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आपराधिक कानून
अंतरिम भरणपोषण निर्धारित करते समय पत्नी की आय क्षमता के संबंध में कोई उपधारणा नहीं की जा सकती
« »08-Jan-2026
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एक्स बनाम वाई "पति द्वारा केवल यह निराधार दावा करना कि पत्नी काम कर रही है और कमा रही है, बिना किसी सबूत के जो इस दावे का प्रथम दृष्टया समर्थन करे, अंतरिम चरण में उसके लिये किसी भी तरह से सहायक नहीं हो सकता।" न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा |
स्रोत: दिल्ली उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति स्वराना कांता शर्मा ने एक्स बनाम वाई (2025) के मामले में निर्णय दिया कि अंतरिम भरणपोषण प्रदान करने पर विचार करते समय पत्नी को कमाने वाली या स्वयं का भरणपोषण करने में सक्षम होने की उपधारणा नहीं की जा सकता है, और पति द्वारा मात्र आरोपों के बजाय दस्तावेज़ी साक्ष्य की आवश्यकता पर बल दिया।
एक्स बनाम वाई (2025) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- इस मामले में पत्नी ने कुटुंब न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें उसे अपने पति से अंतरिम भरणपोषण के रूप में केवल 2,500 रुपए देने का आदेश दिया गया था।
- इस दंपति का विवाह 2021 में मुस्लिम रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था, और इस विवाह से कोई संतान नहीं हुई है।
- पत्नी ने दावा किया कि वह एक गृहिणी है जिसके पास कोई चल या अचल संपत्ति नहीं है, आय का कोई स्वतंत्र स्रोत नहीं है और उसने केवल 11वीं कक्षा तक ही पढ़ाई की है।
- उसने दावा किया कि वैवाहिक घर छोड़ने के बाद वह पूरी तरह से अपने माता-पिता पर निर्भर थी।
- पत्नी ने दावा किया कि उसका पति स्नातक है और एक निजी स्कूल में शिक्षक के रूप में काम करता है, जिसकी मासिक आय लगभग 25,000 रुपए है।
- उसने तर्क दिया कि कुटुंब न्यायालय पति की शैक्षिक योग्यता और न्यूनतम मजदूरी के आधार पर उसकी आय का उचित आकलन करने में असफल रहा, विशेष रूप से उसकी कथित आय के विश्वसनीय दस्तावेज़ी साक्ष्य के अभाव को देखते हुए।
- पति ने इसके जवाब में कहा कि पत्नी ने स्वेच्छा से वैवाहिक घर छोड़ दिया था क्योंकि वह उसके साथ रहने को इच्छुक नहीं थी।
- उसने अभिकथित किया कि पत्नी एक नर्सरी शिक्षिका के रूप में काम करती थी और प्रति माह 10,000 रुपए कमाती थी और अपना भरणपोषण करने में सक्षम थी।
- पति ने दावा किया कि एक गैर सरकारी संगठन (NGO) में शिक्षक के रूप में काम करने से उसकी अपनी आय केवल 10,000 रुपए प्रति माह थी।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने प्रारंभ में ही कहा कि यह बात निर्विवाद है कि पत्नी ने केवल 11वीं कक्षा तक ही पढ़ाई की है।
- न्यायमूर्ति शर्मा ने टिप्पणी की कि यद्यपि पति का आरोप था कि पत्नी एक नर्सरी शिक्षिका के रूप में काम कर रही थी और कमा रही थी, किंतु इस दावे को साबित करने के लिये कोई दस्तावेज़ी सबूत अभिलेख पर पेश नहीं किया गया।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि "बिना किसी सबूत के, यहाँ तक कि प्रथम दृष्टया भी, केवल यह कहना कि पत्नी काम कर रही है और कमा रही है, इस स्तर पर प्रत्यर्थी-पति के लिये किसी भी तरह से सहायक नहीं हो सकता।"
- न्यायालय ने यह माना कि अंतरिम भरणपोषण प्रदान करने के उद्देश्य से, विश्वसनीय साक्ष्य के बिना यह उपधारणा नहीं की जा सकती कि पत्नी कमा रही है या अपना भरणपोषण करने में सक्षम है।
- न्यायाधीश ने आगे कहा कि पति द्वारा दावा की गई 10,000 रुपए प्रति माह की आय एक कुशल व्यक्ति को देय न्यूनतम मजदूरी से भी कम थी, जबकि उसने स्वीकार किया था कि वह स्नातक है।
- न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि पति की आय का आकलन उसके द्वारा स्वयं घोषित कम आय के बजाय न्यूनतम मजदूरी के आधार पर किया जाना चाहिये।
- न्याय के हित में, न्यायालय ने पत्नी को देय अंतरिम भरणपोषण राशि को 2,500 रुपए प्रति माह से बढ़ाकर 3,500 रुपए प्रति माह कर दिया।
- दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144) के अधीन आवेदन दाखिल करने की तारीख से वर्धित भरणपोषण राशि का संदाय करने का आदेश दिया गया था, बशर्ते कि पहले से संदाय की गई किसी भी राशि का समायोजन किया जाए।
अंतरिम भरणपोषण
- अंतरिम भरणपोषण से तात्पर्य वैवाहिक कार्यवाही के लंबित रहने के दौरान पति या पत्नी को दी जाने वाली अस्थायी वित्तीय सहायता से है।
- अंतरिम भरणपोषण का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मुकदमे की प्रक्रिया के दौरान आश्रित पति या पत्नी को जीविका के साधनों से वंचित न रहना पड़े।
- यह उपबंध पक्षकारों पर लागू होने वाली व्यक्तिगत विधि की परवाह किये बिना लागू होता है, जिससे यह भरणपोषण के लिये एक पंथनिरपेक्ष उपबंध बन जाता है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144 क्या है?
बारे में:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 144 एक सामाजिक न्याय उपबंध है जिसका उद्देश्य उपेक्षित पति या पत्नी और संतान की दरिद्रता और आर्थिक कठिनाई को रोकना है। यह प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट को उस पत्नी, धर्मज या अधर्मज संतान को मासिक भरणपोषण, अंतरिम भरणपोषण और कार्यवाही व्यय प्रदान करने का अधिकार देता है, जो स्वयं का भरणपोषण करने में असमर्थ हैं, ऐसे व्यक्ति से जो पर्याप्त साधनों से संपन्न होते हुए भी ऐसा करने से इंकार करता है या उपेक्षा करता है।
- प्रमुख सांविधिक विशेषताओं में सम्मिलित हैं:
- धारा 144(1): मजिस्ट्रेट को पत्नी और संतान को मासिक भरणपोषण का आदेश देने का अधिकार देती है।
- धारा 144(1) का दूसरा परंतुक: मजिस्ट्रेट को कार्यवाही लंबित रहने के दौरान अंतरिम भरणपोषण और व्यय प्रदान करने की अनुमति देता है।
- धारा 144(1) का तीसरा परंतुक: निदेश देता है कि अंतरिम भरणपोषण आवेदनों का निपटारा आदर्श रूप से नोटिस की तामील की तारीख से 60 दिनों के भीतर किया जाना चाहिये।
- धारा 144(2): भरणपोषण आवेदन या आदेश की तिथि से देय होगा, जैसा मजिस्ट्रेट उचित समझे।
- धारा 144(3): भरणपोषण का संदाय न करने पर वारण्ट कार्यवाही और एक महीने तक का कारावास हो सकता है।
- धारा 144(4): जारकर्म, पर्याप्त हेतुक के बिना पति के साथ रहने से इंकार, या पृथक् रहने के लिये आपसी सहमति के मामलों में पत्नी को भरणपोषण प्राप्त करने से अयोग्य ठहराता है।
- धारा 145(2) के अधीन प्रक्रियात्मक स्पष्टता प्रदान की गई है, जिसमें यह अनिवार्य है कि साक्ष्य प्रत्यर्थी या उनके अधिवक्ता की उपस्थिति में अभिलिखित किया जाना चाहिये, जिसमें एकपक्षीय कार्यवाही और तीन मास के भीतर पर्याप्त हेतुक दिखाने पर ऐसे आदेशों को अपास्त करने का उपबंध है।