यायालय अंतरिम प्रतिकर देने से इंकार करने में विवेक का प्रयोग कर सकता है।" 

न्यायमूर्ति प्रणजल दास 

स्रोत: गुवाहाटी उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

गुवाहाटी उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति प्रणजल दास ने श्री मधु राम डेका बनाम असम राज्य और अन्य (2026)के मामले मेंपरक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 143-क के अधीन अंतरिम प्रतिकर के रूप में चेक राशि का 20% संदाय करने का निदेश देने वाले विचारण न्यायालय के आदेश को अपास्त कर दियायह देखते हुए कि साक्ष्य के माध्यम से उचित निर्णय की आवश्यकता वाले विवादित प्रश्नों के लिये अंतरिम अनुतोष प्रदान करने में सावधानी बरतने की आवश्यकता है। 

श्री मधु राम डेका बनाम असम राज्य और अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह मामला परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 143-क के अधीन अंतरिम प्रतिकर देने के विचारण न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली आपराधिक पुनरीक्षण याचिका से उत्पन्न हुआ।  
  • मूल परिवाद परक्राम्य लिखत अधिनियमकी धारा 138 के अधीन 20,00,000 रुपए के चेक के अनादरण से संबंधित मामले में दर्ज की गई थी। 
  • चेक को "चेक जारी करने वाले के हस्ताक्षर में अंतर" के आधार पर अनादरण कर दिया गया।     
  • विचारण न्यायालय ने अभियुक्त को चेक की राशि का 20% अंतरिम प्रतिकर के रूप में परिवादकर्त्ता को संदाय करने का निदेश दिया था। 
  • याचिकाकर्त्ता/अभियुक्त ने चेक जारी करने से इंकार किया और उस पर मौजूद हस्ताक्षर पर आपत्ति जताई। 
  • अभियुक्त ने दावा किया कि वह उस खाते का संचालक नहीं था जिससे कथित तौर पर चेक जारी किया गया था। 
  • अभियुक्त ने अपने हस्ताक्षर की कूटरचना का आरोप लगाते हुए परिवाद दर्ज कराया थाजिसके चलते भारतीय दण्ड संहिता की धारा 420/468/471 के अधीन मामला दर्ज किया गया। 
  • याचिकाकर्त्ता के दावों का समर्थन शाखा प्रबंधक के परिसाक्ष्य से हुआ। 
  • प्रत्यर्थीपरिवादकर्त्ता ने अंतरिम प्रतिकर के दावे का समर्थन करने के लिये वित्तीय कठिनाइयों का हवाला दिया।  

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने टिप्पणी की कि "अंतरिम प्रतिकर देने से पहले न्यायालय को प्रथम दृष्टया मामले से संतुष्ट होना आवश्यक है। इस प्रकार का प्रथम दृष्टया निर्धारण करने के लिये न्यायालय को परिवादकर्त्ता द्वारा प्रस्तुत मामले की खूबियों और अभियुक्त द्वारा प्रस्तुत प्रतिरक्षा की खूबियों को देखना होगा।"  
  • पीठ ने कहा कि "यदि अभियुक्त की प्रतिरक्षा प्रथम दृष्टया विश्वसनीय पाई जाती हैतो न्यायालय अंतरिम प्रतिकर को अस्वीकार करने में विवेक का प्रयोग कर सकता है।" 
  • न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि कुछ विवादित प्रश्न हैं जिनका साक्ष्यों के माध्यम से उचित निर्णय आवश्यक होगा। 
  • न्यायालय ने माना कि साक्ष्यों के माध्यम से उचित निर्णय के पश्चात् ही इस प्रश्न का उत्तर देना संभव होगा कि क्या अभियुक्त याचिकाकर्त्ता पर परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 के अधीन आपराधिक दायित्त्व बनता है। 
  • न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि "ऐसी स्थिति में... परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 143-क के अधीन शक्तियों का प्रयोग करते हुएइस स्तर पर अंतरिम प्रतिकर देना विवेकपूर्ण नहीं हो सकता है। यह प्रत्यर्थी संख्या 2/परिवादकर्त्ता की अनुमानित वित्तीय कठिनाइयों के होते हुए भी है।" 
  • तदनुसारन्यायालय ने अंतरिम प्रतिकर के संदाय का निदेश देने वाले विचारण न्यायालय के आदेश को अपास्त कर दिया। 

परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 143-क क्या है? 

धारा 143-क - अंतरिम प्रतिकर का निदेश देने की शक्ति: 

  • न्यायालय कब आदेश दे सकता है: धारा 138 के अधीन किसी अपराध का विचारण करने वाला न्यायालयचेक लेखिवाल को परिवादकर्त्ता को अंतरिम प्रतिकर देने का आदेश दे सकता है। 
  • आदेश का समय : 
    • संक्षिप्त विचारण/समन मामले में: जब लेखिवाल दोषी नहीं होने का अभिवचन करता है। 
    • अन्य मामलों में: आरोप विरचित होने पर। 
  • प्रतिकर सीमाअंतरिम प्रतिकर चेक की राशि के 20% से अधिक नहीं होगा। 
  • संदाय की समयसीमा: 
    • आदेश देने के 60 दिनों के भीतर संदाय करना होगा। 
    • पर्याप्त कारण होने पर न्यायालय सुनवाई की अवधि को अतिरिक्त 30 दिनों तक बढ़ा सकता है। 
  • यदि लेखिवाल दोषमुक्त हो जाता है: 
    • परिवादकर्त्ता को अंतरिम प्रतिकर की राशि वापस करनी होगी।  
    • ब्याज दर बैंक दर के अनुसार होगी (RBI के अनुसार)। 
    • 60 दिनों के भीतर (पर्याप्त कारण होने पर 30 दिनों तक बढ़ाया जा सकता है)। 
  • वसूली की रीति: अंतरिम प्रतिकर की वसूली उसी प्रकार की जा सकती है जैसे कि यह दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 421 के अधीन जुर्माना हो। 
  • समायोजन: 
    • धारा 138 के अधीन अंतिम जुर्माना या। 
    • दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 357 के अधीन प्रतिकर।  
    • इसमें से पहले से संदाय की गई/वसूली गई अंतरिम प्रतिकर की राशि घटा दी जाएगी।