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पर्यावरणीय विधि
न्यायालय द्वारा स्वतः संज्ञान बनाम राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI), नागपुर एवं अन्य (2015)
«03-Jan-2026
परिचय
यह ऐतिहासिक निर्णय राष्ट्रीय राजमार्ग 7 पर राजमार्ग विस्तार की तत्काल आवश्यकता को संबोधित करता है, साथ ही महाराष्ट्र के प्रमुख बाघ अभ्यारण्यों के बीच एक महत्त्वपूर्ण गलियारे में वन्यजीव संरक्षण संबंधी चिंताओं को भी संतुलित करता है।
- बॉम्बे हाई कोर्ट (नागपुर बेंच) ने " NH7 पर 40 जानलेवा मीटर का स्ट्रेच" शीर्षक वाली एक समाचार रिपोर्ट के आधार पर स्वतः संज्ञान लिया, जिसमें दुर्घटनाओं और हताहतों का कारण बनने वाली खतरनाक स्थितियों को उजागर किया गया था।
- इस मामले ने नागरिकों के सुरक्षित बुनियादी ढाँचे के सांविधानिक अधिकार और वन्यजीवों और जंगलों की रक्षा के मौलिक कर्त्तव्य के बीच संतुलन को नियंत्रित करने वाले सिद्धांतों को स्पष्ट किया।
तथ्य
- बॉम्बे हाई कोर्ट (नागपुर बेंच) ने राष्ट्रीय राजमार्ग 7 के एक हिस्से की खतरनाक स्थिति को उजागर करने वाली एक समाचार पत्र रिपोर्ट का संज्ञान लेने के बाद स्वतः संज्ञान लेते हुए कार्यवाही शुरू की।
- मौजूदा राजमार्ग को "मौत का जाल" बताया गया था, जिसके कारण कई दुर्घटनाएँ और मौतें हुई थीं, जिसके चलते न्यायालय ने भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) और अन्य प्रत्यर्थियों के विरुद्ध कार्रवाई का निदेश दिया।
- प्रस्तावित चार लेन वाली परियोजना को भारतीय राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड और राज्य सरकार से वन संरक्षण अधिनियम की धारा 2 के अधीन लंबित अनुमतियों के कारण महत्त्वपूर्ण विलंब का सामना करना पड़ा।
- यह राजमार्ग पेंच टाइगर रिजर्व और कान्हा-ताडोबा रिजर्व के बीच एक महत्त्वपूर्ण वन्यजीव गलियारे को पार करता है, जिससे बाघों और बाइसन सहित लुप्तप्राय प्रजातियों पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में चिंताएँ बढ़ गई हैं।
- वन्यजीव संरक्षण उपायों पर विचार करने के बाद अंततः भारतीय राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड ने परियोजना को मंजूरी दे दी।
- राज्य सरकार ने वन संरक्षण अधिनियम के तहत 9 सितंबर, 2015 को अंतिम अनुमति जारी कर एक बड़ी नियामक बाधा को दूर कर दिया।
- भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने शुरू में अनिच्छा दिखाई लेकिन पर्यावरण और वन मंत्रालय (MoEF) और मुख्य वन संरक्षक (CCF) द्वारा निर्धारित अन्य शर्तों के साथ-साथ 750 मीटर के दो वन्यजीव क्रॉसिंग और 5 मीटर ऊंचाई वाले 300 मीटर के एक क्रॉसिंग के निर्माण सहित व्यापक शमन उपायों को लागू करने पर सहमति व्यक्त की।
सम्मिलित विवाद्यक
- क्या पर्यावरण संबंधी चिंताओं के होते हुए भी चार लेन वाली परियोजना को शीघ्रता से पूरा करने के लिये अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के अधीन नागरिकों के सुरक्षित सड़कों के अधिकार को उचित ठहराया जा सकता है?
- क्या उचित प्रतिपूरक उपायों और वन्यजीव संरक्षण सुरक्षा उपायों के साथ राजमार्ग विस्तार और वृक्ष कटाई का कार्य आगे बढ़ाया जा सकता है?
- क्या नौकरशाही गतिरोध को तोड़ने और महत्त्वपूर्ण अवसंरचना परियोजना के समय पर कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिये न्यायिक हस्तक्षेप आवश्यक था?
न्यायालय की टिप्पणियां
- न्यायालय ने निर्णय दिया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के अधीन नागरिकों को सुरक्षित सड़कों का मौलिक अधिकार है, और विद्यमान राजमार्ग की खतरनाक स्थिति लोक सुरक्षा के लिये तत्काल खतरा उत्पन्न करती है जिसके लिये तत्काल हस्तक्षेप की आवश्यकता है।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि नौकरशाही बाधाओं के कारण परियोजना में अनिश्चितकालीन विलंब हुआ था, और मामले को सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझाने के लिये न्यायालय के न्यायिक हस्तक्षेप के साथ-साथ मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्रियों की भागीदारी को श्रेय दिया।
- न्यायालय ने पाया कि सभी आवश्यक नियामक स्वीकृतियाँ प्राप्त कर ली गई थीं, जिनमें भारतीय राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड से मंजूरी और वन संरक्षण अधिनियम के अधीन राज्य सरकार से अंतिम अनुमति सम्मिलित है।
- न्यायालय ने निर्णय दिया कि राजमार्ग विस्तार और वृक्ष कटाई की अनुमति देते समय प्रतिपूरक उपाय अनिवार्य हैं, और वन्यजीव संरक्षण सुरक्षा उपायों को लागू करने का निदेश दिया।
- न्यायालय ने परस्पर विरोधी हितों को संतुलित करते हुए कहा कि यद्यपि मौलिक कर्त्तव्यों में परिकल्पित वन्यजीवों के लिये चिंता आवश्यक है, लेकिन सड़कें ऐसी स्थिति में नहीं रह सकतीं जहाँ खराब बुनियादी ढाँचे के कारण मनुष्य अपनी जान गंवा दें या गंभीर रूप से घायल हो जाएं।
- न्यायालय ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और केंद्रीय भूतल परिवहन और पर्यावरण मंत्रियों को विशेषज्ञों और हितधारकों के साथ बैठकें करने का निदेश दिया जिससे प्रभावी शमन उपायों को सुनिश्चित किया जा सके, विशेष रूप से वन्यजीव क्रॉसिंग को जो बाघों और बाइसन जैसे जानवरों की निर्बाध आवाजाही की अनुमति देते हैं।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि विकास परियोजनाएं राष्ट्रीय आर्थिक प्रगति के लिये महत्त्वपूर्ण हैं, विशेष रूप से राजमार्ग जो जीवन रेखा के रूप में कार्य करते हैं, जबकि परियोजना कार्यान्वयन में पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों को एकीकृत किया जाना चाहिये।
- इस निर्णय में इस बात पर बल दिया गया कि पर्यावरण और वन मंत्रालय, जो विशेषज्ञता से लैस है, पर्यावरण संबंधी मंजूरी पर निर्णय लेने के लिये उपयुक्त प्राधिकरण है, और न्यायालयों को तब तक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये जब तक कि निर्णय तर्कहीन या विधिविरुद्ध साबित न हो जाएं।
निष्कर्ष
यह ऐतिहासिक निर्णय इस बात को पुष्ट करता है कि अवसंरचना विकास और पर्यावरण संरक्षण परस्पर विरोधी नहीं हैं, अपितु व्यावहारिक शमन उपायों और प्रतिपूरक तंत्रों के माध्यम से इनमें संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।
बॉम्बे उच्च न्यायालय ने व्यापक वन्यजीव संरक्षण उपायों को अनिवार्य करते हुए चार लेन वाली परियोजना को आगे बढ़ाने की अनुमति दी, जिससे सतत विकास के लिये एक पूर्व निर्णय स्थापित हुआ।
इस निर्णय से यह स्थापित होता है कि वन्यजीव संरक्षण के प्रति मौलिक कर्त्तव्यों को पूरा करते हुए अनुच्छेद 21 के अधीन सुरक्षित सड़कों के लिये नागरिकों के सांविधानिक अधिकार का सम्मान किया जाना चाहिये, यह दर्शाता है कि न्यायिक सक्रियता किस प्रकार संतुलित प्रगति को सुगम बना सकती है जो मानव कल्याण और पारिस्थितिक संरक्षण दोनों की पूर्ति करती है।