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सांविधानिक विधि

निर्वाचक नामावली में सम्मिलन हेतु भारत निर्वाचन आयोग नागरिकता की जांच कर सकता है, किंतु उसका निष्कर्ष नागरिकता का अंतिम निर्धारण नहीं माना जाएगा

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 28-May-2026

लोकतांत्रिक सुधार संघ बनाम भारतीय निर्वाचन आयोग 

"चूँकि आयोग का निर्णय केवल चुनावी उद्देश्यों तक सीमित हैइसलिये इसे नागरिकता के प्रश्न पर अंतिम नहीं माना जा सकता।" 

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

भारत के उच्चतम न्यायालय की एक खंडपीठजिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची शामिल थेनेलोकतांत्रिक सुधार संघ और अन्य बनाम भारतीय निर्वाचन आयोग (2026) के मामलेमें यह निर्णय दिया कि भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) निर्वाचक नामावली में शामिल होने की पात्रता अवधारित करने के उद्देश्य से किसी व्यक्ति की नागरिकता की सीमित जांच करने के लिये सशक्त हैलेकिन इस तरह के अवधारण को नागरिकता के प्रश्न पर निश्चायक नहीं माना जा सकता है।  

  • यह निर्णय बिहार में निर्वाचक नामावली के निर्वाचन आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को बरकरार रखते हुए सुनाया गया। न्यायालय ने आगे निदेश दिया कि जिन व्यक्तियों के नाम नागरिकता के आधार पर 2003 की बिहार निर्वाचक नामावली से हटा दिये गए थेउनके सभी मामलों को चार सप्ताह के भीतर नागरिकता अधिनियम, 1955 के अधीन सक्षम प्राधिकारी को निर्णय हेतु भेजा जाना चाहिये 

लोकतांत्रिक सुधार संघ बनाम भारतीय निर्वाचन आयोग (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • भारत निर्वाचन आयोग ने बिहार में मतदाता सूचियों का एक विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) कियाजिसके दौरान उसने निर्वाचक नामावली में शामिल होने की पात्रता अवधारित करने के उद्देश्य से कुछ व्यक्तियों की नागरिकता स्थिति की जांच की। 
  • इस प्रक्रिया को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई थीजिसमें अन्य बातों के अतिरिक्त यह आधार भी शामिल था कि निर्वाचन आयोग के पास नागरिकता की जांच करने की शक्ति नहीं थीयह प्रश्न नागरिकता अधिनियम, 1955 के अधीन सक्षम प्राधिकारी द्वारा निर्णय के लिये आरक्षित है। 
  • याचिकाकर्त्ताओं ने तर्क दिया कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभ्यास के दौरान आयोग द्वारा नागरिकता की स्थिति की जांच करना उसके सांविधानिक और सांविधिक जनादेश से परे था।  
  • उच्चतम न्यायालय को मतदाता सूची तैयार करने और उसमें संशोधन करने के दौरान नागरिकता की जांच करने के लिये निर्वाचन आयोग की शक्ति के दायरे और ऐसे किसी भी अवधारण के विधिक परिणामों को निर्धारित करने के लिये कहा गया था। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • निर्वाचन आयोग की नागरिकता जांच की शक्ति पर:न्यायालय ने माना कि निर्वाचन आयोग की नागरिकता जांच की शक्तिस्पष्ट निर्वाचक नामावली बनाए रखने और यह सुनिश्चित करने के सांविधानिक दायित्त्व से उत्पन्न होती है कि केवल पात्र व्यक्तियों को ही शामिल किया जाए। आयोग को अपने सांविधानिक दायित्त्व के अधीननिर्वाचक नामावली में शामिल होने की पात्रता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से नागरिकता संबंधी सीमित जांच करने का अधिकार है। यद्यपिऐसी जांच केवल चुनावी परिणामों तक ही सीमित है और नागरिकता अधिनियम के अधीन नागरिकता का औपचारिक निर्णय नहीं है। 
  • भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के निर्णय की सीमित और गैर-अंतिम प्रकृति पर:न्यायालय ने माना कि भारत निर्वाचन आयोग (ECI) का आकलन प्रथम दृष्ट्या और सुसंगत प्रकृति का है। आयोग द्वारा ऐसी जांच के आधार पर की गई कोई भी कार्रवाई केवल निर्वाचक नामावली में शामिल होने के व्यक्ति के अधिकार और निर्वाचन प्रक्रिया में भाग लेने के उनके अधिकार को प्रभावित करती है। आयोग का निष्कर्ष किसी व्यक्ति की नागरिकता स्थिति को समाप्त या निश्चायक रूप से अवधारित नहीं कर सकता हैन ही यह नागरिकता अधिनियम के अधीन सक्षम प्राधिकारी द्वारा उस प्रश्न के अवधारण को रोकता है। 
  • सक्षम प्राधिकारी को अनिवार्य रूप से मामला सौंपने के संबंध में:निर्वाचन आयोग द्वारा नागरिकता निर्धारण में अंतिम भूमिका निभाने से रोकने के लियेन्यायालय ने निदेश दिया कि यदि आयोग इस बात से संतुष्ट नहीं है कि कोई व्यक्ति नागरिकता के आधार पर निर्वाचक नामावली में शामिल होने के लिये सांविधिक शर्तों को पूरा करता हैतो उसे मामले को केंद्र सरकार के सक्षम प्राधिकारी को विधि के अनुसार निर्णय हेतु भेजना होगा। न्यायालय ने आगे निदेश दिया कि सक्षम प्राधिकारी को प्रभावित व्यक्तियों को नोटिस जारी करने और सुनवाई का अवसर प्रदान करने के बादअधिमानतः अगले संसदीयविधानसभा या स्थानीय निकाय निर्वाचन से पहलेजो भी पहले होऐसे मामलों का निर्णय करना होगा। 
  • नामांकन के लिये नागरिकता एक पूर्व शर्त के रूप में:लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 16 का हवाला देते हुएन्यायालय ने कहा कि केवल नागरिकों को ही मतदान का अधिकार दिया गया हैजिससे नामांकन के लिये नागरिकता एक पूर्व शर्त बन जाती है। अतःआयोग यह सुनिश्चित किये बिना वैध मतदाता सूची बनाए रखने के अपने दायित्त्व का निर्वहन नहीं कर सकता कि उसमें शामिल व्यक्ति इस न्यूनतम आवश्यकता को पूरा करते हैं। न्यायालय ने निर्वाचन आयोग की सीमित निर्वाचन उद्देश्य संबंधी जांच और नागरिकता अधिनियम के अधीन सक्षम प्राधिकारी द्वारा नागरिकता के औपचारिक अवधारण के बीच स्पष्ट अंतर बताया। 
  • निर्वाचन आयोग की जांच के न्यायिक पुनर्विलोकन पर:न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि निर्वाचन उद्देश्यों के लिये नागरिकता संबंधी निर्वाचन आयोग की संपूर्ण जांच न्यायिक पुनर्विलोकन के योग्य बनी हुई हैजिससे यह सुनिश्चित हो सके कि जांच विधि के अनुसार और प्रक्रियात्मक निष्पक्षता की सीमाओं के भीतर संचालित की जाए। 

लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 16 क्या है? 

लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 16: निर्वाचक नामावली में रजिस्ट्रीकरण के लिये अयोग्यताएँ:              

  • नागरिकता की आवश्यकता: यदि कोई व्यक्ति भारत का नागरिक नहीं हैतो वह निर्वाचक नामावली में रजिस्ट्रीकरण के लिये अयोग्य होगा।    
  • विकृतचित्त: यदि किसी व्यक्ति को सक्षम न्यायालय द्वारा विकृतचित्त घोषित किया गया हो तो वह अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा।  
  • निर्वाचनों के संबंध में भ्रष्ट: यदि कोई व्यक्ति निर्वाचन से संबंधित भ्रष्टाचार और अन्य अपराधों से जुड़े किसी विधि के प्रावधानों के अधीन मतदान करने के लिये अयोग्य घोषित किया जाता हैतो वह व्यक्ति मतदान के लिये अयोग्य होगा। 
  • विद्यमान प्रविष्टियों पर प्रभाव: इस धारा के अधीन अयोग्य घोषित किये गए किसी भी व्यक्ति का नाम किसी भी निर्वाचक नामावली में शामिल नहीं किया जाएगाऔर यदि पहले से ही शामिल हैतो उसे ऐसी सूची से हटा दिया जाएगा।  
  • बिना अवसर दिये किसी को भी वंचित नहीं किया जाएगा: किसी भी व्यक्ति का नाम अयोग्यता के आधार पर निर्वाचक नामावली से तब तक नहीं हटाया जाएगा जब तक उसे सुनवाई का उचित अवसर न दिया जाए।