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सांविधानिक विधि
मासिक धर्म स्वास्थ्य एक मौलिक अधिकार है
« »31-Jan-2026
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डॉ. जया ठाकुर बनाम भारत सरकार और अन्य "मासिक धर्म के सुरक्षित और स्वच्छ प्रबंधन उपायों का अभाव गरिमापूर्ण जीवन को कमजोर करता है।" न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और आर महादेवन |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
डॉ. जया ठाकुर बनाम भारत सरकार और अन्य (2026) के मामले में न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और आर महादेवन की पीठ ने घोषणा की कि मासिक धर्म स्वास्थ्य का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के अधीन प्राण के अधिकार का भाग है और विद्यालयों में मासिक धर्म स्वच्छता उपायों के अखिल भारतीय कार्यान्वयन के लिये व्यापक निदेश जारी किये।
डॉ. जया ठाकुर बनाम भारत सरकार और अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह याचिका जनहित याचिका के रूप में दायर की गई थी जिसमें विद्यालयों में सभी किशोरियों के लिये मुफ्त सैनिटरी नैपकिन और उनके लिये उचित शौचालय सुविधाओं की मांग की गई थी।
- 28 नवंबर, 2022 को भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा की पीठ ने केंद्र सरकार और सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी किया।
- 10 अप्रैल, 2023 को न्यायालय ने केंद्र सरकार को देश में स्कूली छात्रा लड़कियों के लिये मासिक धर्म स्वच्छता पर एक राष्ट्रीय नीति बनाने का निदेश दिया।
- पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला की पीठ ने निदेश दिया कि नीति में विद्यालयों में कम लागत वाले सैनिटरी नैपकिन और सैनिटरी नैपकिन के सुरक्षित निपटान तंत्र को सुनिश्चित किया जाना चाहिये।
- न्यायालय ने कहा कि केंद्र सरकार के तीन मंत्रालय इस मामले से निपटते हैं: स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW), जल शक्ति मंत्रालय और शिक्षा मंत्रालय (MoE)।
- 12 नवंबर, 2024 को, पीठ ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी के माध्यम से केंद्र सरकार को राष्ट्रीय नीति के कार्यान्वयन पर एक कार्य योजना तैयार करने का निदेश दिया।
- भाटी ने सुझाव दिया कि केंद्रीय मंत्रालय को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ समन्वय स्थापित करके संबंधित कार्य योजनाएँ तैयार करनी चाहिये, जिसमें विद्यालयों में सुरक्षित मासिक धर्म स्वच्छता प्रथाओं को बढ़ावा देने के लिये संवेदीकरण और जागरूकता गतिविधियों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिये।
- न्यायालय ने 10 दिसंबर, 2024 को निर्णय सुरक्षित रख लिया था और इसे 30 जनवरी, 2026 को सुनाया गया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
टिप्पणियां:
- न्यायालय ने घोषणा की कि मासिक धर्म स्वास्थ्य का अधिकार अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार का भाग है, यह कहते हुए कि सुरक्षित मासिक धर्म प्रबंधन उपायों की अनुपस्थिति गरिमापूर्ण अस्तित्व को कमजोर करती है और मासिक धर्म वाली लड़कियों की शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन करती है।
- न्यायमूर्ति परदीवाला ने इस बात पर बल दिया कि यह निर्णय उन कक्षाओं के लिये है जहाँ लड़कियाँ सहायता मांगने में हिचकिचाती हैं, उन शिक्षकों के लिये है जो संसाधनों की कमी से विवश हैं, और उन माता-पिता के लिये है जो अपनी चुप्पी के प्रभाव से अनजान हैं, और यह निर्णय हर बच्ची को यह संदेश देता है कि उसके शरीर को भार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिये।
- न्यायालय ने कहा कि खराब मासिक धर्म स्वच्छता से प्रजनन पथ में संक्रमण हो सकते हैं जैसे कि बैक्टीरियल वेजिनोसिस, जिससे बांझपन हो सकता है, इस प्रकार शारीरिक स्वायत्तता के अधिकार का उल्लंघन होता है।
- न्यायालय ने कक्षा 6 से 12 तक की स्कूली छात्राओं के लिये केंद्र सरकार की 'मासिक धर्म स्वच्छता नीति' को अखिल भारतीय स्तर पर लागू करने का निदेश दिया।
न्यायालय के निदेश:
अवसंरचना एवं सुविधाओं के निदेश:
- सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रत्येक विद्यालय (सरकारी या निजी, शहरी या ग्रामीण) में पानी की सुविधा वाले कार्यात्मक लिंग-विभाजित शौचालय हों, जो गोपनीयता और सुलभता के लिये डिज़ाइन किये गए हों, जिनमें दिव्यांग बच्चों के लिये भी सुविधा हो।
- सभी विद्यालय शौचालयों में हर समय साबुन और पानी की उपलब्धता के साथ कार्यात्मक धुलाई सुविधाएँ होनी चाहिये।
- सभी विद्यालयों को शौचालय परिसर के भीतर वेंडिंग मशीनों या निर्दिष्ट स्थानों के माध्यम से मुफ्त ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन (ASTM D-6954 के अनुरूप) उपलब्ध कराना होगा।
- सभी विद्यालयों को मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन कॉर्नर स्थापित करने होंगे जिनमें अतिरिक्त अंडरवियर, यूनिफॉर्म, डिस्पोजेबल पैड और मासिक धर्म की आपात स्थिति के लिये आवश्यक सामग्री उपलब्ध हो।
स्वच्छता अपशिष्ट निपटान निदेश:
- ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमों के अनुसार, सभी विद्यालयों में सैनिटरी नैपकिन के निपटान के लिये सुरक्षित, स्वच्छ और पर्यावरण के अनुकूल व्यवस्था होनी चाहिये।
- प्रत्येक शौचालय इकाई में स्वच्छता सामग्री के लिये ढके हुए कूड़ेदान होने चाहिये, जिनकी नियमित रूप से सफाई और रखरखाव किया जाना चाहिये।
वे चार सांविधानिक प्रश्न कौन से हैं जिनकी परीक्षा की जाती है?
प्रश्न 1: अनुच्छेद 14 (समता का अधिकार) का उल्लंघन
विवाद्यक : क्या लिंग- आधारित पृथक् शौचालयों और मासिक धर्म अवशोषकों की अनुपलब्धता किशोरियों के लिये अनुच्छेद 14 के अधीन समता के अधिकार का उल्लंघन करती है?
उत्तर: अनुच्छेद 14 के अंतर्गत समता के लिये ठोस दृष्टिकोण में संरचनात्मक कमियों को दूर करना आवश्यक है। जिन लड़कियों को मासिक धर्म होता है और वे सैनिटरी पैड नहीं खरीद सकतीं, उन्हें दोहरी कठिनाई का सामना करना पड़ता है: एक तो उन लड़कियों के मुकाबले जो इन्हें खरीद सकती हैं, और लड़कों/जिन लड़कियों को पीरियड्स नहीं आते, उनकी तुलना में। विकलांग लड़कियों को कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। मासिक धर्म स्वच्छता उपायों की कमी जैविक वास्तविकता को संरचनात्मक बहिष्कार में बदल देती है, जिससे लड़कियों के शिक्षा में भाग लेने और अपनी क्षमता को साकार करने के अधिकार में बाधा उत्पन्न होती है।
प्रश्न 2: अनुच्छेद 21 का भाग (प्राण और गरिमा का अधिकार)
विवाद्यक : क्या गरिमापूर्ण मासिक धर्म स्वास्थ्य का अधिकार अनुच्छेद 21 का भाग है?
उत्तर: जी हाँ। अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार में मासिक धर्म स्वास्थ्य का अधिकार भी सम्मिलित है। मासिक धर्म स्वच्छता उपायों की अनुपलब्धता लड़कियों को विद्यालय से अनुपस्थित रहने या असुरक्षित प्रथाओं को अपनाने के लिये विवश करके उनकी गरिमा को ठेस पहुँचाती है, जिससे उनके शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन होता है। निजता गरिमा से जुड़ी है, इसलिये इसकी रक्षा के लिये राज्य की कार्रवाई आवश्यक है। मासिक धर्म के दौरान सोखने वाले पदार्थों की अनुपलब्धता के कारण लड़कियाँ अस्वच्छ सामग्रियों (अखबार, कपड़ा, टिशू पेपर) का उपयोग करने लगती हैं, और खराब मासिक धर्म स्वच्छता के कारण प्रजनन पथ में जीवाणु संक्रमण जैसे संक्रमण हो सकते हैं, जिससे बांझपन की संभावना बढ़ जाती है।
प्रश्न 3: सहभागिता के अधिकार और अवसर की समता का उल्लंघन
विवाद्यक : क्या लिंग- आधारित पृथक् शौचालयों और मासिक धर्म अवशोषकों की अनुपलब्धता अनुच्छेद 14 के अधीन सहभागिता के अधिकार और अवसर की समता का उल्लंघन करती है?
उत्तर: हाँ। मासिक धर्म स्वच्छता उपायों की अनुपलब्धता विद्यालयो में समान रूप से भाग लेने के अधिकार को छीन लेती है। स्वच्छ शौचालयों के अभाव में, लड़कियों को रिसाव और शर्मिंदगी की निरंतर चिंता का सामना करना पड़ता है, जिससे विद्यालय में उनकी उपस्थिति कम हो जाती है। मासिक धर्म के दौरान प्रयोग होने वाले सोखने वाले उत्पादों की कमी के कारण लड़कियों के लिये लंबे समय तक विद्यालय में रहना असंभव हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप होने वाली शैक्षिक अनुपस्थिति एक श्रृंखला का रूप ले लेती है, जिससे भविष्य में जीवन के सभी क्षेत्रों में उनकी सहभागिता सीमित हो जाती है।
प्रश्न 4: अनुच्छेद 21क और शिक्षा का अधिकार अधिनियम का उल्लंघन
विवाद्यक : क्या लिंग-आधारित पृथक् शौचालयों और मासिक धर्म अवशोषकों की अनुपलब्धता अनुच्छेद 21क और निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा अधिनियम 2009 का उल्लंघन करती है?
उत्तर: जी हाँ। शिक्षा का अधिकार एक ऐसा अधिकार है जो अन्य मानवाधिकारों के प्रयोग को भी सक्षम बनाता है। इसके लिये निःशुल्क, अनिवार्य और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा आवश्यक है, जिसमें बच्चों को शिक्षा पूरी करने से रोकने वाले सभी खर्चों को हटाना सम्मिलित है। समता के लिये ठोस दृष्टिकोण यह मांग करता है कि राज्य बाधाओं को दूर करने के लिये कार्रवाई करे। सभी विद्यालयों को और निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा अधिनियम के मानदंडों का पालन करना होगा; अनुपालन न करने पर निजी विद्यालयों की मान्यता रद्द हो सकती है या सरकारी विद्यालयों के लिबा राज्य की जवाबदेही तय हो सकती है। मासिक धर्म स्वच्छता उपायों की अनुपलब्धता व्यवस्थागत बहिष्कार को बढ़ावा देती है, जिससे लड़कियों के विद्यालय में प्रवेश और शिक्षा जारी रखने पर असर पड़ता है, जिसके लिये केवल लैंगिक समता से परे अवसर की समता की आवश्यकता है।
संविधान सभा का अनुच्छेद 21 क्या है?
परिचय:
- अनुच्छेद 21 प्राण और दैहिक स्वतंत्रता की सुरक्षा से संबंधित है। इसमें कहा गया है कि किसी व्यक्ति उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा अन्यथा नहीं।
- जीवन का अधिकार केवल पशुवत अस्तित्व या जीवित रहने तक ही सीमित नहीं है, अपितु इसमें मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार और जीवन के वे सभी पहलू सम्मिलित हैं जो मनुष्य के जीवन को सार्थक, पूर्ण और जीने लायक बनाते हैं।
- अनुच्छेद 21 दो अधिकारों की सुरक्षा करता है:
- प्राण का अधिकार
- दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार
- इस अनुच्छेद को जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा करने वाले प्रक्रियात्मक मैग्ना कार्टा के रूप में वर्णित किया गया है।
- यह मौलिक अधिकार प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह नागरिक हो या विदेशी, को समान रूप से प्राप्त है।
- भारत के उच्चतम न्यायालय ने इस अधिकार को मौलिक अधिकारों का हृदय बताया है ।
- यह अधिकार केवल राज्य के विरुद्ध ही प्रदान किया गया है।
अनुच्छेद 21 के अंतर्गत अधिकार:
- अनुच्छेद 21 के अंतर्गत आने वाले अधिकार निम्नलिखित हैं:
- निजता का अधिकार।
- विदेश जाने का अधिकार।
- आश्रय का अधिकार।
- एकांत कारावास के विरुद्ध अधिकार।
- सामाजिक न्याय और आर्थिक सशक्तिकरण का अधिकार।
- हथकड़ी लगाने के विरुद्ध अधिकार।
- अभिरक्षा में मृत्यु के विरुद्ध अधिकार।
- फाँसी में विलंब के विरुद्ध अधिकार।
- सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण।
- प्रदूषण मुक्त जल और वायु का अधिकार।
- प्रत्येक बच्चे को पूर्ण विकास का अधिकार है।
- स्वास्थ्य और चिकित्सा सहायता का अधिकार।
- शिक्षा का अधिकार।
- विचाराधीन कैदियों का संरक्षण।
निर्णय विधि:
- फ्रांसिस कोराली मुलिन बनाम प्रशासक (1981) के मामले में, न्यायमूर्ति पी. भगवती ने कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 21 में एक लोकतांत्रिक समाज में सर्वोच्च महत्त्व का सांविधानिक मूल्य निहित है।
- खरक सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1963) के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि जीवन शब्द से केवल पशुवत अस्तित्व का ही अर्थ नहीं है। इसके हनन पर रोक उन सभी अंगों और इंद्रियों पर लागू होती है जिनके द्वारा जीवन का आनंद लिया जाता है। यह उपबंध शरीर को विकृत करने, जैसे कि कवचधारी पैर काटना, आँख निकालना या शरीर के किसी अन्य अंग को नष्ट करना जिसके माध्यम से आत्मा बाह्य जगत से संपर्क स्थापित करती है, पर भी समान रूप से प्रतिबंध लगाता है।