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आपराधिक कानून

माता-पिता का सहयोग पति को भरण-पोषण के दायित्त्व से मुक्त नहीं करता

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 29-Jun-2026

विकास शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य 

"पत्नी के माता-पिता की आय को पत्नी की आय के रूप में नहीं माना जा सकता हैऔर माता-पिता द्वारा दी जाने वाली सहायता पति के अपनी पत्नी का भरण-पोषण करने के विधिक दायित्त्व का विकल्प नहीं है।" 

न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद 

स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की पीठ ने विकास शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2026)के मामले मेंनिर्णय दिया कि किसी पत्नी को केवल इस आधार परदण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144) के अधीन भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता है कि उसके माता-पिता संकट के समय में उसे आर्थिक रूप से सहायता प्रदान कर रहे हैं। 

  • न्यायालय ने कुटुंब न्यायालय के उस आदेश को अपास्त कर दिया जिसमें पत्नी को भरण-पोषण देने से इंकार कर दिया गया थाजबकि अवयस्क संतान को अपर्याप्त राशि प्रदान की गई थीऔर तीनों दावेदारों के लिये भरण-पोषण की राशि बढ़ा दी गई थी। 

विकास शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • याचिकाकर्त्ता पत्नी ने बुलंदशहर स्थित कुटुंब न्यायालय में धारा 125 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन एक आवेदन दायर कर अपने पतिजो सेना के सेवानिवृत्त कर्मी हैंसे भरण-पोषण की मांग की। 
  • उसने अभिकथित किया कि विवाह के बाद उसे पति और उसके परिवार के सदस्यों द्वारा उत्पीड़नताने और क्रूरता का शिकार होना पड़ापति ने उसके साथ वैवाहिक संबंध रखना बंद कर दिया और बाद में उसने द्वितीय विवाह कर लिया 
  • जनवरी 2020 मेंउसने आरोप लगाया कि उसके साथ मारपीट की गई और उसे उसके दो अवयस्क संतान के साथ वैवाहिक घर से निकाल दिया गयाजिसके बाद वह बिना किसी स्वतंत्र आय स्रोत के अपने माता-पिता के घर में रहने लगी। 
  • पति ने इन अभिकथनों से इंकार करते हुए कहा कि पत्नी ने पर्याप्त हेतुक के बिना वैवाहिक घर छोड़ दिया था और वह कथित तौर पर कुछ व्यक्तियों के साथ अवैध संबंध बनाए हुए थी। 
  • उन्होंने आगे बताया कि सेना में अपनी सेवा के दौराननवंबर 2020 में अपनी सेवानिवृत्ति तक उनके वेतन से प्रति माह 11,303 रुपए की कटौती की जाती थी और उनकी पत्नी और संतान को संदाय किया जाता थाजिसके बाद उन्हें लगभग 21,025 रुपए की मासिक पेंशन प्राप्त हुई। 
  • कुटुंब न्यायालय ने दिसंबर 2023 के अपने आदेश में पत्नी के भरण-पोषण के दावे को पूरी तरह से खारिज कर दियाक्योंकि वह दहेज की मांगमारपीट या द्वितीय विवाह के विशिष्ट घटनाओं को साबित करने में असफल रही थीऔर यह निष्कर्ष निकाला कि वह पर्याप्त हेतुक के बिना पृथक् रह रही थी। तथापिन्यायालय ने प्रत्येक अवयस्क संतान को प्रति माह 3,000 रुपए भरण-पोषण के रूप में देने का आदेश दिया। 
  • इससे व्यथित होकर पत्नी और उसके बच्चों ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर की। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • धारा 125 दण्ड प्रक्रिया संहिता की कार्यवाही के दायरे पर: 
    न्यायालय ने माना कि कुटुंब न्यायालय ने धारा 125 दण्ड प्रक्रिया संहिता के मूल उद्देश्य के विपरीत दृष्टिकोण अपनाया हैक्योंकि उसने कार्यवाही को एक पूर्ण वैवाहिक विचारण की तरह निपटाया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धारा 125 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन जांच का दायरा सीमित है - न्यायालय को केवल यह देखना होता है कि क्या पत्नी के पास पृथक् रहने का कोई युक्तियुक्त कारण है और क्या पतिसाधन संपन्न होने होते हुए भीउसका भरण-पोषण करने में उपेक्षा करता है या इंकार करता है। मानदंड न तो संदेह से परे सबूत है और न ही वैवाहिक दुराचार से संबंधित प्रत्येक आरोप और प्रति-आरोप का विचारण 
  • पृथक् रहने के पर्याप्त हेतुक पर: 
    न्यायालय ने माना कि स्वीकार किये गए तथ्य — दोनों पक्षकारों के बीच गंभीर वैवाहिक कलहपत्नी और संतान का पृथक् रहनाऔर पति द्वारा प्रतिपरीक्षा में यह स्वीकार करना कि उसने नवंबर 2020 के बाद से कोई भरण-पोषण नहीं दिया है — यह साबित करने के लिये पर्याप्त थे कि पत्नी बिना किसी कारण के पृथक् नहीं रह रही थी और उसकी उपेक्षा नहीं की जा रही थी। न्यायालय ने आगे कहा कि जहाँ पति ने तलाक की कार्यवाही शुरू कर दी हैदोनों पक्षकार गंभीर वैवाहिक कलह के कारण स्पष्ट रूप से पृथक् रह रहे हैंऔर पत्नी के पास दो अवयस्क संतान की अभिरक्षा हैतो यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है कि वह बिना पर्याप्त हेतुक के पृथक् रह रही है। 
  • जारता के आरोपों पर: 
    न्यायालय ने माना कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 125(4) के अधीन रोक तभी लागू होती है जब पत्नी का जारता साबित हो जाए। न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि मात्र आरोपसंदेह या चरित्र हनन—जो किसी स्वतंत्र साक्षीदस्तावेज़ या विश्वसनीय सामग्री द्वारा समर्थित न हों—पत्नी को उसके भरण-पोषण के अधिकार से वंचित नहीं कर सकते। 
  • भरण-पोषण के बदले माता-पिता द्वारा दी जाने वाली सहायता के संबंध में: 
    न्यायालय ने माना कि एक सक्षम पति अपनी पत्नी और संतान के भरण-पोषण के अपने सांविधिक दायित्त्व से यह कहकर बच नहीं सकता कि पत्नी को उसके माता-पिता द्वारा सहायता प्रदान की जा रही है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पत्नी के माता-पिता की आय को पत्नी की आय नहीं माना जा सकताऔर एक बार यह मान लिया जाए कि पत्नी के पास पर्याप्त स्वतंत्र आय नहीं हैतो उसे भरण-पोषण देने से इंकार करने का कोई औचित्य नहीं है। 
  • संतान के भरण-पोषण की पर्याप्तता पर: 
    न्यायालय ने कुटुंब न्यायालय द्वारा प्रति बच्चे प्रति माह 3,000 रुपए की राशि को पूरी तरह से अपर्याप्त और अवास्तविक पायाऔर कहा कि यह स्कूल जाने वाले बच्चों के न्यूनतम उचित खर्चों को भी पूरा करने के लिये अपर्याप्त हैजिसमें भोजनकपड़ेशिक्षाकिताबेंपरिवहन और चिकित्सा आवश्यकताएँ शामिल हैं। 
  • पति के विरुद्ध प्रतिकूल निष्कर्ष पर: 
    चूँकि पति अपनी वित्तीय संपत्तियों का पूरी तरह से प्रकटन करने में असफल रहा और पारिवारिक कृषि जोतों और डेयरी क्रियाकलापों से संबंधित राजस्व रिकॉर्ड को छुपायाइसलिये न्यायालय ने उसके विरुद्ध उन महत्त्वपूर्ण विवरणों को छुपाने का प्रतिकूल निष्कर्ष निकालाजिन पर उसका विशेष अधिकार था। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा की धारा 144 क्या है? 

 बारे में: 

  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 144 एक सामाजिक न्याय उपबंध है जिसका उद्देश्य उपेक्षित पति या पत्नी और संतान की दरिद्रता और आर्थिक कठिनाई को रोकना है। यह प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट को उस पत्नीधर्मज या अधर्मज संतान को मासिक भरण-पोषणअंतरिम भरण-पोषण और कार्यवाही व्यय प्रदान करने का अधिकार देता हैजो स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थ हैंऐसे व्यक्ति से जो पर्याप्त साधनों से संपन्न होते हुए भी ऐसा करने से इंकार करता है या उपेक्षा करता है। 

प्रमुख सांविधिक विशेषताएँ: 

  • धारा 144(1): मजिस्ट्रेट को पत्नी और संतान को मासिक भरण-पोषण का आदेश देने का अधिकार देती है। 
  • धारा 144(1) का दूसरा परंतुक: मजिस्ट्रेट को कार्यवाही लंबित रहने के दौरान अंतरिम भरण-पोषण और व्यय प्रदान करने की अनुमति देता है। 
  • धारा 144(1) का तीसरा परंतुक: निदेश देता है कि अंतरिम भरण-पोषण आवेदनों का निपटारा आदर्श रूप से नोटिस की तामील की तारीख से 60 दिनों के भीतर किया जाना चाहिये 
  • धारा 144(2): भरण-पोषण आवेदन या आदेश की तिथि से देय होगाजैसा मजिस्ट्रेट उचित समझे। 
  • धारा 144(3): भरण-पोषण का संदाय न करने पर वारण्ट कार्यवाही और एक महीने तक का कारावास हो सकता है। 
  • धारा 144(4): जारता की दशापर्याप्त हेतुक के बिना पति के साथ रहने से इंकारया पृथक् रहने के लिये आपसी सहमति के मामलों में पत्नी को भरण-पोषण प्राप्त करने से अयोग्य ठहराता है। 
  • धारा 145(2) के अधीन प्रक्रियात्मक स्पष्टता प्रदान की गई हैजिसमें यह अनिवार्य है कि साक्ष्य प्रत्यर्थी या उसके अधिवक्ता की उपस्थिति में अभिलिखित किया जाना चाहियेजिसमें एकपक्षीय कार्यवाही और तीन मास के भीतर पर्याप्त हेतुक दर्शित करने पर ऐसे आदेशों को अपास्त करने का प्रावधान है।