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आपराधिक कानून
विशाखा-शैली की परिवाद समिति और लैंगिक दुराचार जांच का अभाव
«15-Apr-2026
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ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड बनाम सुहास शंकर पगारे और अन्य "विशाखा दिशा-निर्देशों के अधीन परिकल्पित सटीक स्वरूप में परिवाद समिति का मात्र अभाव लैंगिक दुराचार के आरोपों की घरेलू जांच को स्वतः ही अमान्य नहीं कर देता।" न्यायमूर्ति अमित बोरकर |
स्रोत: बॉम्बे उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
बॉम्बे उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अमित बोरकर ने ग्लेक्सोस्मिथक्लाइन फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड बनाम सुहास शंकर पगारे और अन्य (2026) के मामले में नासिक की औद्योगिक न्यायालय द्वारा पारित भाग I पंचाट को रद्द कर दिया, जिसमें प्रत्यर्थी कर्मचारी के विरुद्ध घरेलू जांच को अवैध और विशाखा दिशानिर्देशों के अनुरूप नहीं घोषित किया गया था।
- न्यायालय ने माना कि लैंगिक दुर्व्यवहार की जांच की वैधता का आकलन वास्तव में अपनाई गई प्रक्रिया की निष्पक्षता के आधार पर किया जाना चाहिये, न कि केवल परिवाद समिति की औपचारिक अनुपस्थिति के आधार पर।
ग्लेक्सोस्मिथक्लाइन फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड बनाम सुहास शंकर पगारे और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह मामला ग्लेक्सोस्मिथक्लाइन फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड में कार्यरत एक महिला कर्मचारी द्वारा प्रत्यर्थी कर्मचारी के विरुद्ध लगाए गए लैंगिक दुर्व्यवहार के आरोपों से संबंधित है।
- आरोपों के बाद, नियोक्ता ने आदर्श स्थायी आदेशों के अधीन अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की, एक जांच की और अंततः प्रत्यर्थी को बर्खास्त कर दिया।
- नासिक औद्योगिक न्यायालय ने दिनांक 09.12.2025 को अपने भाग-प्रथम पंचाट में यह माना कि:
- घरेलू जांच न तो विधिक थी, न ही निष्पक्ष थी और न ही विशाखा दिशानिर्देशों के अनुरूप थी।
- जांच अधिकारी के निष्कर्ष अनुचित थे।
- इसका मुख्य कारण विशाखा दिशा-निर्देशों के अधीन परिकल्पित परिवाद समिति का अभाव था।
- ग्लेक्सोस्मिथक्लाइन ने इस निर्णय को बॉम्बे उच्च न्यायालय में रिट याचिका के माध्यम से चुनौती दी।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
न्यायालय ने निम्नलिखित प्रमुख टिप्पणियां कीं:
- महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम से पूर्व विधिक ढाँचा: न्यायालय ने कार्यस्थल पर लैंगिक दुर्व्यवहार से संबंधित विधिक स्थिति का अध्ययन किया, जो महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम, 2013 के लागू होने से पहले की थी। न्यायालय ने पाया कि विधि के अभाव में विशाखा दिशा-निर्देश बाध्यकारी विधि के रूप में कार्य करते थे। यद्यपि, प्रमाणित स्थायी आदेशों में भी सांविधिक बल होता है और वे दुर्व्यवहार को विनियमित करने और अनुशासनात्मक कार्यवाही करने के लिये एक विधिक रूप से मान्यता प्राप्त ढाँचा प्रदान करते हैं।
- औपचारिक गैर-अनुपालन की सीमाएं: औद्योगिक अधिकरण ने विशाखा अधिनियम के अधीन परिकल्पित सटीक प्रारूप में परिवाद समिति की अनुपस्थिति को ही जांच को अमान्य करने के लिये पर्याप्त मानकर त्रुटी की थी, जबकि उसने यह जांच नहीं की थी कि वास्तव में जांच कैसे की गई थी।
- जांच की वैधता के लिये परीक्षण: अधिकरण का ध्यान इस बात पर होना चाहिये था कि क्या कर्मचारी को आरोपों के बारे में सूचित किया गया था, सुसंगत सामग्री उपलब्ध कराई गई थी, भाग लेने का अवसर दिया गया था और उसे अपनी प्रतिरक्षा करने की अनुमति दी गई थी।
- विशाखा दिशा-निर्देशों का उद्देश्य: विशाखा दिशा-निर्देशों का उद्देश्य निष्पक्षता सुनिश्चित करना और मनमानी कार्रवाई से सुरक्षा प्रदान करना था। यह उद्देश्य निष्पक्ष अनुशासनात्मक प्रक्रिया के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है, भले ही वह स्थायी आदेशों के अधीन संचालित की जाए।
- नियोक्ता ने क्या किया: नियोक्ता ने आरोप पत्र जारी किया, जांच कार्यवाही की, कर्मचारी को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया और साक्ष्य प्रस्तुत करने तथा अपनी प्रतिरक्षा करने का अवसर प्रदान किया। इससे प्रक्रियात्मक निष्पक्षता प्रदर्शित हुई।
- न्यायालय ने अधिकरण के दृष्टिकोण को विधिक रूप से अनुपयुक्त पाया और प्रथम भाग के उस पंचाट को रद्द कर दिया जिसमें जांच को अवैध और निष्कर्षों को अनुचित घोषित किया गया था। मामले को औद्योगिक अधिकरण को विधि के अनुसार जांच की वैधता पर पुनर्विचार करने के लिये वापस भेज दिया गया।
विशाखा दिशानिर्देश क्या हैं?
विशाखा बनाम राजस्थान राज्य (1997):
मामले की पृष्ठभूमि:
- भंवरी देवी ने 1985 से राजस्थान सरकार की महिला विकास परियोजना के अधीन ग्राम स्तर की सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में काम किया।
- कार्यक्रम का उद्देश्य बाल विवाहों पर अंकुश लगाना था।
- उन्होंने रमाकांत गुज्जर के परिवार में बाल विवाह को रोकने का प्रयास किया।
- पुलिस के आने के बावजूद, शादी संपन्न हुई।
- सितंबर 1992 में, रमाकांत गुज्जर ने 5 अन्य पुरुषों के साथ मिलकर उसके पति के सामने उसका सामूहिक बलात्संग किया।
- पुलिस ने प्रारंभ में उसे परिवाद दर्ज कराने से मना किया; लेकिन बाद में वह परिवाद दर्ज कराने में कामयाब रही।
- विचारण न्यायालय ने अभियुक्त को दोषमुक्त कर दिया।
- भंवरी देवी ने अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर 'विशाखा' नाम से एक रिट याचिका दायर की ।
निर्णय:
- लैंगिक उत्पीड़न लैंगिक समता और जीवन एवं स्वतंत्रता के अधिकार जैसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।
- ऐसी घटनाएँ अनुच्छेद 19(1)(छ) के अधीन पीड़ित के अधिकार का उल्लंघन करती हैं - किसी भी वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारोबार करने का अधिकार।
- यह अधिकार सुरक्षित कार्य वातावरण की उपलब्धता पर निर्भर करता है।
- विधान और प्रवर्तन के माध्यम से सुरक्षा और गरिमा सुनिश्चित करने की प्राथमिक उत्तरदायित्त्व विधायिका और कार्यपालिका का है।
विशाखा दिशा-निर्देश:
नियोक्ता का कर्त्तव्य:
- कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न की घटनाओं को रोकें/निवारक बनें।
- ऐसे कृत्यों के समाधान, निपटारे या अभियोजन के लिये प्रक्रियाएँ प्रदान करें।
परिभाषा — लैंगिक उत्पीड़न में निम्नलिखित शामिल हैं:
- शारीरिक संपर्क और शारीरिक संबंध बनाने की कोशिश।
- लैंगिक संबंध बनाने की मांग या अनुरोध।
- लैंगिक संबंधी टिप्पणियां।
- अश्लील सामग्री दिखाना।
- लैंगिक प्रकृति का कोई भी अन्य अवांछित शारीरिक, मौखिक या गैर-मौखिक आचरण।
नियोक्ताओं पर दायित्त्व (सार्वजनिक और निजी दोनों):
- लैंगिक उत्पीड़न को रोकने के लिये उचित कदम उठाएँ।
- यदि अपराध भारतीय दण्ड संहिता या किसी अन्य विधि के अंतर्गत आता है, तो नियोक्ता को परिवाद दर्ज करनी होगी।
- यह सुनिश्चित करें कि पीड़ितों/साक्षियों को प्रताड़ित या उनके साथ विभेद न किया जाए।
- संगठन के भीतर एक उपयुक्त परिवाद निवारण तंत्र स्थापित करें।
- एक महिला की अध्यक्षता में परिवाद समिति का गठन करें जिसमें कम से कम 50% महिला सदस्य हों।
- कर्मचारियों को श्रमिक बैठकों में लैंगिक उत्पीड़न के मुद्दे उठाने की अनुमति दें।
- महिला कर्मचारियों के अधिकारों के प्रति जागरूकता उत्पन्न करें।
परिणाम — महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम, 2013:
(महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनियम, 2013 (POSH Act)
- कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न को परिभाषित करता है।
- परिवादों के निवारण के लिये एक तंत्र का निर्माण करता है।
- यह मिथ्या या विद्वेषपूर्ण आरोपों से संरक्षण प्रदान करता है।
- घरेलू कामगार भी इस अधिनियम के अंतर्गत शामिल हैं।
- प्रत्येक नियोक्ता को 10 या अधिक कर्मचारियों वाले प्रत्येक कार्यालय/शाखा में एक आंतरिक परिवाद समिति (ICC) का गठन करना होगा।
- परिवाद समितियों के पास सिविल न्यायालयों के समान शक्तियां होती हैं।
- परिवादकर्त्ता के अनुरोध पर जांच से पहले सुलह का प्रावधान अवश्य किया जाना चाहिये।
- नियमों का पालन न करने पर नियोक्ताओं के लिये विहित शास्ति।
- राज्य सरकार एक जिला अधिकारी को अधिसूचित करती है जो असंगठित क्षेत्र या छोटे प्रतिष्ठानों में कार्यरत महिलाओं के लिये स्थानीय परिवाद समिति (LCC) का गठन करता है।