होम / पर्यावरण विधि
पर्यावरणीय विधि
रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन और अन्य बनाम चंडीगढ़ केंद्र शासित प्रदेश और अन्य (2023)
«26-Dec-2025
परिचय
यह ऐतिहासिक निर्णय चंडीगढ़ के फेज़-I में शहरी नियोजन के उल्लंघनों से संबंधित है, जहाँ अवैध अपार्टमेंट निर्माण ने "कॉर्बुसियन चंडीगढ़" की विरासत स्थिति को खतरे में डाल दिया था।
- उच्चतम न्यायालय ने 16 जनवरी, 2023 को यह निर्णय दिया, जिसमें विरासत स्थलों की रक्षा करते हुए क्रेताओं के हितों की सुरक्षा करने वाले संतुलित सतत विकास पर बल दिया गया।
- इस मामले ने यह उजागर किया कि अधिकारी किस प्रकार उन योजनाओं को मंजूरी दे रहे थे जो अप्रत्यक्ष रूप से उस चीज़ की अनुमति दे रही थीं जो स्पष्ट रूप से निषिद्ध थी, जिससे चंडीगढ़ के यूनेस्को (UNESCO) विरासत शहर के रूप में दर्ज होने पर संभावित रूप से खतरा मंडरा रहा था।
तथ्य
- उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि भवनों/स्थलों में शेयरों का विक्रय सामान्य सिविल विधि के अधीन अनुमेय है, यद्यपि ऐसे विक्रय का विखंडन नहीं माना जाएगा जब तक कि एस्टेट अधिकारी द्वारा स्थायी अलगाव को मान्यता न दी गई हो।
- चंडीगढ़ मास्टर प्लान 2031 ने अपार्टमेंट निर्माण पर प्रतिबंध लगाकर और साथ ही उपलब्ध भूखंडों की तुलना में आवासीय इकाइयों का आकार तीन गुना होने का अनुमान लगाकर एक विरोधाभास उत्पन्न कर दिया है।
- 2007 के नियमों के नियम 16 में अपार्टमेंट में बदलने पर रोक होते हुए भी, अधिकारी ऐसी भवन निर्माण योजनाओं को मंजूरी दे रहे थे जो प्रभावी रूप से एकल आवासीय इकाइयों को तीन अपार्टमेंट में परिवर्तित कर रही थीं।
- अव्यवस्थित विकास ने फेज़-I के विरासत दर्जे को खतरे में डाल दिया, और आवासीय इकाइयों की संख्या में वृद्धि से यातायात और बुनियादी ढाँचे पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों का कोई आकलन नहीं किया गया।
सम्मिलित विवाद्यक
- क्या उच्च न्यायालय ने फेज़-I में आवासीय इकाइयों के विखंडन को सांविधिक नियमों द्वारा स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित किये जाते हुए भी अप्रत्यक्ष अपार्टमेंट निर्माण की अनुमति देने में त्रुटी की?
- क्या भवन निर्माण अधिकारियों ने एकल आवासीय इकाइयों को बहु-अपार्टमेंटों में परिवर्तित करने वाली योजनाओं को मंजूरी देकर 1952 के अधिनियम और 2007 के नियमों का उल्लंघन किया है?
- क्या पर्यावरण प्रभाव आकलन अध्ययन न करना सतत विकास और विरासत संरक्षण के सिद्धांतों का उल्लंघन है?
न्यायालय की टिप्पणियां
- न्यायालय ने पाया कि हेरिटेज कमेटी की मंजूरी के बिना फेज़-I में पुनर्घनीकरण (redensification) की अनुमति देना, "कॉर्बुसियन चंडीगढ़" के विरासत मूल्य की रक्षा करने के CMP-2031 के जनादेश के विपरीत था।
- न्यायालय ने माना कि उच्च न्यायालय ने यह स्वीकार करने में त्रुटी की कि अपार्टमेंट निर्माण निषिद्ध है, फिर भी यह मानना कि एक ही इमारत में तीन अपार्टमेंट का निर्माण अपार्टमेंट निर्माण नहीं है।
- न्यायालय ने पाया कि यह प्रत्यक्ष रूप से निषिद्ध चीज़ को अप्रत्यक्ष रूप से अनुमति देने के समान था, जिससे सांविधिक निर्बंधनों को दरकिनार करने का एक तंत्र तैयार हो गया।
- न्यायालय ने गौर किया कि अधिकारी बिना सोचे-समझे उन भवन निर्माण योजनाओं को मंजूरी दे रहे थे जिनमें स्पष्ट रूप से एकल आवासीय इकाइयों को तीन अपार्टमेंट में परिवर्तित किया जा रहा था।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि इस तरह की अव्यवस्थित वृद्धि फेज़-I की विरासत स्थिति और यूनेस्को में सूचीबद्ध होने की संभावनाओं को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकती है, जिसमें यातायात की भीड़ और बुनियादी ढाँचे पर पड़ने वाले दबाव पर कोई विचार नहीं किया गया है।
- न्यायालय ने माना कि फेज़-I की विरासत स्थिति को ध्यान में रखते हुए, इस मामले को विरासत संरक्षण और सतत विकास सिद्धांतों के परिप्रेक्ष्य से देखा जाना चाहिये था।
निष्कर्ष
- यह ऐतिहासिक निर्णय संरक्षित विरासत क्षेत्रों में मनमाने वाणिज्यिक शोषण के बजाय विरासत संरक्षण और टिकाऊ शहरी विकास के सिद्धांतों को मजबूत करता है।
- उच्चतम न्यायालय ने अपीलों को स्वीकार करते हुए, अप्रत्यक्ष अपार्टमेंटाइजेशन के लिये उच्च न्यायालय की अनुमति को रद्द कर दिया, जबकि निर्दोष घर क्रेताओं के लिये सुरक्षा उपायों को बरकरार रखा।
- इस निर्णय से यह स्थापित होता है कि सांविधिक प्रतिबंधों के ऐसे निर्वचनों के माध्यम से दरकिनार नहीं किया जा सकता है जो अप्रत्यक्ष रूप से उस चीज़ की अनुमति देती हैं जिसे प्रत्यक्ष रूप से स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित किया गया है।
- न्यायालय ने केंद्रीय और राज्य स्तर पर विधायिका, कार्यपालिका और नीति निर्माताओं से शहरी विकास की अनुमति देने से पहले पर्यावरण प्रभाव आकलन अध्ययन को अनिवार्य बनाने की ऐतिहासिक अपील जारी की, जिससे सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच उचित संतुलन सुनिश्चित किया जा सके।