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सिविल कानून

विल प्रक्रिया संहिता की धारा 47

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 18-Jul-2026

संतोष और अन्य बनाम श्रीमती आशा रानी और अन्य 

"जहाँ डिक्री की शर्तें स्पष्ट और असंदिग्ध होंवहाँ उन शर्तों को एक साथ प्रभावी किया जाना चाहियेयद्यपिजहाँ भी डिक्री अस्पष्ट या संदिग्ध होवहाँ निष्पादन न्यायालय को डिक्री के शब्दों से परे जाकर उसके वास्तविक अभिप्राय का निर्धारण करने का अधिकार होता है।" 

न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम 

स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम की पीठ नेसंतोष और अन्य बनाम श्रीमती आशा रानी और अन्य (2026)में यह निर्णय दिया कि निष्पादन न्यायालयसिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 47 के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुएडिक्री में वाद संपत्ति के लिपिकीय या टाइपोग्राफिकल गलत विवरण को ठीक कर सकता हैऔर सुधार की ऐसी शक्ति उस न्यायालय तक सीमित नहीं है जिसने मूल रूप से डिक्री पारित की थी। 

संतोष बनाम आशा रानी (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • प्रत्यर्थियों के पूर्वज पूरन लाल ने याचिकाकर्त्ताओं की पूर्वज माया देवी पर 31.12.1967 की विक्रय के करार के विनिर्दिष्ट पालन के लिये वाद दायर किया था। 
  • विचारण न्यायालय और अपील न्यायालय के बीच कई दौर की विधिक कार्यवाही के बादप्रथम अपील न्यायालय ने 1975 में विवादित मकान के विक्रय विलेख को निष्पादित निर्णय करने के निदेश के साथ वाद पर डिक्री दी 
  • इस डिक्री के विरुद्ध द्वितीय अपील को उच्च न्यायालय ने 2006 में खारिज कर दिया थाऔर डिक्रीदारों ने 1994 में निष्पादन कार्यवाही शुरू की थी। 
  • निष्पादन के दौरानविक्रय विलेख के मसौदे में संपत्ति को मोहल्ला-सिकलापुर में स्थित बताया गया थाजबकि डिक्री में इसे मोहल्ला-गुलाब नगर में स्थित बताया गया है। 
  • डिक्रीदारों ने निष्पादन मामले के अभिलेखों और डिक्री में इस विवरण को गुलाब नगर से सिकलापुर तक सही करने के लिये आवेदन कियाजिसमें कहा गया कि डिक्री तैयार करने वाले क्लर्क ने यह त्रुटि की थी। 
  • निष्पादन न्यायालय ने आवेदन मंजूर कर डिक्री में संशोधन कियाऔर पुनरीक्षण न्यायालय ने इस आदेश की पुष्टि की। इसके बाद निर्णीत ऋणियों ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के अधीन दोनों आदेशों को उच्च न्यायालय में चुनौती दी। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 47 के दायरे पर:न्यायालय ने माना कि धारा 47 निष्पादन न्यायालय को डिक्री के निष्पादननिर्वहन या संतुष्टि से संबंधित सभी प्रश्नों पर निर्णय लेने का निदेश देती हैऔर धारा 47(1) अनिवार्य प्रकृति की हैजिससे न्यायालय को ऐसे प्रश्नों को पृथक् वाद में भेजने का कोई विवेकाधिकार नहीं है। 
  • संपत्ति के विवरण से संबंधित विवादों पर:न्यायालय ने माना कि किसी डिक्री द्वारा कवर की गई संपत्ति के विवरण या पहचान के संबंध में विवादडिक्री के निष्पादननिर्वहन या संतुष्टि से संबंधित प्रश्न है जो धारा 47 के अंतर्गत आता हैऔर इसे एक पृथक् वाद में नहीं भेजा जा सकता है।  
  • डिक्री के शब्दों से परे जाने की निष्पादन न्यायालय की शक्ति:न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि सामान्यतः निष्पादन न्यायालय डिक्री के शब्दों से परे जाकर उसकी वैधता या औचित्य की समीक्षा नहीं कर सकता। तथापियदि डिक्री अस्पष्ट अथवा संदिग्ध होतो ऐसी अस्पष्टता का निवारण करने के लिए निष्पादन न्यायालय निर्णय तथा अभिवचनों का परीक्षा करने हेतु सक्षम होता है 
  • मामले के तथ्यों के आधार पर:न्यायालय ने पाया कि वादपत्र के निचले भाग में टाइपिंग त्रुटि के कारण मोहल्ला-सिकलापुर के स्थान पर मोहल्ला-गुलाब नगर का उल्लेख किया गया थाजबकि वादपत्र के मुख्य भाग में मकान का स्थान सिकलापुर बताया गया थाजो विक्रय विलेख में दिये गए विवरण से मेल खाता था। चूँकि प्रतिवादी ने निष्पादन प्रक्रम तक कभी भी इस बात पर विवाद नहीं किया कि संपत्ति सिकलापुर में स्थित हैइसलिये न्यायालय ने माना कि उसे गुमराह नहीं किया जा सकता। 
  • त्रुटि की प्रकृति पर:न्यायालय ने माना कि की गई त्रुटी लिपिकीय प्रकृति की थीजिसे या तो धारा 152 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन या धारा 47 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन सुधारा जा सकता हैजबकि निष्पादन न्यायालय डिक्री के निष्पादननिर्वहन या संतुष्टि से संबंधित प्रश्नों का अवधारण करता है। 
  • विलय के सिद्धांत पर:याचिकाकर्त्ताओं द्वारा विलय के सिद्धांत पर निर्भरता को खारिज करते हुएन्यायालय ने माना कि प्रश्न डिक्री के विलय का नहीं अपितु धारा 47 के अधीन इसे सुधारने के लिये निष्पादन न्यायालय की शक्ति का थाऔर डिक्री पारित करने वाले न्यायालय की इसे सुधारने की शक्ति निष्पादन न्यायालय को लिपिकीय त्रुटि को सुधारने में शक्तिहीन नहीं बनाती है। 
  • प्रतिभा सिंह बनाम शांति देवी प्रसाद के मामले पर विश्वास करते हुए:न्यायालय ने उच्चतम न्यायालय के उस निर्णय पर विश्वास किया कि एक सफल वादी को आकस्मिक चूक के कारण डिक्री के लाभों से वंचित नहीं किया जाना चाहियेऔर ऐसे मामलों में धारा 152 या धारा 47 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन उपाय उपलब्ध रहता है। 
  • अनुतोष प्रदान करने पर:न्यायालय ने माना कि त्रुटि आकस्मिक और टाइपिंग संबंधी थीकि इस प्रकार की अनजाने में हुई त्रुटी के कारण डिक्रीदारों को डिक्री के लाभों से वंचित नहीं किया जा सकताऔर निष्पादन न्यायालय ने संपत्ति के विवरण को सही करने में कोई त्रुटि नहीं की थी। तदनुसार याचिकाएँ खारिज कर दी गईं। 

सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 47 क्या है? 

सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 47– प्रश्न जिनका अवधारण डिक्री का निष्पादन  करने वाला न्यायालय करेगा : 

उपधारा (1) – पृथक् वाद पर वर्जन:जिस वाद में डिक्री पारित की गई थीउसके पक्षकारों या उनके प्रतिनिधियों के बीच उत्पन्न होने वाले और डिक्री के निष्पादननिर्वहन या संतुष्टि से संबंधित सभी प्रश्न डिक्री को निष्पादित करने वाले न्यायालय द्वारा अवधारित किये जाएंगेन कि पृथक् वाद द्वारा। 

उपधारा (3) – प्रतिनिधि स्थिति का अवधारण:जहाँ यह प्रश्न उठता है कि कोई व्यक्ति किसी पक्षकार का प्रतिनिधि है या नहींतो इस धारा के प्रयोजनों के लिये ऐसा प्रश्न न्यायालय द्वारा अवधारित किया जाएगा। 

स्पष्टीकरण 1 – "वाद के पक्षकारों" का अर्थ:इस धारा के प्रयोजनों के लियेवह वादी जिसका वाद खारिज कर दिया गया है और वह प्रतिवादी जिसके विरुद्ध वाद खारिज कर दिया गया हैवाद के पक्षकार हैं। 

स्पष्टीकरण 2 – नीलामी के क्रेताओं को पक्षकार माना जाएगा: 

  • किसी डिक्री के निष्पादन में हुई नीलामी में संपत्ति खरीदने वाला व्यक्ति उस वाद का पक्षकार माना जाएगा जिसमें डिक्री पारित की गई है। 
  • ऐसी संपत्ति का कब्जा ऐसे क्रेता या उसके प्रतिनिधि को सौंपने से संबंधित सभी प्रश्न इस धारा के अर्थ के भीतर डिक्री के निष्पादननिर्वहन या संतुष्टि से संबंधित प्रश्न माने जाएंगे।