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अंतर्राष्ट्रीय नियम
भारत-अमेरिका व्यापार समझौता 2026
«16-Feb-2026
स्रोत: द हिंदू
चर्चा में क्यों?
अमेरिका ने भारतीय वस्तुओं पर प्रभावी शुल्क को घटाकर 18% कर दिया है, जो पहले 50% के चौंका देने वाले स्तर पर था (जिसमें दण्डात्मक शुल्क भी शामिल थे)। यह समझौता व्यापार तनाव को कम करने की दिशा में एक रणनीतिक कदम है और भारत को अमेरिका के प्रमुख सहयोगी और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के महत्त्वपूर्ण प्रतिसंतुलन के रूप में स्थापित करता है।
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की प्रमुख विशेषताएं क्या हैं?
शुल्क में कमी:
- अमेरिका ने भारतीय आयात पर पारस्परिक शुल्क को 25% से घटाकर 18% कर दिया है।
- महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अतिरिक्त 25% दण्डात्मक टैरिफ (जो भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद के कारण अगस्त 2025 में अधिरोपित किया गया था) को प्रभावी रूप से हटा दिया गया है, जिससे कुल प्रभावी टैरिफ लगभग 50% से घटकर 18% हो गया है।
भारत की प्रतिबद्धताएँ:
- ऊर्जा में परिवर्तन: भारत ने रूसी कच्चे तेल की खरीद को रोकने/उल्लेखनीय रूप से कम करने पर सहमति व्यक्त की है।
- भारत अपनी ऊर्जा खरीद को अमेरिका तथा संभावित रूप से वेनेजुएला की ओर पुनर्निर्देशित करेगा।
- बाजार पहुँच: भारत से अपेक्षा की जा रही है कि वह अमेरिकी वस्तुओं पर लगाए गए अपने शुल्क (टैरिफ) तथा गैर-शुल्क बाधाओं को घटाकर “शून्य” स्तर तक ले आए।
- अमेरिका को यह अपेक्षा है कि भारत के विशाल उपभोक्ता बाजार में कृषि उत्पादों (मेवे, कपास और सोयाबीन तेल) के निर्यात में भारी वृद्धि होगी।
- "बाय अमेरिकन" नीति: भारत ने सरकारी और बड़े पैमाने पर औद्योगिक खरीद के लिये "बाय अमेरिकन" के मजबूत रुख के प्रति प्रतिबद्धता जताई है।
- भारत अमेरिका से 500 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य की ऊर्जा, कोयला, प्रौद्योगिकी, कृषि और अन्य उत्पाद खरीद सकता है।
भारत-अमेरिका टैरिफ के विकास की पृष्ठभूमि
18% टैरिफ तक पहुँचने का रास्ता आक्रामक "संव्यवहार संबंधी कूटनीति" से भरा हुआ था:
- "टैरिफ किंग" कथानक: अमेरिका ने ऐतिहासिक रूप से भारत के उच्च आयात शुल्कों की आलोचना की है। 2025 के मध्य में, अमेरिका ने भारत की औसत दरों के समान 25% का पारस्परिक टैरिफ अधिरोपित किया।
- रूसी तेल विवाद: यूक्रेन संघर्ष के दौरान भारत द्वारा रूसी कच्चे तेल की निरंतर खरीद के बाद, अमेरिका ने अगस्त 2025 में 25% का दण्डात्मक "अतिरिक्त शुल्क" जोड़ दिया, जिससे कुल टैरिफ 50% हो गया।
- ऑपरेशन सिंदूर और क्षेत्रीय प्रभाव: खबरों के अनुसार, भारत द्वारा पाकिस्तान में आतंकवादी ठिकानों के विरुद्ध चलाए गए ऑपरेशन सिंदूर (मई 2025) के बाद अमेरिका ने क्षेत्रीय स्थिरता के लिये एक रणनीतिक उपकरण के रूप में टैरिफ दबाव का प्रयोग किया, और बाद में दावा किया कि व्यापारिक प्रभाव ने युद्धविराम (ceasefire) को आगे बढ़ाने में सहायता की।
- समझौते से पहले भारत के कदम: संबंधों में नरमी लाने के लिये, भारत ने अपने केंद्रीय बजट में भारी मोटरसाइकिलों और बोरबन व्हिस्की जैसी वस्तुओं पर शुल्क में पहले ही कटौती कर दी थी और परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को खोलने के लिये शांति अधिनियम, 2025 पारित किया था।
भारत-अमेरिका व्यापार संबंध
- वित्त वर्ष 2025 में भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार रिकॉर्ड 132 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया, जबकि वित्त वर्ष 2024 में यह 119.71 अरब अमेरिकी डॉलर था। वित्त वर्ष 2025 में भारत का अमेरिका के साथ व्यापार अधिशेष 40.82 अरब अमेरिकी डॉलर रहा।
- भारत द्वारा अमेरिका से आयात की जाने वाली वस्तुओं में मुख्य रूप से खनिज ईंधन और तेल, कीमती और अर्ध-कीमती पत्थर और धातुएँ, परमाणु रिएक्टर और मशीनरी, और विद्युत उपकरण शामिल थे।
- भारत से अमेरिका को होने वाले निर्यात में विद्युत मशीनरी, बहुमूल्य और अर्ध-बहुमूल्य पत्थर और धातुएँ, औषधीय उत्पाद, मशीनरी और यांत्रिक उपकरण, खनिज ईंधन और लोहा और इस्पात की वस्तुएँ प्रमुख थीं।
- अमेरिका भारत में तीसरा सबसे बड़ा निवेशक है, जिसने 2000 से 2025 तक कुल 70.65 बिलियन अमेरिकी डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश किया है।
- अमेरिका-भारत समझौता (COMPACT) 2025 में शुरू किया गया था। इस ढाँचे के अधीन, द्विपक्षीय व्यापार को 2030 तक 500 अरब अमेरिकी डॉलर तक बढ़ाने के लिये 'मिशन 500' पहल शुरू की गई थी, जिसे द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) के लिये बातचीत द्वारा समर्थित किया गया था।
भारत-अमेरिका टैरिफ युक्तिकरण का क्या महत्व है?
भारत के लिये:
- भारतीय निर्यात को प्रोत्साहन: 18% की कटौती से भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मकता बहाल हुई है। कपड़ा, परिधान और फार्मास्यूटिकल्स जैसे क्षेत्रों में ऑर्डर में तत्काल वृद्धि होने की उम्मीद है।
- प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त: 18% की दर के साथ, भारत अब वियतनाम (20%), बांग्लादेश (20%) और चीन (30-35%) जैसे क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धियों की तुलना में अधिक अनुकूल दर का सामना कर रहा है।
- आर्थिक स्थिरता: यह समझौता व्यापार युद्ध की अनिश्चितता को दूर करता है, जिससे रुपए में स्थिरता आने की संभावना है और भारतीय विनिर्माण क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को प्रोत्साहन मिलेगा।
अमेरिका के लिये:
- परमाणु एवं प्रौद्योगिकी निर्यात: यह समझौता अमेरिकी कंपनियों के लिये भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र (शांति अधिनियम, 2025 द्वारा सक्षम) और रक्षा विनिर्माण में प्रवेश करने का मार्ग प्रशस्त करता है, जिससे "महत्त्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकी पर अमेरिका-भारत पहल (iCET)" को और मजबूती मिलती है।
- डेटा सेंटर का दबदबा: भारत में डेटा सेंटर स्थापित करने वाली विदेशी कंपनियों को दी जाने वाली कर छूट से गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और अमेज़ॅन जैसी अमेरिकी तकनीकी दिग्गज कंपनियों को सीधा लाभ मिलता है।
- ऊर्जा निर्यात: भारत के रूस से दूर हटने के साथ, अमेरिकी ऊर्जा क्षेत्र (तेल, LNG, कोयला) को एक विशाल, दीर्घकालिक ग्राहक प्राप्त होता है, जिससे अमेरिकी शेल तेल उत्पादकों और LNG निर्यातकों को सीधा लाभ होता है।
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते 2026 की चुनौतियाँ क्या हैं?
- सामरिक स्वायत्तता: रूसी तेल आपूर्ति पर रोक लगाने से भारत के सबसे बड़े रक्षा आपूर्तिकर्ता के साथ संबंध तनावपूर्ण हो गए हैं; यह भारत की बहुआयामी विदेश नीति को चुनौती देता है।
- संव्यवहार संबंधी कूटनीति: प्रत्येक रणनीतिक रियायत के बदले में भारी आर्थिक या राजनीतिक "प्रतिफल" की मांग हो सकती है - यह एक खतरनाक पूर्व निर्णय है।
- चीन की जवाबी कार्रवाई: दुर्लभ धातुओं और अन्य कार्बनिक पदार्थों पर भारत की निर्भरता इसे जवाबी व्यापार बाधाओं के प्रति संवेदनशील बनाती है।
- क्षेत्रीय समानता का अंतर: बांग्लादेश और वियतनाम ने GSP में लगभग 5% की बढ़त बरकरार रखी है, जो भारत ने 2019 में खो दी थी - प्रतिस्पर्धा का मैदान पूरी तरह से समतल नहीं है।
- आर्थिक जोखिम: शून्य टैरिफ वाले अमेरिकी कृषि आयात ग्रामीण आजीविका को खतरे में डालते हैं; रियायती रूसी तेल से हटकर अन्य स्रोतों पर जाने से चालू खाता घाटा (CAD) बढ़ता है।
- तकनीकी बाधाएँ: अमेरिकी SPS मानक भारतीय खाद्य और फार्मा निर्यात के लिये छिपी हुई बाधाएँ बने हुए हैं; IPR संरेखण से स्वास्थ्य देखरेख लागत बढ़ सकती है।
- डिजिटल व्यापार: "मुक्त डेटा प्रवाह" के लिये अमेरिका की मांग डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (DPDP Act), 2023 और भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा ढाँचे के साथ संघर्ष उत्पन्न करती है।
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के संदर्भ में विधिक उपबंध क्या हैं?
- विश्व व्यापार संगठन (WTO) - सर्वोपरि राष्ट्र (MFN) सिद्धांत (GATT का अनुच्छेद 1):
- यदि भारत अमेरिकी वस्तुओं पर शुल्क घटाकर "शून्य" कर देता है, तो उसे सभी विश्व व्यापार संगठन (WTO) सदस्यों के साथ समान व्यवहार करना होगा - जब तक कि यह समझौता संधि के अनुच्छेद 24 के अधीन मुक्त व्यापार क्षेत्र या सीमा शुल्क संघ के रूप में योग्य न हो। भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि यह समझौता अनुच्छेद 24 की आवश्यकताओं (लगभग सभी व्यापार को शामिल करना; उचित समय के भीतर शुल्क समाप्त करना) को पूरा करता है जिससे तीसरे देशों द्वारा विश्व व्यापार संगठन (WTO) में किसी भी चुनौती से बचा जा सके।
- विश्व व्यापार संगठन (WTO) कृषि समझौता (AoA):
- यह समझौता कृषि उत्पादों के लिये घरेलू समर्थन, निर्यात सब्सिडी और बाजार पहुँच पर बाध्यकारी नियम लागू करता है। कृषि व्यापार समझौते के अधीन किसी भी कृषि बाजार को खोलने की प्रक्रिया में भारत की समग्र समर्थन उपाय (AMS) प्रतिबद्धताओं और विशेष सुरक्षा प्रावधानों को संरक्षित रखा जाना चाहिये।
- TRIPS करार:
- बौद्धिक संपदा संरक्षण के लिये न्यूनतम मानक निर्धारित करता है। BTA को संसदीय अनुमोदन के बिना भारत की बहुपक्षीय प्रतिबद्धताओं से अधिक TRIPS-प्लस दायित्त्वों को लागू नहीं करना चाहिये, विशेष रूप से दवा पेटेंट और डेटा विशिष्टता के संबंध में।
- विश्व व्यापार संगठन (WTO) द्वारा स्वच्छता और पौध स्वच्छता उपायों पर समझौता (SPS करार):
- यह खाद्य सुरक्षा तथा पौध/पशु स्वास्थ्य से संबंधित उपायों को विनियमित करता है। अमेरिकी SPS मानक भारतीय खाद्य निर्यात के लिये गैर-शुल्क बाधाओं के रूप में कार्य करते हैं; अतः BTA में पारस्परिक मान्यता अथवा सामंजस्य संबंधी प्रावधान सम्मिलित किये जाने चाहिये, जिससे केवल टैरिफ कटौती से आगे बढ़कर भारतीय निर्यातकों को वास्तविक बाजार पहुँच प्राप्त हो सके।
विकसित भारत के लिये 'भारत-अमेरिका व्यापार धुरी' का लाभ कैसे उठाया जाए?
- वित्तीय फिसलन के बिना ऊर्जा सुरक्षा के लिये ग्रीन हाइड्रोजन मिशन और SMRs को गति प्रदान करें।
- खाड़ी देशों और पूर्वी एशिया के साथ मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) को तेजी से आगे बढ़ाएँ जिससे अमेरिकी खरीदारों पर अत्यधिक निर्भरता कम हो सके।
- "शून्य टैरिफ" का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन करें; प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिये सामंजस्यपूर्ण नियामक मानकों के साथ BTA को अंतिम रूप दें।
- 18% टैरिफ छूट का उपयोग असेंबली से डीप मैन्युफैक्चरिंग की ओर बढ़ने के लिये करें — "मेक इन इंडिया" के अधीन चीन से बाहर निकल रही आपूर्ति श्रृंखलाओं को आकर्षित करें।
- कृषि उत्पादों के लिये विशिष्ट सुरक्षा उपाय अपनाएं; कच्चे माल की तुलना में मूल्यवर्धित कृषि निर्यात को बढ़ावा दें।
- AI, अंतरिक्ष और सेमीकंडक्टर सहयोग के लिये iCET का लाभ उठाएं; फार्मा क्षेत्र में जनहित में बौद्धिक संपदा अधिकार छूट को बरकरार रखें।
निष्कर्ष
18% टैरिफ एक "रणनीतिक अवसर" है। भारत की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह अमेरिकी समर्थन के इस दौर का लाभ उठाकर आत्मनिर्भर विनिर्माण आधार (आत्मनिर्भर भारत) का निर्माण कर सके, जो भू-राजनीतिक परिस्थितियों में परिवर्तन आने पर भी वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम हो। इस समझौते के आधारभूत विधिक ढाँचे - संविधान के अनुच्छेद 73 और अनुच्छेद 253 से लेकर सीमा शुल्क टैरिफ अधिनियम, GATT के अनुच्छेद 24 और डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (DPDP Act) अधिनियम तक - का सुदृढ़ उपयोग किया जाना चाहिये जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि भारत की प्रतिबद्धताओं को विधायी जवाबदेही, लोकतांत्रिक निगरानी और सांविधानिक अधिकारों के पूर्ण संरक्षण के साथ लागू किया जाए।
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