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आपराधिक कानून

लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 के अंतर्गत महत्त्वपूर्ण परिभाषाएँ

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 05-Jan-2026

परिचय  

लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम, 2012 को 14 नवंबर 2012 को अधिनियमित किया गया थाजो 1992 में संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार अभिसमय के प्रति भारत द्वारा की गई पुष्टि के परिणामस्वरूप एक विधायी प्रतिक्रिया के रूप में सामने आया।  

  • यह अधिनियम बालकों के लैंगिक शोषण और लैंगिक दुर्व्यवहार के अपराधों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करके और उन्हें पर्याप्त रूप से दण्डित करके विद्यमान विधियों में विद्यमान महत्त्वपूर्ण कमियों को दूर करता है। 

विधायी ढाँचा और पृष्ठभूमि 

  • यह अधिनियम 14 नवंबर 2012 से प्रवर्तित हुआजो अंतरराष्ट्रीय बाल अधिकार मानकों के प्रति भारत की प्रतिबद्धता के अनुपालन में अधिनियमित किया गया। 
  • वर्ष 2019 के संशोधनों के माध्यम से दण्डात्मक प्रावधानों को और अधिक कठोर किया गयाजिससे बालकों के विरुद्ध लैंगिक अपराधों पर प्रभावी निरोधात्मक प्रभाव स्थापित किया जा सके। 
  • 2020 के नियमों में अधिनियम के प्रावधानों के कार्यान्वयन के लिए विस्तृत प्रक्रियात्मक दिशानिर्देश प्रदान किए गए थे। 

लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत महत्त्वपूर्ण परिभाषाएँ 

धारा इस व्यापक ढाँचे की परिभाषात्मक नींव का निर्माण करती हैजो बाल लैंगिक अपराधों की अवधारणा को स्पष्ट रूप से परिभाषित करने के साथ-साथउनके निरोध एवं प्रतिकार हेतु स्थापित तंत्रों की स्पष्ट सीमाएँ एवं रूपरेखा निर्धारित करती है  

बच्चे की परिभाषा: 

धारा 2(1)(घ) – बालक 

  • इस अधिनियम के अनुसारअठारह वर्ष से कम आयु का कोई भी व्यक्ति बालक के रूप में परिभाषित किया गया है। 
  • यह सार्वभौमिक परिभाषा लिंग की परवाह किये बिना सभी अवयस्कों के लिये व्यापक सुरक्षा सुनिश्चित करती हैजिससे यह अवधारित करने में कोई अस्पष्टता नहीं रहती कि अधिनियम के अधीन संरक्षण के लिये कौन पात्र है। 

लैंगिक अपराधों की परिभाषाएँ: 

धारा 2(1)() – प्रवेशन लैंगिक हमला 

  • यह परिभाषा अधिनियम की धारा के अंतर्गत विस्तृत अपराधों को संदर्भित करती हैजो बालकों के विरुद्ध सबसे गंभीर लैंगिक अपराधों की मूलभूत श्रेणी स्थापित करती है जिसमें प्रवेशन सम्मिलित है। 

धारा 2(1)() – गुरुतर प्रवेशन लैंगिक हमला 

  • अधिनियम इसे धारा के अधीन विनिर्दिष्ट अपराधों के रूप में परिभाषित करता हैजिसमें गुरुतर परिस्थितियों में किये गए लैंगिक हमले के मामले सम्मिलित हैंजिनके लिये अपराध की गंभीरता या संदर्भ के कारण वर्धित दण्ड की आवश्यकता होती है। 

धारा 2(1)() – लैंगिक हमला 

  • लैंगिक हमले में अधिनियम की धारा के अधीन परिभाषित अपराध सम्मिलित हैंजिसमें लैंगिक संपर्क और ऐसे कृत्य सम्मिलित हैं जिनमें प्रवेशन सम्मिलित नहीं होता हैपरंतु ये बालक की शारीरिक अखंडता और गरिमा का गंभीर उल्लंघन करते हैं। 

धारा 2(1)(ख) – गुरुतर लैंगिक हमला  

  • यह परिभाषा धारा के अंतर्गत आने वाले अपराधों से मेल खाती हैजो उन परिस्थितियों में किये गए लैंगिक हमले से संबंधित है जो अपराध को विशेष रूप से जघन्य या पीड़ित बालक के लिये हानिकारक बनाती हैं। 

धारा 2(1)() – लैंगिक उत्पीड़न 

  • लैंगिक उत्पीड़न में धारा 11 के अधीन विनिर्दिष्ट आचरण सम्मिलित हैजिनमें ऐसे कृत्य भी शामिल होते हैं जो प्रत्यक्ष लैंगिक हमला का रूप न लेते हुए भी बालकों के लिये पक्षद्रोहीभय उत्पन्न करने वाले या अनुचित परिस्थितियाँ उत्पन्न करते हैं। 

संस्थागत और संगठनात्मक परिभाषाएँ: 

धारा 2(1)(ग) - सशस्त्र बल या सुरक्षा बल 

  • इस अधिनियम में सशस्त्र बलों या सुरक्षा बलों को संघ के सशस्त्र बलोंसुरक्षा बलों या पुलिस बलों के रूप में परिभाषित किया गया हैजैसा कि अधिनियम की अनुसूची में निर्दिष्ट है। 
  • यह परिभाषा अधिकार और शक्ति के पदों पर आसीन व्यक्तियों के लिये जवाबदेही तंत्र स्थापित करती है। 

धारा 2(1)(ज) - धार्मिक संस्था 

  • धार्मिक संस्था का वही अर्थ है जो धार्मिक संस्था (दुरुपयोग निवारण) अधिनियम, 1988 के अंतर्गत निर्धारित है। 
  • यह परिभाषा धार्मिक संस्थानों के भीतर अपराध होने पर या ऐसे संस्थानों से जुड़े व्यक्तियों द्वारा किये गए अपराधों के मामले में जवाबदेही सुनिश्चित करती है। 

घरेलू संदर्भ से संबंधित परिभाषाएँ: 

धारा 2(1)(ङ) - घरेलू संबंध 

  • यह अधिनियम घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 2(च) से घरेलू संबंध की परिभाषा को अपनाता है। 
  • इससे घरेलू परिवेश में रिश्तों को समझने में एकरूपता सुनिश्चित होती हैजहाँ बलाक दुर्व्यवहार के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील हो सकते हैं। 

धारा 2(1)() – साझी गृहस्थी 

  • साझी गृहस्थी से ऐसी गृहस्थी अभिप्रेत है जहाँ अपराध से आरोपित व्यक्ति, बालक के साथ घरेलू नातेदारी में रहता है या रह चूका है 
  • यह परिभाषा इस बात को स्वीकार करती है कि बालकों के विरुद्ध कई लैंगिक अपराध पारिवारिक या घरेलू परिवेश में होते हैं। 

बालक संबंधी अश्लील सामग्री की परिभाषा: 

धारा 2(1)(घक) - बालक संबंधी अश्लील सामग्री सामग्री 

  • 2019 के संशोधन अधिनियम के माध्यम से पेश की गई यह परिभाषाप्रौद्योगिकी-सुगम दुरुपयोग की बढ़ती चिंता को संबोधित करती है। 
  • बालक संबंधी अश्लील सामग्री का अर्थ किसी बालक को संलिप्त करते हुए लैंगिक संबंध बनाने के आचरण का कोई भी दृश्य चित्रण अभिप्रेत हैजिसके अंतर्गत फोटोवीडियोडिजिटल या कम्प्यूटर जनित ऐसी आकृतिजो वास्तविक बालक के समान लगे और सृजितरूपांतरित या परिवर्तित होकिंतु बालक का चित्र प्रतीत होने वाली आकृति भी है 

न्यायिक और अभियोजन संबंधी परिभाषाएँ: 

धारा 2(1)() - विशेष न्यायालय 

  • विशेष न्यायालय से तात्पर्य अधिनियम की धारा 28 के अधीन उस रूप में अभिहित कोई न्यायालय अभिप्रेत है। 
  • ये विशेष न्यायिक निकाय बाल लैंगिक दुर्व्यवहार से जुड़े मामलों का त्वरित और संवेदनशील निपटान सुनिश्चित करते हैं। 

धारा 2(1)(ड) - विशेष लोक अभियोजक 

  • विशेष लोक अभियोजक से तात्पर्य अधिनियम की धारा 32 के अधीन नियुक्त लोक अभियोजक से है। 
  • इन विशेषज्ञ अभियोजकों के पास बाल लैंगिक दुर्व्यवहार के मामलों को उचित संवेदनशीलता और विधिक सूझबूझ के साथ संभालने की आवश्यक विशेषज्ञता है। 

तकनीकी और प्रक्रियात्मक परिभाषाएँ 

धारा 2(1)() – विहित 

  • "निर्धारित" शब्द का अर्थ अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित हैजो लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण नियमों को संदर्भित करता हैजो अधिनियम के मूल प्रावधानों को लागू करने के लिये विस्तृत प्रक्रियात्मक और प्रशासनिक दिशानिर्देश प्रदान करते हैं।  

निर्वचनात्मक उपबंध 

धारा 2(2) - अन्य विधानों का संदर्भ 

  • अधिनियम यह उपबंध करता है कि इस अधिनियम में प्रयुक्त वे शब्द और अभिव्यक्तियाँजिनकी परिभाषा इसमें नहीं दी गई हैउन्हें संबंधित अन्य विधानों में निर्दिष्ट अर्थों में ही समझा जाएगा।  
  • यह व्यवस्था भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में विधिक निरंतरतासामंजस्य तथा सुसंगतता सुनिश्चित करती है 

निष्कर्ष 

लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा में स्थापित परिभाषात्मक ढाँचा भारत के व्यापक बाल संरक्षण विधि का आधार है। लैंगिक अपराधों की विभिन्न श्रेणियोंसंस्थागत संदर्भों तथा न्यायिक तंत्र से संबंधित प्रमुख शब्दों को स्पष्ट रूप से परिभाषित कर यह अधिनियम किसी भी प्रकार की अस्पष्टता को समाप्त करता है तथा विभिन्न न्यायक्षेत्रों में एकरूपता सुनिश्चित करता है।