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आपराधिक कानून

मृत्युकालिक कथन के साथ हेतु महत्त्वहीन हो जाता है

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 16-Jan-2026

हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम चमन लाल 

"हेतु का महत्त्व मुख्य रूप से परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित मामलों में होता है। जहाँ विश्वसनीय और भरोसेमंद मृत्युकालिक कथन के रूप में प्रत्यक्ष साक्ष्य विद्यमान होता हैवहाँ हेतु के मजबूत साक्ष्य का अभाव अभियोजन पक्ष के मामले के लिये घातक नहीं होता है।" 

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और आर. महादेवन 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम चमन लाल (2025)के मामले में न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और आर. महादेवन की पीठ नेअपनी पत्नी की हत्या के लिये एक व्यक्ति के दण्ड को बहाल करते हुए कहा कि जब स्पष्ट और विश्वसनीय प्रत्यक्ष साक्ष्यजैसे कि मृत्युकालिक कथनविद्यमान होतो हेतु का अभाव अभियोजन पक्ष के लिये घातक नहीं होता है 

हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम चमन लाल (2025) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अभियुक्त (पति) पर अपनी पत्नी को आग लगाने का आरोप लगाया गया थाजिसके कारण उसकी मृत्यु हो गई। 
  • मृतक पत्नी नेएक कार्यपालक मजिस्ट्रेट की उपस्थिति मेंमृत्युकालिक कथन अभिलिखित करायाजिसमें उसने अपने पति का नाम लिया और उस पर उसे आग लगाने का आरोप लगाया। 
  • विचारण न्यायालय ने मृत्युकालिक कथन और अन्य साक्ष्यों के आधार पर प्रत्यर्थी को हत्या का दोषी ठहराया। 
  • 2014 मेंहिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने विचारण न्यायालय के निर्णय को पलटते हुए अभियुक्त को दोषमुक्त कर दिया। 
  • उच्च न्यायालय ने तर्क दिया कि पति-पत्नी के बीच किसी भी लंबित मुकदमे का न होना शत्रुता की कमी को दर्शाता है। 
  • उच्च न्यायालय ने माना कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा है कि अभियुक्त ने ऐसा गंभीर कृत्य क्यों किया होगा। 
  • हिमाचल प्रदेश राज्य ने उच्च न्यायालय के दोषमुक्त करने के आदेश को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय में अपील दायर की। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • पीठ ने उच्च न्यायालय के निर्णय से असहमति जताते हुए कहा किजब अपराध को साबित करने वाले प्रत्यक्ष साक्ष्य विद्यमान हों तो हेतु को साबित करना आवश्यक नहीं है। 
  • न्यायालय ने टिप्पणी की कि "हेतु का महत्त्व मुख्य रूप से परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित मामलों में होता है। जहाँ विश्वसनीय और भरोसेमंद मृत्युकालिक कथन के रूप में प्रत्यक्ष साक्ष्य विद्यमान होवहाँ हेतु के ठोस सबूत का अभाव अभियोजन पक्ष के मामले के लिये घातक नहीं होता।" 
  • चूँकि मृतक का मृत्युकालिक कथन सुसंगत थाजो प्रत्यर्थी के विरुद्ध प्रत्यक्ष साक्ष्य थाइसलिये न्यायालय ने माना कि हेतु साबित करना महत्त्वहीन हो गया। 
  • न्यायालय ने कहा कि अभिलेख पर विद्यमान साक्ष्यों से पता चलता है कि प्रत्यर्थी द्वारा मृतका के साथ बार-बार झगड़ेअपमान तथा मौखिक दुर्व्यवहार किया जाता थाजिसमें उसे "कंजरी" कहना और बार-बार उसे वैवाहिक घर छोड़ने के लिये कहना शामिल था।   
  • मृत्युकालिक कथन में ही निरंतर वैवाहिक कलह और दुर्व्यवहार का जिक्र किया गया थाजिससे अपराध करने के लिये एक विश्वसनीय पृष्ठभूमि तैयार होती है। 
  • न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि "अभियोजन पक्ष को गणितीय सटीकता के साथ हेतु साबित करने की आवश्यकता नहीं है और हेतु को निश्चायक रूप से साबित करने में विफलता अन्यथा विश्वसनीय और ठोस मामले को कमजोर नहीं करती है।" 
  • तदनुसारअपील स्वीकार कर ली गईविचारण न्यायालय के दोषसिद्धि को बहाल कर दिया गया और प्रत्यर्थी को आत्मसमर्पण करने और शेष दण्ड भुगतने का आदेश दिया गया। 

मृत्युकालिक कथन का नियम क्या है? 

  • मृत्युकालिक कथन का सिद्धांत लैटिन सूक्ति"Nemo Moriturus Praesumitur Mentire" (कोई व्यक्ति अपने ईश्वर से झूठ बोलते हुए नहीं मिलेगा) पर आधारित है।यह सिद्धांत मानता है कि आसन्न मृत्यु का सामना कर रहा व्यक्ति झूठ बोलने की संभावना कम रखता हैजिससे ऐसे कथन अत्यंत विश्वसनीय हो जाते हैं।  
  • मृत्युकालिक कथन भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 32(1) के अंतर्गत अनुश्रुत साक्ष्य के नियम का एक महत्त्वपूर्ण अपवाद हैं (अब नए आपराधिक विधि के अधीन यहभारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 26(1) के अंतर्गत आता है)। 
  • मृत्युकालिक कथन उस व्यक्ति द्वारा दिया गया कथन है जिसे लगता है कि उसकी मृत्यु निकट हैऔर यह कथन उसकी आसन्न मृत्यु के कारण या परिस्थितियों के बारे में होता है। साक्ष्य विधि में यह अनुश्रुत साक्ष्य पर आधारित नियम का एक महत्त्वपूर्ण अपवाद है।  
  • तथापि अनुश्रुत साक्ष्य को साक्ष्य के रूप में सामान्यत: अग्राह्य माना हैपरंतु किसी व्यक्ति द्वारा अपनी मृत्यु के कारण या परिस्थितियों के बारे में दिये गए कथन कोग्राह्य साक्ष्यमाना जाता हैभले ही कथन करते समय कथनकर्त्ता को अपनी मृत्यु की उम्मीद थी या नहीं। 
  • ये कथन विभिन्न रूपों में हो सकते हैं - मौखिकलिखितया यहाँ तक कि संकेतों और हावभाव के माध्यम से भी - और विधिक कार्यवाही में इन्हें मूल्यवान साक्ष्य माना जाता है जहाँ मृत्यु के कारण पर प्रश्न उठता है। 

मृत्युकालिक कथन के प्रमुख सिद्धांत क्या हैं? 

  • अनुश्रुत साक्ष्य के नियम का अपवाद: सामान्यतःअनुश्रुत साक्ष्य (दूसरों से प्राप्त जानकारी) न्यायालय में ग्राह्य नहीं होतापरंतु मृत्युकालिक कथन एक उल्लेखनीय अपवाद हैं। 
  • मनोवैज्ञानिक आधार : यह सिद्धांत इस विश्वास पर आधारित है कि आसन्न मृत्यु का सामना कर रहा व्यक्ति असत्य बोलने की संभावना नहीं रखता। विधि यह उपधारणा करती है कि निकटवर्ती मृत्यु की चेतना सत्य कथन हेतु एक प्रबल प्रेरक के रूप में कार्य करती है। 
  • मृत्यु की आशंका की कोई आवश्यकता नहींउद्धृत धारा के अनुसारकथन की ग्राह्यता इस बात पर निर्भर नहीं करती कि कथनकर्त्ता कथन के समय मृत्यु की अपेक्षा के अधीन था या नहीं यह महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह उस पारंपरिक आवश्यकता को समाप्त करता है जो कॉमन लॉ में लागू थी।  
  • व्यापक अनुप्रयोग: मृत्युकालिक कथन का उपयोग "किसी भी प्रकार की कार्यवाही में किया जा सकता है जिसमें उसकी मृत्यु का कारण प्रश्न में आता है," जिसका अर्थ है कि यह सिविल और आपराधिक दोनों कार्यवाही पर लागू होता है। 
  • कथन का स्वरूप: घोषणा लिखित या मौखिक हो सकती हैऔर कुछ न्यायक्षेत्रों में यह हावभाव या संकेतों के माध्यम से भी हो सकती है। 
  • विषयवस्तु संबंधी सीमा: मृत्युकालिक कथन का संबंध मृत्यु के कारण या उस संव्यवहार से संबंधित परिस्थितियों से होना चाहिये जिसके परिणामस्वरूप मृत्यु हुई हो। 
  • शपथ की आवश्यकता नहीं: सामान्य साक्ष्य के विपरीतमृत्युकालिक कथन शपथ लिये बिना भी ग्राह्य होते हैं।