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आपराधिक कानून

ल विवाह संबंधी मामलों में बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम और लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम व्यक्तिगत विधि पर अधिभावी प्रभाव रखते हैं

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 09-Jul-2026

रूबी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य 

"हमारी राय मेंदेश के प्रत्येक नागरिक के लियेधर्म की परवाह किये बिनाविवाह की आयु वही है जोबाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम द्वारा निर्धारित की गई है।" 

न्यायमूर्ति जे. जे. मुनीर और अचल सचदेव 

स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ नेरूबी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) के मामलेमें यह निर्णय दिया कि व्यक्तिगत विधिबाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (PCMA) के अधीन बाल विवाह पर सांविधिक प्रतिबंध और लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) के अधीन उपलब्ध सुरक्षा को रद्द नहीं कर सकती हैऔर उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में एक अवयस्क लड़की को विवाह से बचाने में कथित रूप से बाधा डालने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध दर्ज प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) को रद्द करने से इंकार कर दिया। 

रूबी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • 15 फरवरी 2026 कोस्थानीय पुलिस ने चाइल्ड लाइन की एक टीम के साथ उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के एक गाँव का दौरा कियाक्योंकि उन्हें 16 वर्षीय लड़की के होने वाले विवाह के बारे में सूचना मिली थी। 
  • मौके पर पहुँचने पर अधिकारियों ने लड़की के माता-पिता को सूचित किया कि उसे बाल कल्याण समिति के समक्ष पेश किया जाएगा। 
  • याचिकाकर्त्ताओं ने लगभग 50 लोगों की भीड़ के साथ कथित तौर पर हिंसक व्यवहार कियाबचाव दल को मौखिक रूप से गाली दी और धमकी दीऔर एक केस वर्कर की अभिरक्षा से लड़की को जबरदस्ती वापस ले लिया। 
  • अधिकारियों को अपनी सुरक्षा के लिये गाँव से पीछे हटना पड़ातथापि बाद में लड़की को बचा लिया गया। 
  • लोक सेवकों को उनके कर्त्तव्य निर्वहन में बाधा डालने के आरोप में 19 नामजद व्यक्तियों के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई। 
  • अभियुक्त ने FIR को रद्द करने की मांग करते हुए अनुच्छेद 226 के अधीन इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। 
  • उच्च न्यायालय के समक्षयाचिकाकर्त्ताओं के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि मुस्लिम स्वीय विधि के अधीनएक लड़की जो यौवन प्राप्त कर चुकी है - जिसे सामान्यत: 15 वर्ष की आयु माना जाता है - विवाह के लिये सक्षम हैऔर उन्होंने वयस्कता अधिनियम के साथ-साथ मुस्लिम स्वीय विधि (शरीयत) अधिनियम, 1937 पर विश्वास करते हुए तर्क दिया कि बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (PCMA) और लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) उन पर लागू नहीं होते हैं। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • व्यक्तिगत विधि और कल्याणकारी विधि के बीच टकराव पर:न्यायालय ने याचिकाकर्त्ताओं के इस तर्क को खारिज कर दिया कि मुस्लिम स्वीय विधि विवाह की सांविधिक आयु में अपवाद उत्पन्न कर सकता हैयह मानते हुए कि कोई भी व्यक्तिगत विधि बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (PCMA) के अधीन अधिनियमित बाल विवाह प्रतिषेध को रद्द नहीं कर सकता हैऔर यह प्रतिषेध लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) के साथ मिलकर काम करता हैजो 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी व्यक्ति के साथ लैंगिक संबंध को अपराध घोषित करता है। 
  • विवाह की आयु की एकसमान प्रयोज्यता पर:न्यायालय ने माना कि बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (PCMA) के अधीन विहित आयु धार्मिक संबद्धता की परवाह किये बिना प्रत्येक नागरिक पर लागू होती हैऔर इस मानक से धर्म के आधार पर छूट देने की दलील को खारिज कर दिया। 
  • बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (PCMA) और लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) के पीछे के तर्क पर:पीठ ने टिप्पणी की कि ये अधिनियम लोक स्वास्थ्य और राष्ट्रीय नीति के विचारों पर आधारित हैंवैज्ञानिक समझ पर आधारित हैंऔर व्यक्तिगत विधि या रीति-रिवाज के आधार पर छूट के लिये कोई गुंजाइश नहीं छोड़ते हैं। 
  • विवाह और 18 वर्ष से कम आयु के लैंगिक अपराध की अविभाज्यता पर:न्यायालय ने तर्क दिया कि 18 वर्ष से कम आयु में विवाह की अनुमति देने से पक्षकारों को अनिवार्य रूप से लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) के अधीन अपराध के जोखिम में डाल दिया जाएगाक्योंकि लैंगिक संबंध सामान्यत: विवाह का एक हिस्सा होते हैं। 
  • व्यक्तिगत विधि और बाद के कल्याणकारी विधियों के बीच विधायी पदानुक्रम पर:न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बालकों के संरक्षण के लिये अधिनियमित बाद की व्यापक विधि व्यक्तिगत विधि के अधीन बनाए गए पूर्व के अपवादों पर वरीयता रखते हैं। 
  • बचाव दल के आचरण पर:पीठ ने बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (PCMA) के अधीन अपने सांविधिक कर्त्तव्यों का निर्वहन करने के साथ-साथ लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) के संभावित उल्लंघन को रोकने के लिये कार्यवाही करने के लिये पुलिस और चाइल्ड लाइन टीम की सराहना की। 
  • प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) को रद्द करने से इंकार करने पर:लोक सेवकों के विरुद्ध बाधा डालने और मारपीट के आरोपों को संज्ञेय अपराध मानते हुएजिसका अन्वेषण आवश्यक हैन्यायालय ने प्रारंभिक चरण में हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया और आपराधिक कार्यवाही को जारी रखने की अनुमति दीसाथ ही पहले दी गई अंतरिम रोक को भी हटा दिया। 

बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 (PCMA) क्या है? 

  • उद्देश्य:इस अधिनियम का उद्देश्य निर्दिष्ट कृत्यों को दण्डित करके और उनकी रोकथाम और प्रतिषेध के लिये उत्तरदायी अधिकारियों को नामित करके बाल विवाह को रोकना है। 
  • प्रमुख परिभाषाएँ: 
    • बालक:एक पुरुष जिसकी आयु 21 वर्ष पूरी नहीं हुई होया एक महिला जिसकी आयु 18 वर्ष पूरी नहीं हुई हो। 
    • बाल विवाह:ऐसा विवाह जिसमें विवाह करने वाले दोनों पक्षकारों में से कोई एक बालक हो। 
    • अवयस्क:वह व्यक्ति जिसने वयस्कता अधिनियम, 1875 के अधीन वयस्कता प्राप्त नहीं की है - अर्थात्भारत में रहने वाला वह व्यक्ति जिसने 18 वर्ष पूरे नहीं किये हैं। 
  • दण्ड:बाल विवाह के लिये 2 वर्ष तक का कठोर कारावास, 1 लाख रुपए तक का जुर्माना या दोनों दण्ड दिये जा सकते हैं। इस अधिनियम के अंतर्गत अपराध संज्ञेय और अजमानतीय हैं। 
  • उत्तरदायी व्यक्ति: 
    • कोई भी व्यक्ति जो बाल विवाह का आयोजन करता हैउसका संचालन करता हैउसका निर्देशन करता है या उसमें सहायता करता है। 
    • 18 वर्ष से अधिक आयु का वयस्क पुरुष जो किसी बालक से विवाह करता है (धारा 9)। 
    • बच्चे की देखरेख करने वाले व्यक्ति — जिनमें माता-पितासंरक्षक या किसी संगठन/संघ के सदस्य शामिल हैं — जो बाल विवाह को बढ़ावा देते हैंइसकी अनुमति देते हैं या इसमें भाग लेते हैं। 

लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act), 2012 क्या है? 

  • संक्षिप्त विवरण:लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act), 2012 एक ऐतिहासिक विधान है जिसे बालकों को लैंगिक शोषण और दुर्व्यवहार से बचानेउनकी अंतर्निहित संवेदनशीलता को दूर करने और उनकी सुरक्षा एवं कल्याण सुनिश्चित करने के लिये अधिनियमित किया गया है। यह संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार अभिसमय के अधीन भारत के दायित्त्वों को प्रभावी बनाता हैजिसमें भारत 11 दिसंबर 1992 को शामिल हुआ था। 
  • प्रस्तावना:यह अधिनियम लैंगिक उत्पीड़न और अश्लील साहित्य के अपराधों से बालकों का संरक्षण करने और ऐसे अपराधों का विचारण करने के लिये विशेष न्यायालयों की स्थापना तथा उनसे संबंधित  या आनुषंगिक विषयों के लिये उपबंध करने के लिये अधिनियम करता है। 
  • महत्वपूर्ण तिथियाँ:यह अधिनियम 19 जून 2012 को अधिनियमित किया गया था और 14 नवंबर 2012 से लागू हुआ। 
  • लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम संशोधन अधिनियम, 2019: 
    • यह 16 अगस्त 2019 से लागू हुआ। 
    • इस अधिनियम के अंतर्गत अपराधों के लिये अधिक कठोर दण्ड का प्रावधान किया गया है। 
    • धारा 2(1) में खंड (घकसम्मिलित किया गया हैजो "बालक संबंधी अश्लील सामग्री" को परिभाषित करता है। 
    • धारा में संशोधन करके 16 वर्ष से कम आयु के बालक पर किये गए गुरुतर प्रवेशन लैंगिक हमले के मामले को विशेष रूप से संबोधित किया गया है।