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सांविधानिक विधि
अधीनस्थ विधान केवल आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशन की तिथि से ही प्रवर्तनीय होता है
« »22-Jan-2026
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विराज इम्पेक्स प्राइवेट लिमिटेड लिमिटेड बनाम भारत संघ और अन्य "कोई अधिसूचना खंडित अथवा आंशिक रूप से प्रवर्तित नहीं हो सकती। विधि की दृष्टि में उसका जन्म केवल आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशन के साथ ही होता है, और उसी तिथि से अधिकारों को सीमित किया जा सकता है अथवा दायित्त्व अधिरोपित किये जा सकते हैं ।" न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और आलोक आराधे |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
वीराज इम्पेक्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य (2025) के मामले में न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और आलोक अराधे की पीठ ने निर्णय दिया कि अधीनस्थ विधान तब तक बाध्यकारी नहीं होता जब तक कि वह आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित न हो जाए, और यह राजपत्र में प्रकाशन की तारीख है, न कि केवल अधिसूचना जारी करने की तारीख, जो इसे बाध्यकारी बनाती है।
विराज इम्पेक्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य (2025) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- अपीलकर्त्ता इस्पात आयातक थे जिन्होंने 29 जनवरी 2016 और 4 फरवरी 2016 के बीच विदेशी आपूर्तिकर्त्ताओं के साथ संविदा की थी।
- अपीलकर्त्ताओं ने 5 फरवरी 2016 को अपरिवर्तनीय साख पत्र (LCs) खोले।
- उसी दिन (5 फरवरी 2016) विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) ने अपनी वेबसाइट पर न्यूनतम आयात मूल्य (MIP) अधिसूचना अपलोड की, जिस पर "आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित किया जाना है" का उल्लेख था।
- अंततः यह अधिसूचना 11 फरवरी 2016 को भारत के राजपत्र में प्रकाशित हुई।
- अधिसूचना के पैराग्राफ 2 में विदेश व्यापार नीति (FTP) के पैरा 1.05(ख) के अधीन, "इस अधिसूचना की तारीख" से पहले खोले गए अपरिवर्तनीय अपरिवर्तनीय साख पत्र (LCs) के अधीन आयात को छूट प्रदान की गई है।
- विदेश व्यापार नीति (FTP) का पैरा 1.05(ख) किसी भी नए निर्बंधन को लागू करने से पहले संपन्न की गई संविदाओं की रक्षा करता है।
- अधिकारियों ने 5 फरवरी 2016 (वेबसाइट अपलोड करने की तारीख) को "अधिसूचना की तारीख" माना और अपीलकर्ताओं को छूट देने से इनकार कर दिया।
- अधिकारियों ने तर्क दिया कि चूँकि अपरिवर्तनीय साख पत्र (LCs) वेबसाइट पर अपलोड किये जाने के उसी दिन खोले गए थे, इसलिये वे छूट प्रावधान के अधीन संरक्षण के पात्र नहीं थे।
- दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपीलकर्त्ताओं को न्यूनतम आयात मूल्य (MIP) से छूट देने से इंकार करने के प्रत्यर्थी प्राधिकरण के निर्णय को बरकरार रखा।
- दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय से व्यथित होकर इस्पात आयातकों ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने टिप्पणी की कि "एक बार जब विधायिका ने प्रकाशन का विशिष्ट तरीका निर्धारित कर दिया है, तो कार्यपालिका कोई वैकल्पिक तरीका पेश नहीं कर सकती और उस पर विधिक परिणाम नहीं थोप सकती।"
- पीठ ने इस बात पर बल दिया कि "अधिसूचना खंडित रूप से लागू नहीं हो सकती। विधि के अनुसार, यह आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशन के पश्चात् ही प्रभावी होती है, और केवल उसी तिथि से अधिकारों में कटौती की जा सकती है या दायित्त्व अधिरोपित किये जा सकते हैं।"
- न्यायालय ने कहा कि "इसके विपरीत मानना, अप्रकाशित प्रत्यायोजित विधान को नागरिकों पर भार डालने की अनुमति देगा, एक ऐसा प्रस्ताव जिसे इस न्यायालय ने अपने कई निर्णयों में स्पष्ट रूप से नामंजूर कर दिया है।"
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि प्रत्यायोजित विधान, संसद द्वारा पारित पूर्ण विधायी अधिनियम के विपरीत, कार्यपालिका के सदनों में खुली विधायी बहस के बिना तैयार किया जाता है।
- न्यायालय ने कहा कि राजपत्र में प्रकाशन की आवश्यकता दोहरे सांविधानिक उद्देश्य की पूर्ति करता है: (क) यह विधि द्वारा शासित लोगों तक पहुँच और सूचना सुनिश्चित करता है, और (ख) यह प्रत्यायोजित विधायी शक्ति के प्रयोग में जवाबदेही और गंभीरता सुनिश्चित करता है।
- पीठ ने इस बात पर बल दिया कि "राजपत्र में प्रकाशन की आवश्यकता मात्र एक औपचारिकता नहीं है। यह एक ऐसा कार्य है जिसके द्वारा कार्यकारी निर्णय विधि में परिवर्तित हो जाता है।"
- न्यायालय ने कहा कि कई पूर्व निर्णयों में यह बात स्थापित हो चुकी है कि "किसी सांविधिक आदेश या अधीनस्थ विधान के प्रभावी रूप से लागू होने की सही कसौटी यह है कि क्या इसे इस तरह से प्रकाशित किया गया है जिससे उन सभी व्यक्तियों को इसकी सूचना मिल सके जो इससे प्रभावित हो सकते हैं।"
- पीठ ने स्पष्ट किया कि "अभिव्यक्ति 'इस अधिसूचना की तिथि' का अर्थ अनिवार्य रूप से ऐसे प्रकाशन की तिथि होना चाहिये।"
- चूँकि अपीलकर्त्ताओं ने प्रकाशन की तारीख (11 फरवरी 2016) से पहले लेटर ऑफ क्रेडिट का उपयोग किया था, इसलिये न्यायालय ने पाया कि प्रत्यर्थी अधिकारियों के पास उन्हें विदेश व्यापार नीति (FTP) के अधीन छूट का लाभ देने से इंकार करने का कोई कारण नहीं था।
- न्यायालय ने टिप्पणी की कि "अपीलकर्त्ताओं ने 11.02.2016 से पहले अपरिवर्तनीय साख पत्र खोले थे और विदेश व्यापार नीति (FTP) के पैरा 1.05(ख) के अधीन प्रक्रियात्मक आवश्यकताओं का अनुपालन किया था, इसलिये वे उसमें निहित संक्रमणकालीन प्रावधान के लाभ के स्पष्ट रूप से हकदार हैं।"
- उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय को अपास्त कर दिया और अपील को मंजूर करते हुए अपीलकर्त्ताओं को विदेश व्यापार नीति (FTP) के अधीन संरक्षण का हकदार बना दिया।
अधीनस्थ विधान क्या है?
परिभाषा एवं प्रकृति:
- अधीनस्थ विधान वह विधान है जो विधायिका के अधीन किसी प्राधिकरण द्वारा निर्मित किया जाता है; यह संप्रभु शक्ति से भिन्न किसी अन्य प्राधिकारी से उद्भूत होता है तथा अपने निरंतर अस्तित्व एवं वैधता के लिये किसी उच्चतर अथवा सर्वोच्च प्राधिकरण पर निर्भर रहता है।
- अधिकांश अधिनियमों में नियम, विनियम, उपनियम अथवा अन्य सांविधिक साधनों के निर्माण हेतु शक्तियां प्रदान की जाती हैं, जिनका प्रयोग विधायिका द्वारा प्रतिनियुक्त शक्तियों की परिधि के भीतर निर्दिष्ट अधीनस्थ प्राधिकारी करते हैं।
- अधीनस्थ विधान को प्रत्यायोजित विधान के रूप में भी जाना जाता है और इसमें नियम, विनियम, उपनियम, योजनाएँ और अन्य सांविधिक साधन सम्मिलित होते हैं।
- अधीनस्थ विधान में 'अधीनता' का तात्पर्य केवल विधान बनाने वाले प्राधिकरण के स्तर से ही नहीं, अपितु स्वयं विधान की प्रकृति से भी है।
- इस प्रकार की प्रत्यायोजित शक्तियों के अंतर्गत बनाया गया प्रत्यायोजित विधान अनुषंगी होता है और अपनी प्रकृति के अनुसार, यह मूल विधि का स्थान नहीं ले सकता या उसमें संशोधन नहीं कर सकता, न ही यह मूल विधि के समान विवरण निर्धारित कर सकता है।
अधीनस्थ विधान की आवश्यकता:
- आधुनिक सामाजिक-आर्थिक विधानों में विधायिका सामान्यतः मार्गदर्शक सिद्धांत एवं विधायी नीति निर्धारित करती है, परंतु समय की सीमाओं के कारण वह विस्तृत विवरणों में प्रवेश नहीं कर पाती।
- आधुनिक कल्याणकारी राज्य में लचीलापन, अनुकूलनशीलता, शीघ्रता और प्रयोग के अवसर प्राप्त करने के लिये प्रत्यायोजित विधान का प्रावधान किया गया है।
- वर्तमान समय में विधि-निर्माण अत्यधिक जटिल एवं तकनीकी हो गया है, जिससे विधायिका के लिये प्रत्येक विवरण सहित कानून बनाना व्यावहारिक रूप से असंभव हो गया है।
- विधायिका कानून की नीति एवं उद्देश्य निर्धारित करती है और उसके क्रियान्वयन से संबंधित कार्यशील विवरणों को अधिनियम की परिधि में रहते हुए कार्यपालिका, विशेषज्ञों एवं तकनीकी विशेषज्ञों पर छोड़ देती है।
- प्रत्यायोजित विधान, विधि निर्माण की प्रक्रिया में तेजी से एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है और यह विधान का एक महत्त्वपूर्ण घटक है।
- भारत के संविधान के विभिन्न प्रावधानों के अधीन विभिन्न पदाधिकारियों को विभिन्न पहलुओं से संबंधित नियम, विनियम या योजनाएँ बनाने के लिये शक्तियां प्रदान की गई हैं।
प्रत्यायोजित विधान पर विधायिका का नियंत्रण:
- यद्यपि अधीनस्थ विधान, विधान का एक महत्त्वपूर्ण घटक बन गया है, फिर भी इस प्रक्रिया को लोकतांत्रिक सिद्धांतों और संसदीय नियंत्रण के साथ सामंजस्य बिठाना उतना ही महत्त्वपूर्ण है।
- विधि-निर्माण संसद का एक अंतर्निहित और अविभाज्य अधिकार है और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिये कि अधीनस्थ विधान बनाने की आड़ में इस शक्ति का हनन या उल्लंघन न किया जाए।
- प्रत्यायोजित विधान पर नियंत्रण रखने के लिये विधायिका द्वारा विकसित सबसे महत्त्वपूर्ण तंत्र अधीनस्थ विधान समिति का गठन है।
- समिति इस बात की जांच करती है कि संविधान द्वारा प्रदत्त शक्तियां या किसी अधिनियम के अधीन प्रत्यायोजित शक्तियां विधिवत रूप से प्रयोग की गई हैं और क्या वे प्रदत्त या प्रत्यायोजन के दायरे में हैं, न कि उससे बाहर।
- समिति यह सुनिश्चित करती है कि प्रत्यायोजित विधान उन क्षेत्रों में अतिक्रमण न करे जो इसके लिये विहित नहीं हैं और उस क्षेत्र में हस्तक्षेप न करे जो पूरी तरह से स्वयं विधायिका का अधिकार क्षेत्र है।
- ऐसे उदाहरण भी हैं जहाँ अधीनस्थ विधानों के ऐसे अंश, जिनका उद्देश्य मूल विधि के प्रावधानों को प्रतिस्थापित या संशोधित करना था या जिन्होंने स्वयं ही नए कानून बनाने का प्रयास किया था, उन्हें अधिकारातीत (ultra vires) होने के कारण रद्द कर दिया गया था।