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सिविल कानून

रजिस्ट्री न्यायिक विशिष्ट निर्णयों पर प्रश्न नहीं उठा सकती

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 27-Jan-2026

श्री मुकुंद महेश्वर और अन्य बनाम एक्सिस बैंक लिमिटेड और अन्य 

"रजिस्ट्री न्यायपालिका की अनन्य अधिकारिता में हस्तक्षेप नहीं कर सकती और यह स्पष्टीकरण नहीं मांग सकती कि किसी विशेष पक्षकार को प्रत्यर्थी के रूप में क्यों सम्मिलित किया गया है।" 

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और सतीश चंद्र शर्मा 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

श्री मुकुंद महेश्वर और अन्य बनाम एक्सिस बैंक लिमिटेड और अन्य (2026)के मामले में न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और सतीश चंद्र शर्मा की पीठ नेनिर्णय दिया कि रजिस्ट्री किसी याचिकाकर्त्ता के कुछ पक्षकारों को प्रत्यर्थी के रूप में सम्मिलित करने के निर्णय पर प्रश्न नहीं उठा सकतीइस बात पर बल देते हुए कि ऐसे मामले न्यायपालिका की अनन्य अधिकारिता में आते हैं 

श्री मुकुंद महेश्वर और अन्य बनाम एक्सिस बैंक लिमिटेड और अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह मामला संविधान के अनुच्छेद 226 के अधीन दायर एक रिट याचिका से संबंधित SARFAESI विवाद से उत्पन्न हुआ है। 
  • याचिकाकर्त्ता ने यह आरोप लगाया कि न्यायालय द्वारा नियुक्त आयुक्त ने वित्तीय आस्तियों का प्रतिभूतिकरण और पुनर्गठन तथा प्रतिभूति हित का प्रवर्तन अधिनियम (SARFAESI Act) और उसके अधीन बनाए गए नियमों का उल्लंघन करते हुएसुरक्षित संपत्ति का कब्ज़ा लेने में कपटपूर्ण एवं मिलीभगतपूर्ण आचरण किया 
  • तेलंगाना उच्च न्यायालय रजिस्ट्री नेयाचिका में शामिलप्रार्थना खंड और पक्षकारों की सूची पर आक्षेप उठाया । 
  • उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने रजिस्ट्री के आक्षेपों से सहमत होते हुए रिट याचिका को नामंजूर कर दिया और कागजात वापस करने का निदेश दिया। 
  • प्रक्रियात्मक आधार पर याचिका को नामंजूर करने के उच्च न्यायालय के निर्णय से व्यथित होकर याचिकाकर्त्ता ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने कहा किरजिस्ट्री न्यायपालिका की अनन्य अधिकारिता के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों में हस्तक्षेप नहीं कर सकतीऔर यह स्पष्टीकरण नहीं मांग सकती कि किसी विशेष पक्षकार को प्रत्यर्थी के रूप में क्यों सम्मिलित किया गया है। 
  • न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि याचिकाकर्त्तामुकदमे का स्वामी (dominus litis) होने के नाते, यह तय करने के लिये सशक्त है कि किसे पक्षकार के रूप में सम्मिलित किया जाना है और किसे नहीं। 
  • न्यायालय ने टिप्पणी की कि उच्च न्यायालयसिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश नियम 10 के सिद्धांतों का हवाला देते हुए अनावश्यक पक्षकारों को हटा सकता हैऔर यदि किसी पक्षकार को दुर्भावनापूर्ण तरीके से जोड़ा गया हैतो उच्च न्यायालय न्यायिक पक्ष से स्थिति से उचित ढंग से निपट सकता है। 
  • न्यायालय ने कहा कि "हमें यह देखकर दुख होता है कि उच्च न्यायालय ने अपनी न्यायिक भूमिका का परित्याग कर दिया है"और उच्च न्यायालय द्वारा अपने न्यायिक विवेक का प्रयोग करने में दिखाई गई लापरवाही की ओर इशारा किया। 

न्यायालय के निदेश: 

  • अपीलमंजूर कर ली गई, और रिट याचिका को उच्च न्यायालय के समक्ष पुनर्जीवित किया गया।  
  • रजिस्ट्री द्वारा उठाए गए आक्षेपों को खारिज कर दिया गया हैऔर परिणामस्वरूपविवादित आदेश को अपास्त कर दिया गया है। 
  • इसके परिणामस्वरूप रिट याचिका को पुनर्जीवित किया गयाजिसे विधिवत पंजीकृत किया जाएगा और दोषरहित के रूप में चिह्नित किया जाएगा। 
  • उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को निदेश दिया गया कि वे याचिका को उस पीठ के अतिरिक्त किसी अन्य खंडपीठ के समक्ष सूचीबद्ध करें जिससे विवादित आदेश जारी हुआ था। 
  • नई खंडपीठ द्वारा मामले की विधि के अनुसार सुनवाई की जाएगी 

डोमिनस लिटिस (Dominus Litis) का सिद्धांत क्या है 

परिचय: 

  • डोमिनस लिटिस का सिद्धांतएक लैटिन शब्द हैजिसका शाब्दिक अर्थ "वाद का स्वामीहोता है।  
  • सिविल प्रक्रिया के सिद्धांतों से उत्पन्नयह उस पक्षकार की पहचान करता हैजिसे वाद की कार्यवाही पर नियंत्रण प्राप्त होता है। 
  • डोमिनस लिटिस का सिद्धांत वादी को वाद के पक्षकारों को चुनने का अधिकार देता हैफिर भी यह अधिकार पूर्ण नहीं हैजोसिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के आदेश 1, नियम 10के अधीन है । 
  • न्यायालयअपने विवेकानुसारपक्षकारों को जोड़ या हटा सकता हैयह सुनिश्चित करते हुए कि व्यापक समाधान के लिये सभी आवश्यक पक्षकार उपस्थित हों। 
  • न्यायालय विवाद को सुलझाने में पक्षकारों के प्रत्यक्ष हित और उनके योगदान का आकलन करता हैऔर परिस्थितियों के आधार पर दावों को स्वीकार या अस्वीकार करने का विवेक अपने पास रखता हैकिसी को भी स्वतः पक्षकार बनने का अधिकार नहीं है। 

डोमिनस लिटिस (Dominus Litis) के सिद्धांत का उद्देश्य: 

  • "डोमिनस लिटिस" उस व्यक्ति को संदर्भित करता है जोकिसी विधिक वाद का स्वामी या नियंत्रक होता हैऔर उसके परिणाम में वास्तविक रुचि रखता है। 
    • इस व्यक्ति कोअनुकूल निर्णयसे लाभ हो सकता है या प्रतिकूल निर्णय के दुष्परिणाम वहन करने पड़ते हैं। 
  • यह सिद्धांत ऐसे व्यक्ति पर लागू होता है जोमूल पक्षकार नहोते हुए भी मामले में हस्तक्षेप करता है और एक पक्षकार पर नियंत्रण स्थापित कर लेता हैऔर न्यायालय द्वारा उसे उत्तरदायी पक्षकार के रूप में माना जाता है। 
  • सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 1, नियम 10 के अधीन न्यायालय की शक्तिपक्षकारों को जोड़ने कोनियंत्रित करती हैइस बात पर बल देते हुए कि वादी, "वाद के स्वामी" के रूप मेंकिसी अवांछित पक्षकार के विरुद्ध मुकदमा चलाने के लिये बाध्य नहीं किया जा सकता है। 
  • तथापिन्यायालयव्यापक समाधान सुनिश्चित करने के लिये, औपचारिक आवेदन के बिना भी आवश्यक पक्षकारों कोसम्मिलित करने का आदेश दे सकता है । 
  • डोमिनस लिटिस के सिद्धांत का अनुप्रयोग सावधानीपूर्वक किया जाना चाहियेऔर पक्षकारों को जोड़ने के लिये न्यायालय का अधिकारआदेश 1, नियम 10(2) सिविल प्रक्रिया संहिताके अधीन व्यापक है । 

डोमिनस लिटिस  (Dominus Litis) के सिद्धांत की प्रयोज्यता और अप्रयोज्यता: 

  • प्रयोज्यता: 
    • सिविल प्रक्रिया संहिताकी धारा के अधीनकार्यवाही: 
      • न्यायालय को सिविल प्रक्रिया संहिताकी धारा 92 के अधीन किसी वाद में किसी पक्षकार को प्रतिवादी के रूप में शामिल करने का अधिकार हैजैसा कि किसी अन्य वाद में होता है।  
      • वाद करने का अधिकार सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 1, नियम 10 द्वारा नियंत्रित होता है। 
    • विनिर्दिष्ट पालन का वाद: 
      • विक्रय संविदा के लिये विनिर्दिष्ट पालन का वाद आरंभ करने वाले वादी को डोमिनस लिटिस माना जाता है और उसे उन पक्षकारों को सम्मिलित करने के लिये विवश नहीं किया जा सकता है जिनके विरुद्ध वे वाद नहीं करना चाहते हैंजब तक कि विधिक आवश्यकताओं द्वारा विवश न किया जाए 
  • अप्रयोज्यता: 
    • विभाजन का वाद: 
      • विभाजन वादों में डोमिनस लिटिस का सिद्धांत कठोर रूप से लागू नहीं होता है क्योंकि वादी और प्रतिवादी दोनों सहभागी/सह-स्वामी (sharers) होते हैं 
    • निष्पादन याचिका: 
      • चांगंती लखमी राजयम और अन्य बनाम कोल्ला रामा राव (1998)के मामले मेंयह निर्णय दिया गया था कि सिविल प्रक्रिया संहिता का आदेश नियम 10 वादों और अपीलों के लिये सुसंगत हैकिंतु निष्पादन कार्यवाही पर लागू नहीं होता है 
  • सीमित प्रयोज्यता 
    • वाद-हेतुक: 
      • मोहननकुमारन नायर बनाम विजयकुमारन नायर (2008)के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि डोमिनस लिटिस के सिद्धांत का अनुप्रयोग सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 15 से 18 के अंतर्गत आने वाले वाद-हेतुक तक सीमित है।