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आपराधिक कानून

डॉ. सोहेल मलिक बनाम भारत संघ (2024)

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 09-Jan-2026

परिचय 

इस महत्त्वपूर्ण मामले मेंउच्चतम न्यायालय ने एक महत्त्वपूर्ण अधिकारिता संबंधी प्रश्न का समाधान किया: क्या एक केंद्रीय सरकारी विभाग में गठित आंतरिक परिवाद समिति किसी दूसरे विभाग में कार्यरत कर्मचारी के विरुद्ध लैंगिक उत्पीड़न के परिवाद पर सुनवाई कर सकती है। 

  • न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी द्वारा लिखित यह निर्णयअंतर-विभागीय महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न परिवादों से संबंधित अस्पष्टता को दूर करता है और प्रारंभिक तथ्य-खोज जांच और औपचारिक अनुशासनात्मक जांच करने में आंतरिक परिवाद समिति की दोहरी भूमिका पर स्पष्टता प्रदान करता है। 

तथ्य 

  • डॉ. सोहेल मलिकभारतीय राजस्व सेवा (IRS) के 2010 बैच के अधिकारीउस समय केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT), दिल्ली में OSD के पद पर पदस्थ थे। 
  • पीड़ित महिलाभारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) की 2004 बैच की अधिकारीकृषि भवननई दिल्ली स्थित खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग में संयुक्त सचिव के रूप में कार्यरत थीं। 
  • दिनांक 15 मई 2023 को व्यथित महिला ने यह आरोप लगाया कि अपीलकर्त्ता ने उसके कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न किया। इसके पश्चात् 16 मई 2023 को प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई तथा 9 मार्च 2024 को आरोपपत्र प्रस्तुत किया गया। 
  • व्यथित महिला ने 24 मई, 2023 को अपने विभाग में आंतरिक परिवाद समिति के समक्ष महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम के अधीन परिवाद दर्ज कराया। आंतरिक परिवाद समिति ने 13 जून, 2023 को अपीलकर्त्ता को सुनवाई के लिये नोटिस जारी किया। 
  • अपीलकर्त्ता ने इस कार्यवाही को केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) के समक्ष चुनौती देते हुए यह तर्क दिया कि चूँकि वह किसी अन्य विभाग में कार्यरत हैअतः व्यथित महिला के विभाग में गठित आंतरिक परिवाद समिति को उसके विरुद्ध परिवाद को सुनने का अधिकारिता प्राप्त नहीं है। 
  • केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण ने अपीलकर्ता की याचिका खारिज कर दी। इसके पश्चात् दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी उसकी रिट याचिका को निरस्त कर दिया 
  • अपीलकर्त्ता ने उच्चतम न्यायालय का रुख कियाजिसने जांच जारी रखने की अनुमति दी किंतु निदेश दिया कि अंतिम रिपोर्ट को सीलबंद लिफाफे में रखा जाए। 

सम्मिलित विवाद्यक  

  • क्या केंद्र सरकार के किसी एक विभाग में गठित आंतरिक परिवाद समिति को किसी दूसरे विभाग के कर्मचारी के विरुद्ध परिवाद पर सुनवाई करने का अधिकार है? 
  • क्या महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम की धारा 11 में उल्लिखित "जहाँ प्रत्यर्थी एक कर्मचारी है" उपबंध यह अनिवार्य करता है कि आंतरिक परिवाद समिति की कार्यवाही प्रत्यर्थी के कार्यस्थल पर ही होनी चाहिये? 
  • धारा 13 के अधीनआंतरिक परिवाद समिति के निष्कर्षों के आधार पर पीड़ित महिला के विभाग में प्रत्यर्थी विभाग द्वारा क्या कार्रवाई की जानी है? 
  • क्या पीड़ित महिला के कार्यस्थल पर आंतरिक परिवाद समिति की कार्यवाही से अपीलकर्त्ता को कोई नुकसान हुआ? 

न्यायालय की टिप्पणियां 

सांविधिक निर्वचन पर: 

  • न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम सामाजिक कल्याण विधान है जिसे महिलाओं के समानता (अनुच्छेद 14, 15) और गरिमामय जीवन (अनुच्छेद 21) के मौलिक अधिकारों को बनाए रखने के लिये अधिनियमित किया गया है। 
  • यह अधिनियम विशाखा बनाम राजस्थान राज्य के दिशानिर्देशों से विकसित हुआ है और इसका निर्वचन पाठ और संदर्भ दोनों को ध्यान में रखते हुए उद्देश्यपूर्ण ढंग से किया जाना चाहिये 

धारा 11 के निर्वचन पर: 

  • अपीलकर्त्ता ने तर्क दिया कि "जहाँ प्रत्यर्थी एक कर्मचारी है" का अर्थ है कि केवल प्रत्यर्थी के कार्यस्थल पर स्थित आंतरिक परिवाद समिति के पास ही अधिकारिता है। 
  • न्यायालय ने इस निर्वचन को नामंजूर करते हुए कहा कि "जहाँ" का प्रयोग सशर्त संयोजन ("यदि" के अर्थ में) के रूप में किया जाता हैन कि स्थान को दर्शाने के लिये।  
  • धारा 11(1) में तीन स्थितियों का उल्लेख है: (i) यदि प्रत्यर्थी कर्मचारी हैतो जांच लागू सेवा नियमों के अनुसार की जाएगी; (ii) यदि ऐसे कोई नियम विद्यमान नहीं हैंतो जांच विहित तरीके से की जाएगी; (iii) यदि प्रत्यर्थी घरेलू कामगार हैतो परिवाद पुलिस को भेजा जाएगा। "जहाँ" शब्द एक प्रक्रियात्मक बिंदु हैन कि अधिकारिता संबंधी प्रतिबंध।  

महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न (POSH) अधिनियम के अंतर्गत परिभाषाओं पर: 

न्यायालय ने प्रमुख परिभाषाओं की जांच की: 

  • "प्रत्यर्थी" (धारा 2(ड)): कोई भी व्यक्ति जिसके विरुद्ध परिवाद किया गया हो। 
  • "कर्मचारी" (धारा 2(च)): व्यापक रूप से परिभाषित। 
  • "कार्यस्थल" (धारा 2(ण)): व्यापक रूप से परिभाषितजिसमें नियोजन के दौरान दौरा किया गया कोई भी स्थान सम्मिलित है। 

उद्देश्यपूर्ण निर्वचनों पर: 

  • पीड़ित महिलाओं को प्रत्यर्थी के कार्यस्थल पर आंतरिक परिवाद समिति से संपर्क करने के लिये बाध्य करने से प्रक्रियात्मक और मनोवैज्ञानिक बाधाएं उत्पन्न होंगी, "कार्यस्थल" की परिभाषा का विस्तार करने का उद्देश्य असफल हो जाएगा और महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम के सामाजिक कल्याण के उद्देश्य को कमजोर करेगा। 

आंतरिक परिवाद समिति और नियोक्ता की भूमिका पर: 

  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धारा 13 जांच करने के अधिकार (ICC) और लागू करने के अधिकार (नियोक्ता) के बीच अंतर करती है।  
  • आंतरिक परिवाद समिति तथ्यों की जांच करती है और सिफारिशें करती हैजो प्रत्यर्थी के नियोक्ता को भेजी जाती हैंजिसे साठ दिनों के भीतर कार्रवाई करनी होती है। व्यथित महिला और प्रत्यर्थी का नियोक्ता एक ही होना आवश्यक नहीं है। 
  • व्यथित महिला के कार्यस्थल पर स्थित आंतरिक परिवाद समिति प्रथम चरण की कार्यवाही कर सकती है। रिपोर्ट प्राप्त होने परयदि प्रत्यर्थी का नियोक्ता अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करता हैतो प्रत्यर्थी के कार्यस्थल पर स्थित आंतरिक परिवाद समिति द्वितीय चरण की कार्यवाही कर सकती है। यह पीड़ित महिला के सुलभ निवारण के अधिकार और प्रत्यर्थी के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के बीच संतुलन स्थापित करता है।    

निष्कर्ष 

उच्चतम न्यायालय ने अपील खारिज कर दी और निर्णय दिया: 

  • धारा 11 में "जहाँ प्रत्यर्थी एक कर्मचारी है" का यह अर्थ नहीं लगाया जा सकता कि आंतरिक परिवाद समिति की कार्यवाही केवल प्रत्यर्थी के कार्यस्थल पर ही हो सकती है। पीड़ित महिला के कार्यस्थल पर स्थित आंतरिक परिवाद समिति को प्रारंभिक जांच का अधिकार है।  
  • अधिनियम की संकीर्ण एवं प्रतिबंधात्मक व्याख्या “कार्यस्थल” की विस्तृत परिभाषा के प्रतिकूल होगी तथा महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम, 2013 के उपचारात्मक एवं सामाजिक कल्याणकारी उद्देश्य को निष्फल कर देगी 
  • व्यथित महिला के कार्यस्थल पर स्थित आंतरिक परिवाद समिति प्रथम चरण (प्रारंभिक जांच) का संचालन करती है और अपनी रिपोर्ट प्रत्यर्थी के नियोक्ता को भेजती है। यदि अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की जाती हैतो प्रत्यर्थी के कार्यस्थल पर स्थित आंतरिक परिवाद समिति द्वितीय चरण (औपचारिक जांच) का संचालन करती है। 
  • प्रत्यर्थी के नियोक्ता को धारा 19(च) के कर्त्तव्यों का पालन करना होगा और व्यथित महिला के कार्यस्थल पर आंतरिक परिवाद समिति के साथ सहयोग करना होगा। 
  • आंतरिक परिवाद समिति की रिपोर्ट को लागू सेवा नियमों के अधीन आगे की कार्रवाई के लिये अपीलकर्त्ता के विभाग को भेजा जाएगा। 

यह निर्णय व्यथित महिलाओं के लिये प्रक्रियात्मक बाधाओं को दूर करता हैअंतर-विभागीय परिवादों में अधिकारिता संबंधी अस्पष्टता को स्पष्ट करता हैमहिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम के सामाजिक कल्याण के उद्देश्य को बरकरार रखता हैऔर महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न जांच में अंतर-विभागीय सहयोग के लिये नियोक्ताओं के दायित्त्वों को मजबूत करता है।