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आपराधिक कानून
एक ही गाँव में निवास करना पैरोल से इंकार करने के लिये पर्याप्त नहीं है
«20-Mar-2026
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नारायण बनाम राजस्थान राज्य और अन्य "आपराधिक न्याय प्रणाली को निराधार और अटकलबाजीपूर्ण अनुमानों के आधार पर संचालित नहीं किया जा सकता। जब तक वास्तविक और आसन्न खतरे को इंगित करने वाली कोई ठोस सामग्री विद्यमान न हो, तब तक इस तरह की सामान्य आशंका के आधार पर पैरोल से इंकार करना उचित नहीं होगा।" न्यायमूर्ति फरजंद अली और न्यायमूर्ति संदीप शाह |
स्रोत: राजस्थान उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
राजस्थान उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ जिसमें न्यायमूर्ति फरजंद अली और न्यायमूर्ति संदीप शाह शामिल थे, ने नारायण बनाम राजस्थान राज्य और अन्य (2026) के मामले में पैरोल की नामंजूरी को चुनौती देने वाली याचिका को स्वीकार कर लिया और कुछ शर्तों के अधीन दोषी को छोड़ने का निदेश दिया।
- न्यायालय ने निर्णय दिया कि केवल इस तथ्य के आधार पर कि एक दोषी और पीड़ित एक ही गाँव में और निकटता में रहते हैं, पैरोल का लाभ देने से इंकार करना पर्याप्त नहीं हो सकता। वास्तविक और तत्काल खतरे को दर्शाने वाले ठोस सबूतों के बिना सामान्य आशंका के आधार पर पैरोल से इंकार करना अनुमान पर आधारित और पैरोल के विधिशास्त्र के अंतर्निहित सुधारात्मक दर्शन के विपरीत पाया गया।
नारायण बनाम राजस्थान राज्य और अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- याचिकाकर्त्ता, जो एक दोषी है, ने पैरोल के लिये आवेदन प्रस्तुत किया जिसे अधिकारियों ने नामंजूर कर दिया।
- याचिका खारिज करने का आधार यह था कि पीड़िता और दोषी एक ही गाँव में और एक-दूसरे के बहुत करीब रहते थे, और उसकी रिहाई से पीड़िता और उसके परिवार की सुरक्षा को खतरा था।
- इस नामंजूरी से व्यथित होकर याचिकाकर्त्ता ने उक्त आदेश को चुनौती देते हुए राजस्थान उच्च न्यायालय का रुख किया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने माना कि केवल इस आधार पर कि दोषी और पीड़ित एक ही गाँव में रहते हैं, खतरे की आशंका पैरोल से पूर्णतः इंकार करने का औचित्य नहीं हो सकती। जब तक वास्तविक और तत्काल खतरे को साबित करने के लिये ठोस सबूत विद्यमान न हों, ऐसी सामान्य आशंका केवल अनुमान मात्र है।
- न्यायालय ने आगे कहा कि पैरोल के दौरान किसी दोषी को किसी अज्ञात स्थान पर रहने का निदेश देना पूरी तरह से अव्यावहारिक है और इससे पैरोल का औचित्य सिद्ध नहीं होता। न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि परिवार से दोबारा संपर्क होने से दोषी में आत्मनिरीक्षण और उत्तरदायित्त्व की भावना उत्पन्न होती है, जो पैरोल के सुधारात्मक उद्देश्य के अनुरूप आत्म-सुधार के लिये एक सशक्त प्रोत्साहन का काम करती है।
- तदनुसार याचिका को मंजूर कर लिया गया, और छोड़ने को कठोर शर्तों के अधीन रखा गया, जिनका उद्देश्य पैरोल के सुधारात्मक उद्देश्य को बनाए रखते हुए पीड़ित की सुरक्षा करना था।
पैरोल क्या है?
बारे में:
- पैरोल किसी कैदी को उसके दण्ड पूरा होने से पूर्व सशर्त और अस्थायी रूप से छोड़ना है, जो सामान्यत: पैरोल अधिकारी की देखरेख में होता है।
- सामान्यत: इन शर्तों में नियमित रूप से हाजिरी लगाना, नियोजन बनाए रखना या शैक्षिक कार्यक्रमों में भाग लेना और आपराधिक क्रियाकलापों से दूर रहना शामिल होता है।
- यह अनुदान अच्छे व्यवहार, अपराध की प्रकृति और पुनर्वास की संभावना जैसे कारकों के आधार पर दिया जाता है।
- यह निगरानी में रहते हुए भी समाज में धीरे-धीरे पुनः एकीकरण की अनुमति देता है।
- पैरोल की शर्तों का उल्लंघन करने पर व्यक्ति को शेष दण्ड काटने के लिये वापस जेल भेज दिया जाता है।
उद्देश्य:
- पारिवारिक संबंधों को बनाए रखने में सहायता करना और परिवार से संबंधित मामलों का समाधान करना।
- कैदी के स्वास्थ्य पर दीर्घकालीन कारावास के प्रतिकूल प्रभावों को कम करना।
- कैदी में आत्मविश्वास बढ़ाना।
- सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करना और जीवन में सक्रिय भागीदारी को प्रोत्साहित करना।
पैरोल के प्रकार:
- अभिरक्षा में पैरोल: मृत्यु या परिवार के किसी सदस्य के विवाह जैसे आपातकालीन परिस्थितियों में 14 दिनों तक के लिये पैरोल दी जाती है। यह सुविधा विदेशियों और मृत्युदण्ड प्राप्त कैदियों को छोड़कर सभी दोषी व्यक्तियों के लिये उपलब्ध है।
- नियमित पैरोल: यह उन अपराधियों के लिये उपलब्ध है जिन्होंने कम से कम एक वर्ष का दण्ड पूरा कर लिया है, और अधिकतम एक महीने के लिये, विवाह, दुर्घटना, मृत्यु, बीमारी या परिवार में बच्चे के जन्म जैसे आधारों पर।
विधिक उपबंध:
- पैरोल का संचालन कारागार अधिनियम, 1894 और बंदी अधिनियम, 1900 के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा किया जाता है, जिसमें अलग-अलग राज्य अपने स्वयं के दिशानिर्देश तैयार करते हैं।
- महाराष्ट्र में, कारागार (बॉम्बे फरलो और पैरोल) नियम, 1959 शासी ढाँचा प्रदान करते हैं।
- सुनील फुलचंद शाह बनाम भारत संघ (2000) के मामले में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पैरोल धारा 432 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन दण्ड के निलंबन के समान नहीं है।
जमानत और पैरोल में क्या अंतर हैं?
- भारतीय विधि में, पैरोल और जमानत अलग-अलग विधिक अवधारणाएं हैं जिनके अलग-अलग उद्देश्य और निहितार्थ हैं:
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पहलू |
पैरोल |
जमानत |
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परिभाषा |
पैरोल का अभिप्राय यह है कि दण्डित बंदी को उसके पूर्ण दण्डकाल की समाप्ति से पूर्व, उसके सदाचार एवं निर्धारित शर्तों के पालन के अधीन, सशर्त रूप से कारागार से अस्थायी रूप से मुक्त किया जाता है। |
जमानत का तात्पर्य यह है कि अभियुक्त को विचारण लंबित रहने के दौरान, प्रायः प्रतिभूति या बंधपत्र के अधीन, अस्थायी रूप से रिहा किया जाता है। |
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उद्देश्य |
दीर्घकालिक कारावास का दण्ड काट रहे बंदियों के पुनर्वास या समाज में पुनः एकीकरण को सुगम बनाने के लिये पैरोल दी जाती है। |
अभियुक्त की न्यायालय में उपस्थिति सुनिश्चित करना, साथ ही उसे विचारण अवधि में सामान्य जीवन जीने की अनुमति प्रदान करना। |
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पात्रता |
सामान्यतः उन दीर्घकालिक बंदियों को प्रदान की जाती है जिनका आचरण संतोषजनक रहा हो; हत्या या बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों में दोषसिद्ध व्यक्तियों को प्रायः इसका लाभ नहीं दिया जाता। |
सामान्यतः अधिकांश अभियुक्तों को उपलब्ध होती है, सिवाय उन मामलों के जहाँ अपराध गंभीर हो या अभियुक्त के फरार होने अथवा समाज/पीड़ित के लिये खतरा उत्पन्न करने की आशंका हो। |
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अवधि |
अधिकारिता के अनुसार कारागार प्राधिकारियों अथवा न्यायालय द्वारा निश्चित अवधि के लिये प्रदान की जाती है। |
न्यायालय द्वारा स्वीकृत। |
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शर्तें |
प्रायः पुलिस के समक्ष नियमित उपस्थिति, किसी अवैध क्रियाकलाप से विरत रहना, तथा कभी-कभी निर्दिष्ट क्षेत्र की सीमाओं के भीतर ही निवास करना जैसी शर्तें सम्मिलित होती हैं। |
न्यायालय में नियमित उपस्थिति, आपराधिक क्रियाकलाप से परहेज, तथा कभी-कभी यात्रा पर प्रतिबंध या गृह-नज़रबंदी जैसी शर्तें लागू की जा सकती हैं। |