एडमिशन ओपन: UP APO प्रिलिम्स + मेंस कोर्स 2025, बैच 6th October से   |   ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स (प्रयागराज)   |   अपनी सीट आज ही कन्फर्म करें - UP APO प्रिलिम्स कोर्स 2025, बैच 6th October से










होम / गर्भावस्था का चिकित्सीय समापन अधिनियम

आपराधिक कानून

ममता वर्मा बनाम भारत संघ (2017)

    «
 24-Dec-2025

परिचय 

यह ऐतिहासिक निर्णय गंभीर भ्रूण विकृतियोंविशेष रूप से एनेन्सेफैली का सामना कर रही गर्भवती महिलाओं के सांविधानिक अधिकारों को संबोधित करता हैऔर सांविधिक गर्भकालीन सीमाओं से परे गर्भावस्था को चिकित्सकीय रूप से समाप्त करने की अनुमति देने के लिये न्यायिक पूर्व निर्णय स्थापित करता हैजब भ्रूण अव्यवहार्य हो और गर्भावस्था जारी रखना गर्भवती महिला के मानसिक स्वास्थ्य को खतरे में डालता हो। 

तथ्य 

  • 26 वर्षीय ममता वर्मा ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 32 के अधीन उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर करअपनी गर्भावस्था को चिकित्सकीय रूप से समाप्त करने की अनुमति मांगी। 
  • उसके गर्भस्थ भ्रूण में एनेन्सेफैली नामक एक गंभीर तंत्रिका नलिका दोष का निदान किया गया थाजिसमें खोपड़ी की हड्डियां अविकसित रह जाती हैंजिसका कोई इलाज नहीं है और यह जीवन के अनुकूल नहीं हैजिससे जन्म के दौरान या जन्म के तुरंत बाद निश्चित मृत्यु हो जाती है। 
  • इस स्थिति सेमां के जीवन को भी खतराथा और याचिकाकर्ता को अत्यधिक मानसिक पीड़ा हो रही थी। 
  • अगस्त, 2017 कोन्यायालय ने मुंबई के सर जे.जे. ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल्स में एक मेडिकल बोर्ड द्वारा जांच का निदेश दियाजिसका पुनर्गठन करके उसमें डॉ. अशोक आनंद (प्रसूति एवं स्त्रीरोग विभाग के प्रमुख)डॉ. कमलेश जग्याशी (तंत्रिका विज्ञान विभाग के प्रमुख)डॉ. एन.आर. सुते (बाल रोग विभाग के प्रमुख) और डॉ. शिल्पा डोमकुंडवार (रेडियोलॉजी विभाग के प्रमुख) को सम्मिलित किया गया। 
  • मेडिकल बोर्ड ने अगस्त, 2017 को याचिकाकर्त्ता की परीक्षा की और पाया कि वह अपनी गर्भावस्था के 25 सप्ताह और दिन की गर्भवती थी। 
  • याचिकाकर्त्ता को अपने निर्णय लेने में अपने पति का समर्थन प्राप्त थाऔर दोनों भ्रूण की असामान्यता और भ्रूण की मृत्यु के उच्च जोखिम को समझते थे। 

सम्मिलित विवाउद्यक 

  • क्या उच्चतम न्यायालय को गर्भावस्था की सांविधिक सीमा से परे गर्भ के चिकित्सीय समापन की अनुमति देनी चाहियेजब भ्रूण में जीवन के लिये असंगत घातक असामान्यता का निदान किया जाता है? 
  • क्या किसी अविकसित भ्रूण के साथ गर्भावस्था जारी रखनाजिससे गर्भवती महिला को गंभीर मानसिक क्षति पहुँचती हैसंविधान के अनुच्छेद 32 के अधीन न्यायिक हस्तक्षेप को उचित ठहराता है? 
  • गंभीर भ्रूण संबंधी असामान्यताओं से जुड़े मामलों मेंजो विधिक सीमाओं से परे हैंगर्भ के समापन की अनुमति दी जानी चाहिये या नहींयह निर्धारित करने में मेडिकल बोर्ड की राय की क्या भूमिका होनी चाहिये? 

न्यायालय की टिप्पणियां 

चिकित्सा संबंधी साक्ष्य और भ्रूण की जीवित रहने की संभावना: 

  • न्यायालय ने पाया कि भ्रूण में खोपड़ी नहीं थी और वह गर्भाशय के बाहर जीवित नहीं रह सकता था। एनेन्सेफैली की स्थिति जीवन के अनुकूल नहीं हैइसलिये गर्भावस्था को जारी रखना चिकित्सकीय रूप से व्यर्थ है।  

मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव: 

  • चिकित्सा बोर्ड ने निष्कर्ष निकाला कि गर्भावस्था जारी रखने से याचिकाकर्त्ता को गंभीर मानसिक क्षति पहुँचेगी। न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ता को अविकसित भ्रूण को पूर्ण अवधि तक गर्भ में रखने के लिये मजबूर करने से उसे अत्यधिक मानसिक पीड़ा होगी। 

चिकित्सा सुरक्षा: 

  • मेडिकल बोर्ड ने बताया कि यदि याचिकाकर्त्ता इस स्तर पर गर्भपात कराती है तो उसके जीवन को कोई अतिरिक्त खतरा नहीं है। 

न्यायिक दृष्टिकोण: 

  • न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि न्याय के हित मेंविशेष रूप से गर्भवती महिला के मानसिक स्वास्थ्य और अविकसित भ्रूण के साथ गर्भावस्था को जारी रखने की निरर्थकता को ध्यान में रखते हुएगर्भ का चिकित्सीय समापन अधिनियम, 1971 के अधीन गर्भपात की अनुमति दी जानी चाहिये 

निर्णयाधार: 

  • इस निर्णय ने यह स्थापित किया कि जब किसी भ्रूण में जीवन के लिये असंगत घातक असामान्यताओं का निदान किया जाता है और गर्भावस्था जारी रखने से गर्भवती व्यक्ति को गंभीर मानसिक क्षति पहुँचती हैतो न्यायालय न्याय और गर्भवती व्यक्ति के सांविधानिक अधिकारों के हित मेंविशेषज्ञ चिकित्सा बोर्ड की राय के मार्गदर्शन मेंअनुच्छेद 32 के अधीन सांविधिक गर्भकालीन सीमाओं से परे चिकित्सीय समापन की अनुमति दे सकते हैं। 

निष्कर्ष 

उच्चतम न्यायालय ने याचिका स्वीकार करते हुए याचिकाकर्त्ता को गर्भपात कराने की अनुमति दी। गर्भपात की प्रक्रिया उसी अस्पताल के डॉक्टरों द्वारा की जानी थी जहाँ याचिकाकर्त्ता की चिकित्सा परीक्षा हुई थी। यह प्रक्रिया मेडिकल बोर्ड की देखरेख में संपन्न होनी थीजिसे प्रक्रिया का पूरा रिकॉर्ड रखने का निदेश दिया गया था। यह निर्णय गंभीर भ्रूण विकृतियों के कारण अव्यवहार्य गर्भावस्था का सामना कर रही गर्भवती महिलाओं की प्रजनन स्वायत्तता और मानसिक स्वास्थ्य के सांविधानिक संरक्षण को सुदृढ़ करता है।