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सिविल कानून
सार्वजनिक और निजी कंपनी के बीच अंतर
«14-Jan-2026
परिचय
कंपनी अधिनियम, 2013 कंपनियों को सार्वजनिक एवं निजी श्रेणियों में वर्गीकृत करता है। दोनों श्रेणियाँ पृथक विधिक ढाँचों के अंतर्गत कार्य करती हैं, जिसका संचालन, पूँजी जुटाने और नियामक अनुपालन पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है।
सार्वजनिक कंपनी क्या होती है?
- परिभाषा: कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 2(71) के अनुसार, सार्वजनिक कंपनी वह कंपनी है जो निजी कंपनी नहीं है तथा जिसकी न्यूनतम चुकता शेयर पूँजी पाँच लाख रुपए या उससे अधिक हो।
- मुख्य विशेषताएँ:
- शेयरधारकों से पृथक् विधिक पहचान।
- शेयर स्वतंत्र रूप से अंतरणीय होते हैं तथा स्टॉक एक्सचेंजों पर क्रय-विक्रय किए जा सकते है।
- शेयरधारकों की देयता सीमित होती है।
- जनसाधारण से निवेश आमंत्रित करने हेतु विवरण-पत्र (Prospectus) जारी कर सकती हैं।
- उच्च स्तर की पारदर्शिता और प्रकटीकरण मानकों का पालन करना अनिवार्य होता है।
निजी कंपनी क्या होती है?
- परिभाषा: कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 2(68) के अनुसार, निजी कंपनी वह कंपनी है जिसकी न्यूनतम चुकता पूँजी एक लाख रुपए हो, जिसमें शेयरों के अंतरण पर प्रतिबंध हों, जिसके सदस्यों की संख्या अधिकतम 200 हो तथा जो प्रतिभूतियों के लिये जनसाधारण को आमंत्रण जारी करने से वर्जित हो।
- मुख्य विशेषताएँ:
- पृथक् विधिक पहचान।
- शेयरों का अंतरण प्रतिबंधित होता है तथा सामान्यतः निदेशक मंडल की मंजूरी आवश्यक होती है।
- देयता शेयरों, प्रत्याभूति या असीमित द्वारा सीमित हो सकती है।
- व्यवसायिक सूचनाओं की गोपनीयता बनाए रखी जाती है।
- स्वामित्व सीमित एवं चयनित व्यक्तियों तक सीमित रहता है।
सार्वजनिक कंपनी और निजी कंपनी के बीच अंतर
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अंतर का आधार |
सार्वजनिक कंपनी |
निजी कंपनी |
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विधिक परिभाषा |
कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 2(71) |
कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 2(68) |
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न्यूनतम सदस्य |
7 सदस्य |
2 सदस्य |
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अधिकतम सदस्य |
असीमित |
200 सदस्य (कर्मचारियों को छोड़कर) |
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न्यूनतम निदेशक |
3 निदेशक |
2 निदेशक |
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स्वतंत्र निदेशक |
सूचीबद्ध सार्वजनिक कंपनियों में निदेशक मंडल का कम से कम 1/3 भाग स्वतंत्र |
अनिवार्य नहीं |
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महिला निदेशक |
विनिर्दिष्ट श्रेणियों के लिए अनिवार्य |
अनिवार्य नहीं |
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नाम प्रत्यय |
“लिमिटेड (Limited)” |
“प्राइवेट लिमिटेड (Private Limited)” |
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शेयरों की अंतरणीयता |
शेयर स्वतंत्र रूप से अंतरणीय |
उपनियमों द्वारा प्रतिबंधित |
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जनसाधारण को आमंत्रण |
शेयरों के अभिदान हेतु जनसाधारण को आमंत्रण कर सकती है |
जनसाधारण को आमंत्रण निषिद्ध |
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विवरण-पत्र (Prospectus) जारी करना |
अनुमन्य |
निषिद्ध |
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पूँजी जुटाने के साधन |
आई.पी.ओ., एफ.पी.ओ., राइट्स इश्यू, बांड |
निजी प्लेसमेंट, राइट्स इश्यू, निजी निवेशक |
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उपनियमों में संशोधन |
विशेष प्रस्ताव आवश्यक |
सभी सदस्यों की सहमति आवश्यक |
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निदेशकों के साथ संविदा |
धारा 190 के अंतर्गत अनिवार्य |
अनिवार्य नहीं |
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वार्षिक आम बैठक (AGM) का कोरम |
5 / 15 / 30 सदस्य (सदस्य संख्या के अनुसार) |
2 सदस्य |
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वित्तीय प्रकटीकरण |
अनिवार्य सार्वजनिक प्रकटीकरण |
केवल सदस्यों तक सीमित प्रकटीकरण |
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सेबी (SEBI) अनुपालन |
सूचीबद्ध सार्वजनिक कंपनियों पर लागू |
लागू नहीं |
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विनियामक दायित्त्व |
उच्च |
तुलनात्मक रूप से कम |
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शेयरों की तरलता |
उच्च (सूचीबद्ध शेयर स्टॉक एक्सचेंज पर कारोबार योग्य) |
कम (अंतरण पर प्रतिबंध) |
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गोपनीयता |
सार्वजनिक प्रकटीकरण के कारण कम |
उच्च — सूचना निजी रहती है |
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विश्वसनीयता |
बाज़ार में अधिक विश्वसनीयता |
मुख्यतः हितधारकों तक सीमित |
निष्कर्ष
सार्वजनिक और निजी कंपनियों के बीच का अंतर कॉर्पोरेट विधि में मूलभूत है जिसका प्रभाव कंपनी के संचालन, विनियामक अनुपालन, पूँजी जुटाने की क्षमता तथा कॉरपोरेट प्रशासन पर प्रत्यक्ष एवं महत्त्वपूर्ण रूप से पड़ता है। सार्वजनिक कंपनियाँ पूँजी तक व्यापक पहुँच, शेयरों की तरलता तथा बाज़ार में अधिक विश्वसनीयता प्रदान करती हैं; तथापि, उन्हें कठोर एवं व्यापक विनियामक दायित्त्वों का पालन करना पड़ता है तथा व्यवसायिक गोपनीयता का कुछ अंश त्यागना पड़ता है। इसके विपरीत, निजी कंपनियाँ संचालनात्मक लचीलापन, व्यवसायिक गोपनीयता एवं नियंत्रण बनाए रखने की सुविधा प्रदान करती हैं, किंतु उनकी पूँजी तक पहुँच एवं शेयरों की तरलता अपेक्षाकृत सीमित रहती है। उपयुक्त संरचना का चयन व्यवसाय के आकार, विकास की आकांक्षाओं, पूँजी की आवश्यकता, स्वामित्व संबंधी प्राथमिकताओं तथा विनियामक अनुपालन को स्वीकार करने की इच्छा पर निर्भर करता है। कंपनी अधिनियम, 2013 दोनों प्रकार की कंपनियों के लिये व्यापक एवं संतुलित विधिक ढाँचा प्रदान करता है, जिससे भारत की कॉरपोरेट व्यवस्था में पारदर्शिता, उत्तरदायित्व तथा हितधारकों के संरक्षण को सुनिश्चित किया जा सके।