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सांविधानिक विधि
भारत में बाल दुर्व्यापार का संकट: सांविधानिक अधिकारों और जमीनी वास्तविकताओं के बीच
«19-Jan-2026
स्रोत: द हिंदू
परिचय
सांविधानिक संरक्षण और विधायी ढाँचों के होते हुए भी, भारत में बाल दुर्व्यापार एक बेहद चिंताजनक वास्तविकता बनी हुई है। उच्चतम न्यायालय ने के.पी. किरण कुमार बनाम राज्य (2025) के मामले में अपने हाल हे के निर्णय में ऐसे अपराधों की रोकथाम हेतु कठोर दिशानिर्देश जारी किये हैं, जिसमें कहा गया है कि दुर्व्यापार संविधान द्वारा प्रदत्त बालकों के जीवन के मौलिक अधिकार का घोर उल्लंघन है।
- राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार, वर्ष 2022 में 18 वर्ष से कम आयु के लगभग 3,098 बच्चों को बचाया गया। इसके अतिरिक्त, अप्रैल 2024 से मार्च 2025 की अवधि के दौरान, भारत भर में बाल श्रम, दुर्व्यापार एवं व्यपहरण से संबंधित मामलों में 53,000 से अधिक बालकों को मुक्त कराया गया। तथापि, वर्ष 2018 से 2022 के मध्य ऐसे अपराधों में दोषसिद्धि की दर मात्र 4.8% रही, जो बचाव कार्यवाहियों और सफल अभियोजन के बीच विद्यमान गंभीर अंतर को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।
के.पी. किरण कुमार बनाम राज्य (2025) मामले में उच्चतम न्यायालय के दिशानिर्देश क्या हैं?
- उच्चतम न्यायालय ने हाल ही में के.पी. किरण कुमार बनाम राज्य मामले में अपने निर्णय में ऐसे अपराधों की रोकथाम हेतु कठोर दिशानिर्देश दिये हैं और कहा है कि मानव दुर्व्यापार संविधान द्वारा प्रत्याभूत बालकों के जीवन के मौलिक अधिकार का घोर उल्लंघन है।
- दिशा-निर्देशों में इस बात पर बल दिया गया है कि पीड़ितों की सामाजिक-आर्थिक संवेदनशीलताओं पर विचार किया जाना अनिवार्य है, विशेषकर उन पीड़ितों के संदर्भ में जो हाशिए पर स्थित समुदायों से आते हैं।
- संविधान में बालकों की सुरक्षा के लिये व्यापक प्रावधान हैं। अनुच्छेद 23 और 24 मानव दुर्व्यापार, भीख मांगने, बलात् श्रम और खतरनाक उद्योगों में नियोजन से संरक्षण प्रदान करते हैं।
- दिशा-निर्देशों में इस बात पर बल दिया गया है कि पीड़ितों की सामाजिक-आर्थिक संवेदनशीलताओं पर विचार किया जाना चाहिये, विशेष रूप से हाशिए पर रहने वाले समुदायों से संबंधित लोगों की संवेदनशीलताओं पर।
बाल दुर्व्यापार क्या है?
अंतर्राष्ट्रीय परिभाषा: पालेर्मो प्रोटोकॉल (Palermo Protocol)
- अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, पलेर्मो प्रोटोकॉल (संयुक्त राष्ट्र का व्यक्तियों के दुर्व्यापार की रोकथाम, दमन एवं दण्ड हेतु प्रोटोकॉल, विशेष रूप से महिलाओं एवं बालकों के संदर्भ में), 2000 बाल दुर्व्यापार को "शोषण के उद्देश्य से किसी बच्चे की भर्ती, परिवहन, स्थानांतरण, आश्रय देना या प्राप्ति" के रूप में परिभाषित करता है।
- “शोषण” शब्द का क्षेत्र व्यापक है, जिसमें शारीरिक एवं लैंगिक शोषण के सभी रूप सम्मिलित हैं। इसके अतिरिक्त, इसमें किसी भी प्रकार की दासता, बंधुआगीरी, दासत्व-समान स्थिति, या अंगों का बलपूर्वक निकालना जैसे किसी भी प्रकार के कृत्य भी सम्मिलित हैं।
भारतीय विधिक ढाँचा: भारतीय न्याय संहिता, 2023:
- वर्तमान में, भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 143 उपबंधित करती है है कि "जो कोई भी शोषण के उद्देश्य से, किसी व्यक्ति या व्यक्तियों को धमकी देकर; बल प्रयोग करके, या किसी अन्य प्रकार के प्रपीड़न से; या अपहरण करके; या प्रवंचना या कपट करके; या अधिकार के दुरुपयोग द्वारा; या किसी प्रकार के प्रलोभन द्वारा, जिसमें ऐसे किसी व्यक्ति को भुगतान या लाभ देना अथवा प्राप्त करना सम्मिलित है, जो भर्ती किये गए, परिवहन किए गए, आश्रयित, स्थानांतरित अथवा प्राप्त किये गए व्यक्ति पर नियंत्रण रखता हो, तो वह दुर्व्यापार का अपराध करता है।”
बालकों के अधिकार क्या हैं?
बारे में:
- भारत का संविधान बालकों के संरक्षण हेतु व्यापक उपबंध करता हैं। अनुच्छेद 23 और 24 मानव दुर्व्यापार, भीख मांगने, बलात् श्रम और खतरनाक उद्योगों में नियोजन से संरक्षण प्रदान करता हैं।
- इन उपबंधों के अतिरिक्त, राज्य का यह दायित्त्व भी है कि वह यह सुनिश्चित करे कि बालकों का शोषण न हो और उन्हें स्वस्थ तरीके से तथा स्वतंत्रता और गरिमा के साथ विकास करने के अवसर और सुविधाएँ प्रदान की जाएं। अनुच्छेद 39 के खण्ड (ङ) और (च) के अधीन उन्हें शोषण और नैतिक एवं भौतिक परित्याग से संरक्षण प्रदान करते हैं।
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धाराएँ 98 एवं 99 विशेष रूप से अवयस्कों की “खरीद एवं बिक्री” से संबंधित अपराधों का संज्ञान लेती हैं। वहीं, लैंगिक शोषण हेतु दुर्व्यापार की रोकथाम अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 के अंतर्गत की जाती है।
विधायी संरक्षण ढाँचा:
- बाल दुर्व्यापार के पीड़ितों की देखरेख, संरक्षण और पुनर्वास का प्रावधान किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के अधीन किया जाता है।
- आपराधिक विधि संशोधन अधिनियम, 2013 का उद्देश्य दुर्व्यापार की अधिक व्यापक परिभाषा प्रदान करके ऐसी क्रियाकलापों पर अंकुश लगाना है, जिसमें लैंगिक शोषण, गुलामी, दासता, बलात् श्रम और अंग प्रत्यारोपण को सम्मिलित किया गया है। यह सम्मति की परवाह किये बिना की गई दुर्व्यापार की भी बात करता है।
- लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम, 2012 का इस संदर्भ में विशेष महत्त्व है। यह अधिनियम यौन उत्पीड़न, लैंगिक हमले एवं बाल अश्लील साहित्य से संबंधित अपराधों को परिभाषित करने के साथ-साथ कठोर दण्ड का प्रावधान करता है, जिनमें कुछ अत्यंत गंभीर मामलों में आजीवन कारावास तथा मृत्युदण्ड तक सम्मिलित है। इस अधिनियम की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह लैंगिक-तटस्थ (Gender Neutral) है। त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के उद्देश्य से, लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के क्रियान्वयन हेतु देशभर में लगभग 400 फास्ट ट्रैक न्यायालय स्थापित किये गए हैं, जिनके लिये प्रति न्यायालय प्रति वर्ष लगभग 165 मामलों के निस्तारण का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
न्यायिक दृष्टिकोण:
- विशाल जीत बनाम भारत संघ (1990) के मामले में में यह अभिधारित किया गया कि दुर्व्यापार एवं बाल वेश्यावृत्ति गंभीर सामाजिक-आर्थिक समस्याएँ हैं; अतः उनसे निपटने हेतु दमनात्मक उपायों के साथ-साथ एक निवारक एवं मानवतावादी दृष्टिकोण अपनाया जाना आवश्यक है।
- सी. मेहता बनाम तमिलनाडु राज्य (1996) के मामले में, न्यायालय ने खतरनाक उद्योगों में बालकों के नियोजन पर प्रतिबंध लगाने के उद्देश्य से विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किये।
- बचपन बचाओ आंदोलन बनाम भारत संघ (2011) मामले में, शीर्ष न्यायालय ने निदेश जारी किये कि पीड़ितों की सामाजिक-आर्थिक संवेदनशीलताओं पर विशेष रूप से विचार किया जाना चाहिये, विशेषकर उन पीड़ितों के संदर्भ में जो हाशिए पर स्थित समुदायों से संबंधित हों।
निष्कर्ष
के.पी. किरण कुमार बनाम राज्य मामले में उच्चतम न्यायालय के दिशानिर्देश भारत में बाल दुर्व्यापार के विरुद्ध लड़ाई में एक महत्त्वपूर्ण कदम हैं, लेकिन 4.8% की चिंताजनक रूप से कम दोषसिद्धि दर यह दर्शाती है कि केवल विधायी और न्यायिक ढाँचे ही इस संकट का समाधान नहीं कर सकते। यद्यपि संविधान अनुच्छेद 23 और 24 के अधीन मौलिक संरक्षण प्रत्याभूत करता है, और लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम और किशोर न्याय अधिनियम जैसी विशेष विधि व्यापक सुरक्षा प्रदान करते हैं, फिर भी विधि और उसके कार्यान्वयन के बीच का अंतर अत्यंत व्यापक है।
आगे बढ़ते हुए, भारत को तीन-सूत्रीय दृष्टिकोण अपनाना होगा: प्रथम, सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों के माध्यम से रोकथाम को सुदृढ़ करना, विशेषकर कमजोर एवं संवेदनशील समुदायों की सुरक्षा सुनिश्चित करना; द्वितीय, प्रभावी अभियोजन सुनिश्चित करने हेतु अन्वेषण की गुणवत्ता में सुधार, साक्षी संरक्षण व्यवस्था को सुदृढ़ करना तथा फास्ट ट्रैक न्यायालयों की न्यायिक क्षमता को सशक्त बनाना; और तृतीय, व्यापक पुनर्वास व्यवस्था प्रदान करना, जिससे मुक्त कराए गए बालकों को पुनर्प्राप्ति एवं सामाजिक पुनःएकीकरण के वास्तविक अवसर प्राप्त हो सकें। जब सांविधानिक अधिकार प्रत्येक बच्चे—विशेषकर हाशिए पर रहने वाले समुदायों के बालकों के लिये वास्तविक जीवन में साकार होंगे, तभी भारत अपने सबसे कमजोर नागरिकों को शोषण से संरक्षण प्रदान करने के अपने सांविधानिक दायित्त्व का पूर्णतः निर्वहन कर सकेगा।