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सिविल कानून
धनवापसी का खंड विनिर्दिष्ट पालन को वर्जित नहीं करता है
« »17-Jul-2026
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जसपाल सिंह बनाम अश्वनी कुमार "वापसी की शर्त पालन करने के दायित्त्व को सुदृढ़ करने वाले एक निवारक के रूप में कार्य करती है, न कि इसके विकल्प के रूप में।" न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन और न्यायमूर्ति आलोक आराधे |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने जसपाल सिंह बनाम अश्वनी कुमार (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि संविदा में व्यतिक्रम की स्थिति में बयाना राशि की वापसी का प्रावधान करने वाला खंड, अपने आप में, किसी न्यायालय को विक्रय के करार के विनिर्दिष्ट पालन को प्रदान करने से नहीं रोकता है।
जसपाल सिंह बनाम अश्वनी कुमार (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- 22 जून, 2003 को एक विक्रय करार निष्पादित किया गया था जिसके अधीन वादी ने प्रतिवादी के 12 मरला भूमि में आधे अंश को ₹12.50 लाख में खरीदने पर सहमति व्यक्त की थी।
- अपीलकर्त्ता (वादी) ने बयाना राशि के रूप में 9 लाख रुपए का संदाय किया, और बाद में पक्षकारों ने विक्रय विलेख के निष्पादन की समय सीमा को दो बार बढ़ाया, जिसमें प्रतिवादी को अतिरिक्त 60,000 रुपए प्राप्त हुए।
- यह आरोप लगाते हुए कि प्रतिवादी संव्यवहार को पूरा करने के लिये अपनी तत्परता और इच्छा के होते हुए भी विक्रय विलेख को निष्पादित करने में असफल रहा, अपीलकर्त्ता ने 2006 में विनिर्दिष्ट पालन के लिये एक वाद दायर किया।
- प्रत्यर्थी ने करार से इंकार करते हुए दावा किया कि दस्तावेज़ों पर विदेश यात्रा से संबंधित एक पृथक् वित्तीय व्यवस्था के लिये सुरक्षा के तौर पर हस्ताक्षर किये गए थे।
- विचारण न्यायालय ने केवल बयाना राशि की वापसी का आदेश दिया। प्रथम अपील न्यायालय ने निष्पादन का आदेश दिया। उच्च न्यायालय ने द्वितीय अपील में विचारण न्यायालय के निर्णय को बहाल कर दिया, जिसके बाद वादी ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- वापसी संबंधी प्रावधान के पालन के दायित्त्व पर प्रभाव के संबंध में: न्यायालय ने यह माना कि विक्रय विलेख निष्पादित न हो पाने की स्थिति में अग्रिम राशि की वापसी का प्रावधान मात्र विक्रेता को सौदे को निष्पादित करने के बजाय उस राशि का संदाय करके अपनी इच्छानुसार सौदा पूरा करने का विकल्प या शर्त नहीं देता है। ऐसा प्रावधान निष्पादन न होने के परिणामस्वरूप होने वाले सीधे-सादे परिणाम को ही अभिलिखित करता है, पालन के दायित्त्व को सुदृढ़ करने वाले निवारक के रूप में कार्य करता है, न कि उसके विकल्प के रूप में, और क्रेता के पालन पर बल देने के अधिकार को कम किये बिना उसके न्यूनतम हक की रक्षा करता है।
- विचारण न्यायालय के निर्णय को बहाल करने में उच्च न्यायालय की त्रुटी पर: कोर्ट ने माना कि उच्च न्यायालय ने प्रथम अपील न्यायालय के निर्णय में हस्तक्षेप करके त्रुटी की है, क्योंकि उसने वापसी का प्रावधान करने वाला खंड की गलत व्याख्या करते हुए विक्रेता को विनिर्दिष्ट पालन के दायित्त्व से मुक्त कर दिया था।
- विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 23 के उद्देश्य पर: न्यायालय ने माना कि उच्च न्यायालय के निर्वचन को स्वीकार करने से उस विक्रेता को लाभ होगा जिसने विक्रय राशि का एक बड़ा भाग पहले ही प्राप्त कर लिया है और विक्रय विलेख के निष्पादन के लिये दो बार समय सीमा बढ़ाने का अनुरोध किया है, और ऐसी व्याख्या धारा 23 के उद्देश्य की पूर्ति करने के बजाय उसे विफल कर देगी। न्यायालय ने आगे कहा कि किसी संविदा में क्षतिपूर्ति या जुर्माने के रूप में किसी राशि का उल्लेख मात्र ही दोषी पक्ष को उस राशि का संदाय करके विनिर्दिष्ट पालन से बचने का अधिकार नहीं देता है, और इसके विपरीत व्याख्या धारा 23 को अर्थहीन बना देगी।
- धारा 100 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन द्वितीय अपील अधिकारिता के दायरे पर: न्यायालय ने माना कि उच्च न्यायालय ने धारा 100 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन अपनी अधिकारिता के सीमित दायरे का उल्लंघन किया है, और दोहराया कि द्वितीय अपील की सुनवाई करने वाला उच्च न्यायालय साक्ष्य का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकता है या तथ्यों के समवर्ती निष्कर्षों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता है जब तक कि ऐसे निष्कर्ष विकृत या साक्ष्य द्वारा समर्थित न हों।
- प्रत्यर्थी के मनगढ़ंत दावों की प्रतिरक्षा पर: न्यायालय ने पाया कि प्रत्यर्थी यह साबित करने में विफल रहा कि करार हस्ताक्षरित खाली कागजों से मनगढ़ंत था, यह देखते हुए कि उसने तीनों करारों पर अपने हस्ताक्षर स्वीकार किये और कपट के आरोप का समर्थन करने के लिये कोई विशेषज्ञ साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया।
- संयुक्त स्वामित्व वाली संपत्ति में अविभाजित अंश के विक्रय और सहमति से समय विस्तार के संबंध में: न्यायालय ने माना कि संयुक्त स्वामित्व वाली संपत्ति में अविभाजित अंश का विक्रय विधिक रूप से अनुमेय है और यह स्वयं किसी संव्यवहार की प्रामाणिकता के बारे में संदेह उत्पन्न नहीं कर सकती है, और विक्रय विलेख के निष्पादन के लिये समय के सहमतिपूर्ण विस्तार से यह संकेत नहीं मिलता है कि करार एक दिखावा था।
- अनुतोष मिलने पर: अपील मंजूर कर ली गई और प्रथम अपील न्यायालय द्वारा विनिर्दिष्ट पालन का आदेश बहाल कर दिया गया।
धन वापसी संबंधी प्रावधानों और विनिर्दिष्ट पालन पर विधिक स्थिति क्या है?
विक्रय करारों में धनवापसी संबंधी खंड:
- विक्रय विलेख के निष्पादन न होने पर बयाना राशि की वापसी का प्रावधान करने वाला खंड, अपने आप में, विक्रेता की संविदा को पूरा करने के दायित्त्व से उसे मुक्त नहीं करता है।
- इस प्रकार के खंड में चुनाव की स्पष्ट भाषा या विक्रेता को संदाय द्वारा पालन से बाहर निकलने की अनुमति देने वाला प्रावधान होना चाहिये, तभी इसे विनिर्दिष्ट पालन के विकल्प के रूप में पढ़ा जा सकता है।
- इस प्रक्रार की भाषा के अभाव में, यह खंड केवल एक निवारक के रूप में और क्रेता के न्यूनतम हक की रक्षा करने वाले आधार के रूप में कार्य करता है।
विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 23:
- यह उपबंध संविदा के भंग के लिये क्षतिपूर्ति या शास्ति के रूप में किसी राशि का उल्लेख करने वाले खंडों की व्याख्या को नियंत्रित करता है।
- ऐसे खंड के होते हुए भी संविदा विशेष रूप से लागू करने योग्य बनी रहती है, जब तक कि खंड स्पष्ट रूप से संदाय द्वारा पालन को प्रतिस्थापित करने की अनुमति देने का आशय न दर्शाता हो।
- ऐसे खंडों को पालन से स्वतः बचने के मार्ग के रूप में पढ़ने से धारा 23 निरर्थक हो जाएगी।
सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 100 (द्वितीय अपील):
- द्वितीय अपील केवल विधि के किसी सारवान् प्रश्न पर ही की जा सकती है।
- उच्च न्यायालय साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकता या अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा दिये गए समवर्ती तथ्यात्मक निष्कर्षों को चुनौती नहीं दे सकता।
- हस्तक्षेप केवल तभी अनुमेय है जब ऐसे निष्कर्ष विकृत या साक्ष्य द्वारा पूरी तरह से असमर्थित साबित हों।