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आपराधिक कानून
लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 की धारा 10
« »06-Jan-2026
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धर्मेंद्र कुमार बनाम राज्य (2025) "लैंगिक आशय से किसी छोटे बच्चे को गुप्तांग को छूना गुरुतर लैंगिक हमले के समान है और इसलिये, लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा 10 के अधीन अपराध साबित हुआ।" न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा |
स्रोत: दिल्ली उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने धर्मेंद्र कुमार बनाम राज्य (2025) के मामले में लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 की धारा 10 के अधीन 3 वर्ष और 11 महीने की अवयस्क लड़की पर गुरुतर लैंगिक हमला करने के लिये एक व्यक्ति की दोषसिद्धि और सात वर्ष के दण्ड को बरकरार रखा।
धर्मेंद्र कुमार बनाम राज्य (2025) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- दोषी व्यक्ति पीड़ित परिवार के घर में किराएदार के रूप में रहता था।
- पीड़िता की माता ने कथन किया कि दोषी ने अपना गुप्तांग दिखाया और अवयस्क को उसे छूने के लिये विवश किया।
- घटना के समय पीड़िता की उम्र 3 वर्ष और 11 महीने थी।
- दोषी को अवर न्यायालय ने लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 की धारा 10 और भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 354, 354क और 354ख के अधीन अपराधों के लिये दोषी ठहराया था।
- भारतीय दण्ड संहिता की धारा 354 किसी महिला की गरिमा को ठेस कारित करने से संबंधित है।
- भारतीय दण्ड संहिता की धारा 354क लैंगिक उत्पीड़न से संबंधित है।
- भारतीय दण्ड संहिता की धारा 354ख किसी महिला को निर्वस्त्र करने के आशय से उस पर हमला करने या आपराधिक बल का प्रयोग करने से संबंधित है।
- दोषी को लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा 10 के अधीन अपराध के लिये सात वर्ष के कारावास का दण्ड दिया गया ।
- दोषी ने दिल्ली उच्च न्यायालय में अपनी दोषसिद्धि और दण्ड को चुनौती दी।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 की धारा 10 के अधीन दोषसिद्धि और दण्ड को बरकरार रखा।
- न्यायमूर्ति कृष्णा ने टिप्पणी की कि पीड़िता के परिसाक्ष्य से यह पता चलता है कि उसका कथन दर्ज करने से पहले, उससे यह सुनिश्चित करने के लिये प्रश्न पूछे गए थे कि वह सहज महसूस कर रही है और कथन देने में सक्षम है।
- न्यायालय ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि बच्ची का कथन दर्ज करने से पहले उसके सामर्थ्य का आकलन नहीं किया गया था।
- न्यायालय ने माना कि प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने में हुए विलंब का पर्याप्त स्पष्टीकरण दिया गया है और इसे अभियोजन पक्ष के मामले के लिये घातक नहीं माना जा सकता है।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि लैंगिक आशय से किसी अवयस्क बालक को गुप्तांग को छूने के लिये विवश करना गुरुतर लैंगिक हमले के समान है।
- न्यायालय ने माना कि लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा 10 के अधीन अपराध विधिवत रूप से स्थापित हो गया है।
- यद्यपि, न्यायालय ने भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 354 (लज्जा भंग करना), 354क (लैंगिक उत्पीड़न) और 354ख (किसी महिला पर हमला करना या आपराधिक बल का प्रयोग करना) के अधीन अपराधों के लिये दोषसिद्धि को अपास्त कर दिया।
लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 क्या है?
बारे में:
- यह अधिनियम महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अंतर्गत 2012 में पारित किया गया था।
- यह एक व्यापक विधायी ढाँचा है जिसका उद्देश्य बालकों को लैंगिक हमले, लैंगिक शोषण और अश्लील सामग्री जैसे अपराधों से संरक्षण प्रदान करना है।
- यह लिंगभेद रहित अधिनियम है और इसमें बालक के कल्याण को सर्वोपरि महत्त्व दिया जाता है।
- इसमें ऐसे अपराधों और संबंधित मामलों और घटनाओं के विचारण के लिये विशेष न्यायालयों की स्थापना का प्रावधान है।
- इस अधिनियम में लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण संशोधन विधेयक, 2019 के माध्यम से प्रवेशन लैंगिक हमले और गुरुतर प्रवेशन लैंगिक हमले के अपराधों के लिये दण्ड के रूप में मृत्युदण्ड को सम्मिलित किया गया था।
- इस अधिनियम की धारा 4 में प्रवेशन लैंगिक हमले के लिये दण्ड का उपबंध है।
- लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा 2(1)(घ) के अधीन, बालक को 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है।
लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा 10 :
- धारा 10 — गुरुतर लैंगिक हमले के लिये दण्ड
- गुरुतर लैंगिक हमले के अपराध के लिये पाँच वर्ष से सात वर्ष तक का कठोर कारावास और जुर्माना दण्डस्वरूप निर्धारित किया गया है।
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