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वाणिज्यिक विधि

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) द्वारा जनित काल्पनिक उद्धरणों पर आधारित आदेशों को उच्चतम न्यायालय ने अपास्त किया

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 04-Jul-2026

पूजा रमेश सिंह बनाम जम्मू और कश्मीर बैंक लिमिटेड 

"न्यायालय ने यह माना कि कृत्रिम रूप से निर्मित पूर्व निर्णयों पर आधारित निर्णय को वैध न्यायिक निर्णय नहीं माना जा सकता है और वह पूरी तरह से अमान्य है।" 

न्यायमूर्ति पामिदिघंटम श्री नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति पामिदिघंटम श्री नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे की पीठ नेपूजा रमेश सिंह बनाम जम्मू और कश्मीर बैंक लिमिटेड (2026) के मामलेमें राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) और राष्ट्रीय कंपनी विधि अपील अधिकरण (NCLAT) द्वारा पारित आदेशों को अपास्त कर दिया । पीठ ने पाया कि दोनों अधिकरणों ने पूरी तरह से काल्पनिक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) द्वारा निर्मित न्यायिक पूर्व निर्णयों पर विश्वास किया था। न्यायालय ने न्यायिक कार्यवाही में अप्रमाणित AI-जनित सामग्री के उपयोग के प्रति शून्य-सहिष्णुता का दृष्टिकोण घोषित किया और बार काउंसिल ऑफ इंडिया को निदेश दिया कि वह विधिक पेशेवरों द्वारा ऐसी तकनीक के उत्तरदायी उपयोग के लिये दिशानिर्देश तैयार करे। 

इस मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • जम्मू और कश्मीर बैंक लिमिटेड ने एस्सेल इन्फ्राप्रोजेक्ट्स लिमिटेड के विरुद्ध कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया शुरू करने के लिये दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 की धारा के अधीन एक आवेदन दायर किया था। 
  • राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) ने आवेदन स्वीकार कर लियाऔर राष्ट्रीय कंपनी विधि अपील अधिकरण (NCLAT) ने बाद में अपील में उस आदेश को बरकरार रखा।  
  • एस्सेल इन्फ्राप्रोजेक्ट्स लिमिटेड के निलंबित निदेशकअपीलकर्त्ता ने दोनों आदेशों को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी। 
  • यह बताया गया कि अधिकरणों का तर्क छह न्यायिक उद्धरणों पर आधारित था जो या तो पूरी तरह से अस्तित्वहीन थे या उनमें काल्पनिक पैराग्राफ थे जिन्हें गलत तरीके से वास्तविक निर्णयों से जोड़ा गया था। 
  • अपीलकर्त्ता ने तर्क दिया कि संपूर्ण न्यायिक प्रक्रिया दूषित हो गई है क्योंकि अधिकरण उन पूर्व निर्णयों की प्रामाणिकता को सत्यापित करने में असफल रहे हैं जिन पर विश्वास किया गया था। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • उद्धरणों की प्रकृति के संबंध में:न्यायालय ने पुष्टि की कि अधिकरणों द्वारा जिन पूर्व निर्णयों पर विश्वास किया गया थावे कृत्रिम बुद्धिमत्ता से उत्पन्न भ्रम थेअर्थात् ऐसी सामग्री जो वास्तविक न्यायिक अधिकार प्रतीत होती थी लेकिन वास्तविकता में मौजूद नहीं थी। 
  • मनगढ़ंत सामग्री पर निर्भर रहने के प्रभाव पर:न्यायालय ने माना कि ऐसी नकली और भ्रामक सामग्री पर आंशिक रूप से भी आधारित निर्णय या आदेश को वैध निर्णय नहीं माना जा सकता हैक्योंकि यह विधि के शासन का उल्लंघन है। 
  • इस चूक की गंभीरता पर:न्यायालय ने एक स्पष्ट उपमा देते हुएमनगढ़ंत विधिक सामग्री के अनियंत्रित प्रसार की तुलना एक जहरीली औद्योगिक गैस के रिसाव से कीऔर इसे अदृश्य और तब तक हानिकारक बताया जब तक इसके प्रभावों का पता नहीं चलता। 
  • पेशेवर उत्तरदायित्त्व के संबंध में:न्यायालय ने पाया कि किसी अधिवक्ता द्वारा निर्णयों की प्रामाणिकता की पुष्टि किये बिना उनका हवाला देना पेशेवर कदाचार हैऔर इसी प्रकार किसी न्यायाधीश द्वारा निर्णय लेते समय ऐसी असत्यापित सामग्री पर विश्वास करना भी एक गंभीर चूक है। 
  • न्यायनिर्णय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भूमिका पर:यद्यपि AI उपकरणों द्वारा विधिक कार्य में लाई जा सकने वाली दक्षता को स्वीकार करते हुएन्यायालय ने AI को स्वतंत्र न्यायिक तर्क और निर्णय लेने के विकल्प के रूप में मानने के बजाय केवल एक सहायता के रूप में मानने के प्रति आगाह किया। 
  • मानवीय निगरानी की आवश्यकता पर:न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि न्यायिक निर्णय लेने में सही और गलत के बीच अंतर करने वाली अनुशासित और विचारपूर्वक तर्क प्रक्रिया को संरक्षित करने के लियेन्यायनिर्णय के हर प्रक्रम में मानवीय अभिकर्त्ताओं को पूर्ण नियंत्रण बनाए रखना चाहिये 
  • आगे चलकर जवाबदेही के संबंध में:न्यायालय ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया को एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का निदेश दियाजो विधिक पेशेवरों द्वारा प्रौद्योगिकी के उत्तरदायी उपयोग पर स्पष्ट दिशानिर्देश तैयार करेजिसमें मनगढ़ंत पूर्व निर्णयों का हवाला देने वाले अधिवक्ताओं के लिये अनुशासनात्मक परिणाम भी शामिल हों। 
  • अनुतोष मिलने पर:धारा के अधीन दायर आवेदन को राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) के समक्ष उसके मूल क्रमांक पर बहाल कर दिया गयाऔर निदेश दिया गया कि पहले प्रयोग किये गए मनगढ़ंत उद्धरणों से अप्रभावित रहते हुएदो सप्ताह के भीतर नए सिरे से निर्णय लिया जाए। 

दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 की धारा क्या है? 

दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता की धारा 7 – वित्तीय लेनदार द्वारा निगमित दिवाला समाधान प्रक्रिया का प्रारंभ: 

  • धारा किसी वित्तीय लेनदार कोस्वयं या अन्य वित्तीय लेनदारों के साथ संयुक्त रूप सेकिसी निगमित देनदार के विरुद्ध कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया प्रारंभ करने के लिये न्यायनिर्णायक प्राधिकारी (NCLT) के समक्ष आवेदन दाखिल करने का अधिकार देती हैजब कोई चूक होती है। 
  • आवेदन विहित प्रपत्र मेंव्यतिक्रम के रिकॉर्डप्रस्तावित अंतरिम समाधान पेशेवर के नाम और निर्दिष्ट अन्य जानकारी के साथ दाखिल किया जाना चाहिये 
  • न्यायनिर्णायक प्राधिकारी को वित्तीय लेनदार द्वारा उपलब्ध कराए गए सूचना साधन के रिकॉर्ड या अन्य साक्ष्यों से व्यतिक्रम के अस्तित्व का पता लगाना आवश्यक हैऔर उसे विहित समय सीमा के भीतर आवेदन को स्वीकार या अस्वीकार करना होगा। 
  • जहाँ न्यायनिर्णायक प्राधिकारी संतुष्ट है कि कोई व्यतिक्रम हुआ है और आवेदन पूर्ण हैतो वह आदेश द्वारा आवेदन को स्वीकार करेगाबशर्ते कि प्रस्तावित समाधान पेशेवर के विरुद्ध कोई अनुशासनात्मक कार्यवाही लंबित न हो। 

उच्चतम न्यायालय के AI विनियम, 2026 का प्रारूप  

  • यह निर्णय उच्चतम न्यायालय की AI कमेटी द्वारा जून, 2026 को जारी किये गए न्यायालयों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग के लिये प्रारूप विनियम, 2026 की पृष्ठभूमि में आया है। 
  • प्रारूप विनियम पाँच मूल सिद्धांतों पर आधारित हैं: मानव प्रधानतापारदर्शिताजवाबदेहीडेटा संरक्षण और न्यायिक स्वतंत्रता। 
  • ये प्रावधान उच्चतम न्यायालयउच्च न्यायालयोंअधिकरणों और न्यायनिर्णय संबंधी शक्तियों का प्रयोग करने वाले अन्य सांविधिक निकायों में न्यायिकनिर्णयात्मक और प्रशासनिक कार्यों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग पर लागू होते हैं। 
  • यह ढाँचा तीन केंद्रीय स्तंभों पर आधारित है: AI सहायता कर सकता है लेकिन कभी भी न्याय नहीं कर सकतादस्तावेज़ों में AI के उपयोग का प्रकटन किया जाना चाहियेऔर उच्चतम न्यायालय में एक स्थायी सर्वोच्च निकाय न्यायालयों और अधिकरणों में AI उपकरणों को मंजूरी देगा और उनकी निगरानी करेगा। 
  • प्रारूप में अनुपालन की निगरानी करने और घटना रिपोर्टिंग को संभालने के लिये प्रत्येक उच्च न्यायालय में एक AI समिति और एक समर्पित AI सचिवालय की परिकल्पना की गई हैजिसका नेतृत्व जिला न्यायाधीश रैंक का एक अधिकारी करेगा।  
  • शीर्ष निकाय को अनुसंधान करने और तकनीकी मूल्यांकन सहायता प्रदान करने के लिये कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर एक अनुसंधान और उत्कृष्टता केंद्र (CoRE-AI) का भी प्रस्ताव किया गया है। 
  • वर्तमान निर्णय को प्रारूप विनियमों में निहित प्रकटीकरण और मानव-पर्यवेक्षण सिद्धांतों की पुनः पुष्टि के रूप में देखा जा रहा हैविशेष रूप से AI द्वारा उत्पन्न फर्जी उद्धरणों के संदर्भ मेंजिसे न्यायालय ने अब न्यायिक रूप से पेशेवर कदाचार का मामला घोषित किया है।