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आपराधिक कानून

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175(4)

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 28-Jan-2026

XXX बनाम केरल राज्य और अन्य 

"भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175(4) को लागू करने के संबंध में मजिस्ट्रेटों को व्यापक दिशानिर्देश जारी किये गएजिसमें यह स्पष्ट किया गया कि लोक सेवकों के विरुद्ध अन्वेषण का आदेश देने से पहले वरिष्ठ अधिकारियों की रिपोर्ट कब और कैसे प्राप्त की जानी चाहिये।" 

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और मनमोहन 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और मनमोहन की पीठ ने XXX बनाम केरल राज्य और अन्य (2025)के मामले मेंभारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 175(4) पर मजिस्ट्रेटों को व्यापक दिशानिर्देश जारी कियेजिसमें यह स्पष्ट किया गया कि लोक सेवकों के विरुद्ध अन्वेषण का आदेश देने से पहले वरिष्ठ अधिकारी की रिपोर्ट कब और कैसे मांगी जाए। 

XXX बनाम केरल राज्य और अन्य (2025) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • एक महिला ने अभिकथित किया कि संपत्ति विवाद से संबंधित परिवाद पर कार्रवाई के दौरान पुलिस अधिकारियों ने तीन बार पर उसके साथ लैंगिक उत्पीड़न किया। 
  • पुलिस द्वारा उसके आरोपों को "असत्य" बताते हुए रिपोर्ट दर्ज करने के बादउसने धारा 210 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के साथ धारा 175 के अधीन प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMFC) से संपर्क किया और प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने के निदेश मांगे।     
  • धारा 175(4) का हवाला देते हुए मजिस्ट्रेट नेअभियुक्त पुलिस कर्मियों केवरिष्ठ अधिकारी से रिपोर्ट मंगाई । 
  • जब ये कार्यवाही लंबित थीतब महिला ने रिट याचिका के माध्यम से केरल उच्च न्यायालय का रुख किया। 
  • एकल न्यायाधीश ने याचिका को स्वीकार करते हुए कहा किबलात्कार जैसेगंभीर अपराधों से जुड़े मामलों में धारा 175(4) अनिवार्य नहीं है और मजिस्ट्रेट को प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने का आदेश देने का निदेश दिया।    
  • तथापिउच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के निर्णय को पलट दियायह देखते हुए कि संविधान के अनुच्छेद 226 के अधीन हस्तक्षेप अनुचित था जब मजिस्ट्रेट के समक्ष सांविधिक कार्यवाही पहले से ही लंबित थी। 
  • इसके परिणामस्वरूप उच्चतम न्यायालय में अपील दायर की गई। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • उच्चतम न्यायालय ने खंडपीठ के आदेश की पुष्टि करते हुए कहा कि एकल न्यायाधीश ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175(4) के अनुपालन में वरिष्ठ अधिकारी की रिपोर्ट मांगने के मजिस्ट्रेट के निर्णय में हस्तक्षेप करने में त्रुटी की।  
  • लोक सेवकों के लिये द्विस्तरीय संरक्षण व्यवस्था:  
    न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धारा 175(4) दोहरा संरक्षण प्रदान करती है: 
    • प्रथम,अन्वेषण के प्रक्रम मेंमजिस्ट्रेट को वरिष्ठ अधिकारी से रिपोर्ट मंगानी चाहिये और अभियुक्त लोक सेवक को सुनवाई का अवसर प्रदान करना चाहिये 
    • द्वितीय,संज्ञान लेने के प्रक्रम मेंधारा 218(1) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन मंजूरी की सामान्यत: आवश्यकता होगीकुछ श्रेणियों के अपराधों जैसे लैंगिक अपराधों के लिये सांविधिक अपवादों के अधीन। 
  • "may" का निर्वचन: 
    • न्यायालय ने यह प्रतिपादित किया कि यहाँ “may” को “may” के रूप में ही पढ़ा जाना चाहिएजिसमें विवेकाधिकार निहित हैन कि इसे अनिवार्य (“shall”) के रूप में।  
  • मजिस्ट्रेटों के लिये दिशानिर्देश: 
    धारा 175(4) के अधीन किसी लोक सेवक द्वारा आधिकारिक कर्त्तव्यों के निर्वहन के दौरान किये गए अपराध के आरोप में परिवाद प्राप्त होने परमजिस्ट्रेट निम्नलिखित में से कोई भी कार्य कर सकता है: 
    • विकल्प 1:यदि न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम दृष्टया संतुष्ट है कि कथित कृत्य जिसके कारण अपराध हुआ हैलोक सेवक द्वारा आधिकारिक कर्त्तव्यों के निर्वहन के दौरान हुआ हैतो ऐसे मजिस्ट्रेट के पास वरिष्ठ अधिकारी और अभियुक्त लोक सेवक से रिपोर्ट मंगवाने के लिये धारा 175(4) के अधीन विहित प्रक्रिया का पालन करने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं होगा। 
    • विकल्प 2:जहाँ न्यायिक मजिस्ट्रेट को परिस्थितियों के आधार पर प्रथम दृष्टया संदेह होता है कि क्या लोक सेवक द्वारा कथित रूप से किया गया अपराध आधिकारिक कर्त्तव्यों के निर्वहन के दौरान हुआ थातो ऐसा मजिस्ट्रेट सावधानी बरतते हुए धारा 175(4) में विहित प्रक्रिया का पालन कर सकता है। 
    • विकल्प 3:जहाँ न्यायिक मजिस्ट्रेट संतुष्ट है कि कथित अपराध आधिकारिक कर्त्तव्यों के निर्वहन में नहीं किया गया था और/या इसका उससे कोई उचित संबंध नहीं हैऔर यह भी कि धारा 175(4) की कठोरताएँ लागू नहीं होती हैंतो परिवाद पर धारा 175(3) के अधीन विहित सामान्य प्रक्रिया के अनुसार कार्यवाही की जा सकती है। 
  • तुच्छ परिवादों को नामंजूर करने का अधिकार: 
    • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास किसी लोक सेवक के विरुद्ध धारा 175(3) के अंतर्गत दायर आवेदन को नामंजूर करने का अधिकार बना रहेगायदि मजिस्ट्रेट को लगता है कि उसमें लगाए गए आरोप पूरी तरह निराधारस्पष्ट रूप से बेतुके या इतने असंभावित हैं कोई भी विवेकशील व्यक्ति यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकता कि कोई अपराध प्रकट हुआ है। तथापिनामंजूरी का ऐसा आदेश मनमाने ढंग से या कल्पना मात्र पर आधारित नहीं होना चाहियेअपितु इसके पीछे वैध कारण होने चाहिये 
  • वरिष्ठ अधिकारी की रिपोर्ट प्रस्तुत न करना: 
    • न्यायालय ने उन परिस्थितियों पर विचार किया जहाँ वरिष्ठ अधिकारी युक्तियुक्त समय सीमा के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करने में असफल रहता है। ऐसी दुर्लभ परिस्थितियों मेंन्यायिक मजिस्ट्रेट अनिश्चित काल तक प्रतीक्षा करने के लिये बाध्य नहीं है और यदि अभियुक्त लोक सेवक का कथन धारा 175(4)(ख) के अंतर्गत अभिलेख में उपलब्ध हैतो उस पर विचार करने के बाद धारा 175(3) के अनुसार आगे की कार्यवाही कर सकता है। 'युक्तियुक्त समयक्या होगायह प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। 
  • अनिवार्य शपथ पत्र की आवश्यकता: 
    • निर्णय का एक प्रमुख नियम यह है कि धारा 175(4) का आह्वान करने वाले परिवादों को भी एक शपथ पत्र द्वारा समर्थित होना चाहिये। यद्यपि उपधारा (4) का पाठ केवल "परिवाद" को संदर्भित करता हैन्यायालय ने माना कि इस शब्द को प्रासंगिक रूप से समझा जाना चाहिये और धारा 175(3) के साथ सामंजस्य स्थापित किया जाना चाहियेजो स्पष्ट रूप से एक शपथ पत्र को अनिवार्य करता है।  

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175 क्या है? 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175 - संज्ञेय मामले का अन्वेषण करने की पुलिस अधिकारी की शक्ति:  

  • पुलिस थाने का भारसाधक अधिकारी मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना किसी ऐसे संज्ञेय अपराध अन्वेषण कर सकता है। 
  • इस प्रकार का अन्वेषण उन अपराधों के लिये किया जा सकता है जिसकी जांच या विचारण स्थानीय क्षेत्र पर अधिकारिता रखने वाला न्यायालय कर सकता है। 
  • पुलिस अधीक्षक (SP) अपराध की प्रकृति और गंभीरता को ध्यान में रखते हुएयह निदेश दे सकते हैं कि अन्वेषण को उपपुलिस अधीक्षक (DSP) द्वारा संचालित किया जाए 
  • अन्वेषण की वैधता संरक्षित: 
    किसी पुलिस अधिकारी की कार्यवाही पर केवल इस आधार पर प्रश्न नहीं उठाया जाएगा कि अधिकारी को मामले का अन्वेषण करने का अधिकार नहीं था। 
  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 210 के अधीन सशक्त मजिस्ट्रेट अन्वेषण का आदेश दे सकता है: 
    • धारा 173(4) के अधीन शपथपत्र द्वारा समर्थित आवेदन पर विचार करने के पश्चात्और 
    • आवश्यक समझे जाने वाले अन्वेषण करने और पुलिस अधिकारी द्वारा दी गई जानकारी पर विचार करने के पश्चात् 
  • सरकारी कर्त्तव्यों के निर्वहन के दौरान किसी लोक सेवक के विरुद्ध परिवाद से संबंधित मामलों मेंमजिस्ट्रेट केवल निम्नलिखित स्थितियों के पश्चात् ही अन्वेषण का आदेश दे सकता है: 
    • लोक सेवक के वरिष्ठ अधिकारी से रिपोर्ट प्राप्त करनाऔर 
    • घटना के संबंध में लोक सेवक के कथन/स्पष्टीकरण पर विचार करते हुए। 
  • मुख्य परिवर्तन: 
    भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175, दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 156 का स्थान लेती हैजिससे विशेष रूप से लोक सेवकों से जुड़े मामलों में अतिरिक्त सुरक्षा उपाय पेश किये जाते हैं। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175 द्वारा कौन-कौन से सुरक्षा उपाय लागू किये गए हैं? 

  • विधि की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के उद्देश्य से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 175 के माध्यम से निम्नलिखित नवीन संरक्षणात्मक प्रावधान अधिनियमित किये गए हैं: 
    • प्रथमपुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी द्वारा प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने से इंकार करने पर पुलिस अधीक्षक को आवेदन करने की आवश्यकता को अनिवार्य कर दिया गया हैऔर धारा 175(3) के अधीन आवेदन करने वाले आवेदक को धारा 173(4) के अधीन पुलिस अधीक्षक को किये गए आवेदन की एक प्रति शपथपत्र के साथ प्रस्तुत करनी होगीजबकि धारा 175(3) के अधीन मजिस्ट्रेट को आवेदन करना होगा। 
    • द्वितीयमजिस्ट्रेट को प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने का आदेश देने से पहले ऐसी जांच करने का अधिकार दिया गया है जिसे वह आवश्यक समझता है। 
    • तृतीयमजिस्ट्रेट को धारा 175(3) के अधीन कोई निदेश जारी करने से पहले प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने से इंकार करने के संबंध में पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी के प्रस्तुतीकरण पर विचार करना आवश्यक है। 
  • यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175 (3) वर्षों से न्यायिक निर्णयों द्वारा निर्धारित विधि का परिणाम है। 
  • प्रियंका श्रीवास्तव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2015)के मामले मेंन्यायालय ने निर्णय दिया कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 156(3) के अधीन मजिस्ट्रेट को आवेदन करने से पहलेआवेदक को अनिवार्य रूप से धारा 154(1) और 154(3) के अधीन आवेदन करना होगा। 
    • न्यायालय ने आगे यह भी कहा कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 156(3) के अधीन किये गए आवेदनों के साथ आवेदक द्वारा शपथ पत्र प्रस्तुत करना अनिवार्य है। 
    • न्यायालय द्वारा इस प्रकार की आवश्यकता को लागू करने का कारण यह बताया गया कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 156(3) के अधीन आवेदन नियमित रूप से किये जा रहे थे और कई मामलों में केवल प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करके अभियुक्त को परेशान करने के उद्देश्य से किये जा रहे थे।